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Light Pollution: उजाला हटाओ, अंधेरा वापस लाओ

मानव जाति का विकसित दिमाग निरंतर प्रकाश की खोज में लगा रहता है। प्रकाश की यह चाहत अब इतनी विकराल हो गयी है कि प्रकाश ही समस्या बन गया है और संसार में अब उजाले को छोड़कर अंधेरे की खोज शुरु हो गयी है।

Light Pollution research by the scientists of Germany-based Geology Research Center

Light Pollution: पिछले सप्ताह, जर्मनी स्थित भूविज्ञान अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों की ओर से एक शोध अध्ययन जारी किया गया। इसमें प्रकाश प्रदूषण की स्थिति और दुष्परिणामों के बारे में चिंता व्यक्त की गयी है। अध्ययन बताता है कि पिछले एक दशक में आकाश की चमक काफी बढ़ी है और इसकी दृश्यता में काफी कमी आयी है। इसकी वजह रोशनी को लेकर हमारा लगातार बढ़ता जुनून है। हमने धरती को इतनी कृत्रिम रोशनियों से भर दिया है कि हमारी आंखों और आसमान के बीच एक प्रकाशीय धुंध की बेहद घनी परत बन गयी है। इस कारण हमें आसमान में फैली ब्रह्मांड की खूबसूरत धरोहरें अब या तो नजर ही नहीं आतीं, या फिर बहुत साफ नजर नहीं आतीं।

अगर ऐसा ही चलता रहा तो कुछ साल बाद हमें रात के वक्त आसमान दिखना ही बंद हो जायेगा। यही प्रकाश प्रदूषण अथवा इमेज लाइट पॉल्यूशन है।

महानगर ज्यादा जिम्मेदार

घरों की बालकनियों, टेरेस या कम्पाउंड वॉल पर लगी लाइटें, सड़कों पर प्रकाश व्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले फ्लड लाइट बल्ब, 24 घंटे रोशनियों में डूबे रहने वाले होटल, मल्टीप्लेक्स और शॉपिंग मॉल, उन पर लगे दानवाकार नियोन साइनबोर्ड, होर्डिंग्स आदि प्रकाश प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत हैं। धरती से उत्सर्जित होने वाली यह रोशनियॉं आकाश की ओर बढ़ती है और रास्ते में गैस, धूल, मिट्टी व कुहासे के कणों से मिलकर वातावरण में फैलती जाती हैं। इससे होने वाला प्रकाश विकिरण इतना ज्यादा हो जाता है कि वह लाइट फॉग की स्थिति उत्पन्न कर देता है।

विभिन्न अध्ययन बताते हैं कि प्रकाश प्रदूषण की वजह से आसमान की चमक पर पड़ने वाले प्रभाव स्थानानुसार अलग-अलग पाये गये हैं। जैसे कुछ स्थानों पर आसमान की चमक पांच से दस गुना अधिक पायी गयी तो कुछ जगहों पर यह पचास गुना तक दर्ज की गयी। किसी भी तरह के प्रदूषण की बात कीजिए, महानगर उसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार नजर आते हैं। प्रकाश प्रदूषण भी इसका अपवाद नहीं है। अध्ययन बताते हैं कि महानगरीय प्रकाश व्यवस्था की वजह से होने वाले प्रकाश प्रदूषण का असर उसके चारों ओर सौ किमी दूर तक हो सकता है। इंटरनेशनल डार्क स्काई एसोसिएशन ने वर्ष 2016 में एक अध्ययन में दावा किया था कि विश्व में लगभग अस्सी प्रतिशत लोग स्काईग्लो के नीचे रहते हैं।

हर आठ साल में दोगुना हो रहा है प्रकाश प्रदूषण

अभी भी स्थिति कुछ कम चिंताजनक नहीं है। वर्ष 2011 से 2022 तक प्रकाश प्रदूषण का अध्ययन करने वाले इस शोध में वैज्ञानिकों ने एशिया, यूरोप, उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका महाद्वीपों में 19 हजार जगहों पर रहने वाले लगभग 29 हजार लोगों का सर्वे किया था। उनसे पूछा गया था कि क्या अब भी रात के वक्त आसमान उन्हें इतना ही साफ दिखायी देता है, जितना कि दस साल पहले दिखायी देता था। ज्यादातर के जवाब नकारात्मक थे।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि प्रकाश प्रदूषण हर साल लगभग 9.6 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है यानि हर आठ साल में दोगुना। इस स्थिति को शोधकर्ता क्रिस्टोफर काबा के एक आंकलन से समझा जा सकता है। वे एक उदाहरण से समझाते हैं कि एक बच्चा एक ऐसी जगह पैदा हुआ है जहां वह अपने जन्म के समय 250 तारे देख सकता था। उसी जगह पर रहते हुए जब वह 18 साल का होगा तो वह सिर्फ 100 तारे ही देख पायेगा। इसका यह मतलब नहीं कि तारों की संख्या या उसकी देखने की क्षमता कम हो गयी है। यह प्रकाश प्रदूषण है, जिसकी वजह से तारों का दिखाई देना कम हो जाएगा।

अंधेरे का होना भी जरूरी है

समस्या यह है कि अंधेरे को हमेशा एक नकारात्मक तत्व के रूप में ही देखा जाता रहा है, इसलिए दुनिया भर में इससे निपटने के उपायों पर ही जोर दिया जाता है। अलग-अलग स्तर पर ज्यादा से ज्यादा प्रकाश पैदा करने के लिए हम ऐड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। दुनिया भर के शहरों में 'सिटी, दैट नेवर स्लीप' बनने की होड़ लगी है।

ज्यादातर लोग, सोने को समय की बर्बादी मानते हैं और अधिक से अधिक जागना चाहते हैं। रात में भी जागे रहने के लिए रोशनी की जरूरत होती है। इसलिए वे जीवन में प्रकाश की मात्रा लगातार बढ़ाने में लगे हैं और प्रकाश पैदा करने वाले नये-नये उपकरण बना रहे हैं। इस उन्माद में हम कभी सोच ही नहीं पाते कि लगातार रोशन होती रातें हमसे हमारी नींद छीन रही हैं और मन का सुकून भी।

इस लगातार बढ़ते प्रकाश का मानव व अन्य जीवों की देखने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। लगातार रोशनी में रहने की वजह से नींद की कमी, तनाव व थकान आदि की वजह से इनका चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है और स्वभाव में उग्रता आती है। कार्यस्थलों पर आर्टिफिशियल लाइटों से ब्लड प्रेशर में आठ अंकों तक की वृद्धि हो सकती है। आंखों और त्वचा पर भी तेज रोशनी के काफी नकारात्मक प्रभाव अनुभव किये गये हैं।

प्रकाश की अधिकता अनेक प्राणियों, खासकर ऐसे जीव जो रात के समय जागने के लिए जाने जाते हैं, उनके संचार और उनकी प्रजनन क्षमता को भी कम करती है। इससे उनके अस्तित्व के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है। समुद्री कछुए और प्रवासी पक्षी जो अपनी यात्राओं के लिए चंद्रमा के प्रकाश के आधार पर दिशानिर्धारण करते हैं, तेज कृत्रिम प्रकाश की वजह से भ्रमित होकर कहीं के कहीं पहुंच जाते हैं।

यही नहीं, प्रकाश प्रदूषण का पेड़-पौधों और वनस्पतियों पर भी काफी नकारात्मक असर होता है, क्योंकि जीवित प्राणियों की तरह इन्हें भी एक सही अनुपात में रोशनी और अंधेरे की जरूरत होती है। नकली रोशनी हर प्राणी और वनस्पति की जैविक घड़ी को अस्त-व्यस्त कर देती है। बहुत सारी मानवीय व प्राकृतिक खगोल गतिविधियों में भी इससे काफी बाधा उत्पन्न होती है।

बिगड़ गया प्रकाश-अंधकार का संतुलन

जिस समय प्रकृति ने सृष्टि की रचना की तो उसने प्रकाश और अंधकार के बीच बहुत आदर्श संतुलन रखा था। लेकिन धीरे धीरे विकसित होते मनुष्य ने अंधेरे को दूर करने के लिए दीपक, ढिबरी, मोमबत्ती, लालटेन जैसे तरीके खोजे। यह हमारी निजी जरूरत थी लेकिन, फिर प्रकाश व्यवस्था में विद्युत के प्रवेश ने एलईडी, हेलोजन रोशनियों के साथ हमें प्रकाश की ऐसी लत लगा दी कि हम एक पल भी प्रकाश के बिना नहीं रहना चाहते। हो सकता है कि आने वाले दिनों में हम अंधेरे के लिए तरस जाएं और चाहकर भी ऐसी जगह न ढूंढ पायें, जहां हमें कुछ पल का अंधेरा मिल सके।

शुरू हो चुका है अति-प्रकाश का निषेध

अच्छी बात यह है कि अब दुनिया अंधकार की जरूरत को भी शिद्दत से महसूस करने लगी है। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि अस्सी के दशक से प्रकाश प्रदूषण के खिलाफ डार्क स्काई मूवमेंट नाम की एक वैश्विक मुहिम चल रही है।

इस मूवमेंट के कार्यकर्ता लोगों को प्रकाश प्रदूषण के खतरों के प्रति आगाह करते हैं और उन्हें प्रेरित करते हैं कि वे रोशनी का उपयोग जरूरत पड़ने पर ही करें। डार्क स्काई एसोसिएशन ने आदर्श प्रकाश व्यवस्था नियमों को विकसित किया है ताकि आकाश में सितारों की दृश्यता घटा रहे कृत्रिम प्रकाश को कम किया जा सके।

इसलिए अंधेरे के महत्व को समझते हुए जहां जरूरत न हो वहां रोशनी मत कीजिए और जहां जरूरी हो वहां भी उतना ही प्रकाश इस्तेमाल कीजिए, जितने में आपका काम चल रहा हो।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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