Kerala on UCC: "सेक्युलर और लिबरल" कम्युनिस्ट पसमांदा मुसलमानों पर अरबी शरिया क्यों थोप रहे हैं?
Kerala on UCC: हाल ही में केरल सरकार ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया है। आश्चर्यजनक रूप से इस प्रस्ताव को पास करते हुए केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार ने कहा कि यूसीसी सेकुलरिज्म के खिलाफ है। यूसीसी के खिलाफ यह प्रस्ताव स्वयं मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने रखा जिसे लेफ्ट फ्रंट के दलों और कांग्रेस तथा इसके सहयोगी दलों, दोनों का समर्थन मिला। समान नागरिक संहिता के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव पास करने वाला केरल देश का पहला राज्य बन गया है।
इसके लिए कम्युनिस्ट सरकार ने यह कहते हुए एक बहाना बनाया है कि यह यूसीसी वह नहीं है जिसकी बात संविधान करता है। यह तो आरएसएस का एजेंडा है जो पूरे देश में मनुस्मृति को लागू करना चाहता हैं। ऐसे अजीब तर्क देना कम्युनिस्टों की कोई राजनीतिक मजबूरी हो सकती है लेकिन ऐसा करके तथाकथित प्रगतिशील और सेकुलर कम्युनिस्टों ने लगभग 15 से 16 करोड़ जनसंख्या वाले देशज पसमांदा मुसलमानों को मध्ययुगीन सामंतवादी अरबी ईरानी शरिया लॉ की गर्त में रखने की अपनी मंशा जाहिर की है। निश्चित ही कम्युनिस्ट पार्टियों और कांग्रेस ने एक बार फिर अपने दकियानूसी और साम्प्रदायिक चरित्र का ही परिचय दिया है।

असल में विधि आयोग द्वारा सुनवाई शुरु करने के बाद जब से देश में समान नागरिक संहिता की बात शुरु हुई है तब से तमाम लोग यूसीसी के पक्ष विपक्ष में अपने अपना मत दे रहें हैं। कोई समर्थन कर रहा है तो किसी ने विरोध का रास्ता चुना है। लेकिन इस मामले में सबसे तीव्र विरोध मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नेतृत्व में शासक वर्गीय अशराफ मुसलमानों की ओर से देखा जा रहा है। समान नागरिक संहिता लागू करने की कवायद को मुसलमानों के मजहबी मामले में हस्तक्षेप, संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन, देश की विविधता और अनेकता वाली संस्कृति के नष्ट होने का भय, समाज को बांटने वाला एवं सामाजिक अशांति उत्पन्न करने वाला कहकर दुष्प्रचारित किया जा रहा है। इस कारण न सिर्फ मुस्लिम समाज में यह भ्रम पैदा हो रहा है कि यूसीसी लागू होने से वो अपने धर्म का पालन नहीं कर पायेंगे, बल्कि आदिवासी समाज, दलित एवं पिछड़े समाज में भी यह संदेश जा रहा है कि यूसीसी संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।
सर्वप्रथम यह बात समझ लेनी चाहिए कि संविधान में धर्म के पालन करने की जो स्वतंत्रता दी गई है वो केवल धर्म के आध्यात्मिक स्वरूप के पालन की है। कोई भी धार्मिक कानून सामाजिक एवं राजनैतिक मामलो में प्रभावी नहीं हो सकता है। किसी भी मजहब का कोई भी कानून जिससे नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है या जो न्यायसंगत नहीं है उसे परम्परा और धर्म पालन की स्वतंत्रता की आड़ में नहीं चलाया जा सकता है।
इसलिए अगर सरकार पारिवारिक मामलों में नागरिकों के समानता के मूल अधिकार की रक्षार्थ कोई कानून बनाना चाहती है तो यह किसी भी प्रकार किसी के भी धर्म के पालन करने के अधिकार का उलंघन नहीं है अपितु यह पारिवारिक मामलों में भी न्याय स्थापित करने की कवायद भर है। जब क्रिमिनल कानून समान होने पर देश की विविधता और अनेकता वाली संस्कृति पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो फिर पारिवारिक मामलों में भी अगर समान कानून लागू हो जाए तो इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न तो यह है कि क्या विविधता और अनेकता वाली संस्कृति की आड़ में देश के किसी भी नागरिक के साथ हो रहे अन्याय को बर्दास्त किया जा सकता है?
बिल्कुल नहीं, राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वो बिना किसी भेदभाव के अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे। आज भी ऐसा देखा जाता है कि बहुत से समाज क्रिमिनल मामलों में भी भारतीय क्रिमिनल कानून की अवहेलना करते हुए अपनी पुरानी परम्पराओं के अनुसार अन्यायपूर्ण फैसले कर देते हैं लेकिन समाज विशेष की परम्परा और कल्चर के आधार पर कोई उसे उचित सिद्ध करने का प्रयास नहीं करता हैं बल्कि कानून उस पर अपना काम करता है। ठीक वैसे ही अगर पारिवारिक मामलों में किसी समाज विशेष का कानून संविधान के अनुसार उस समाज के किसी व्यक्ति विशेष के मौलिक अधिकारों का हनन करता है जैसा कि कई एक पारिवारिक मामलों में देखा गया है, तो उसे किसी भी सूरत में सामाजिक या मजहबी परम्परा की आड़ में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए पारिवारिक मामलों में भी न्यायसंगत समान कानून की अवश्यकता को देश निर्माताओं ने समझा था और बाद में आने वाली सरकारों से यह उम्मीद की थी कि वो इसे लागू करने का प्रयास करें।
जहां तक मुस्लिम समाज की बात है वो पारिवारिक मामलों में मध्य युगीन शरिया कानून द्वारा संचालित होता है और देखा जाय तो मौजूदा मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) में ऐसी बहुत सी बातें हैं जो देशज पसमांदा मुसलमानों (कुल मुस्लिम का लगभग 90% भाग) की स्थानीय सभ्यता, संस्कृति से मेल नहीं खाती है। जैसे बहु पत्नी विवाह, सिर्फ पुत्रियों वाले माता पिता अपनी पूरी पैतृक संपत्ति को अपनी बेटियों को नहीं दे पाते हैं। उन्हें अपने भाई या परिवार के पुरुष पक्ष को भी एक बड़ा भाग देना पड़ता है क्योंकि शरिया में महिलाओं को पैतृक संपत्ति में केवल एक चौथाई हिस्सा पाने का ही अधिकार है। जबकि इस्लामी सिद्धांत "उर्फ" के अनुसार व्यक्ति अपनी स्थानीय सभ्यता संस्कृति का पालन इस शर्त के साथ कर सकता है कि उससे इस्लाम के किसी मूलभूत सिद्धांत से टकराव न होता हो।
साथ ही कई ऐसी बातें भी हैं जो इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों से भी टकराती है जैसे दादा के जीवन काल में पिता की मृत्यु के बाद पोते को पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलना, विवाह में "कूफु" के शरिया सिद्धांत के अनुसार जाति एवं नस्ल के आधार पर भेदभाव किया जाता है।
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि देशज पसमांदा मुसलमान भी संयुक्त परिवार की भारतीय संस्कृति का वाहक है लेकिन संयुक्त परिवार के लिए केवल हिन्दू समाज को ही इनकम टैक्स में छूट प्राप्त है। संयुक्त परिवार की संस्कृति का पालन करने के बाद भी देशज पसमांदा मुसलमानों को इसका लाभ नहीं मिलता है, जो धर्म के आधार पर भेदभाव को दर्शाता है। जबकि संविधान का आर्टिकल 15 के अनुसार यह उचित नहीं है।
फिर भी ना चाहते हुए भी देशज पसमांदा मुसलमानों को मध्य युगीन अरबी/ईरानी सभ्यता वाले कानून का पालन इस्लामी शरिया और पर्सनल लॉ के नाम पर करना पड़ता है। शरिया कोई दैवीय कानून न होकर समय समय पर इस्लामिक विद्वानों द्वारा बनाया गया कानून है। शरिया कानूनों में आपस में भी बहुत मतभेद होता है। एक शरिया दूसरे शरिया के बिलकुल विरोध में है। उदाहरण के तौर पर एक शरिया तीन तलाक को सही मानता है तो दूसरी शरिया इसे गलत मानता है।
इसलिए बहुत से इस्लामिक देशों ने अपने शरिया कानून में समय और काल के अनुसार बदलाव किया है ताकि इंसाफ कायम रहे। लेकिन यह भारत का दुर्भाग्य है कि यहां आज भी अरबी और ईरानी जानकारों द्वारा मध्ययुग में बनाया गया हनफी शरिया लागू है जो उस समय के सामंतवाद और स्थानीय अरबी ईरानी संस्कृति से प्रभावित है। हालंकि इस देश में हनफी सम्प्रदाय के अतिरिक्त अन्य संप्रदायों के लोग भी रहते हैं और भारतीय धर्मों से धर्मांतरित लोगो की भी बड़ी संख्या है जिनकी सभ्यता संस्कृति स्थानीय यानी भारतीय है।
यदि सरकार यूसीसी को लागू करती है तो यह ऊपर लिखित विसंगतियों को दूर करते हुए न्याय की स्थापना होगी। लेकिन जिस तरह से केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने इसके विरोध में प्रस्ताव पारित किया है उससे लगता है कि उसमें और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में कोई अंतर नहीं है। यूसीसी के जरिए मनुस्मृति तो कभी लागू होनी नहीं है, लेकिन केरल में कम्युनिस्ट पार्टियों और कांग्रेस का विरोध देखकर लगता है कि ये लोग निश्चय ही मुस्लिम समाज के अशराफिया तबके का शरिया देश में लागू करने की मंशा रखते हैं।
केरल विधानसभा में समान नागरिक संहिता के खिलाफ प्रस्ताव पारित करके कम्युनिस्ट पार्टियों ने साबित कर दिया है कि वो वंचित शोषित की सिर्फ बात करते हैं लेकिन जब बात मुसलमानों की आती है तो वो पसमांदा मुसलमानों की बजाय अशराफिया तबके के साथ ही खड़ा होना पसंद करते हैं। इससे यह संकेत भी मिलता है कि वंचित शोषित समुदाय की आड़ में वो सांप्रदायिक राजनीति करना पसंद करते हैं जिसमें अशराफिया तबका तथाकथित सेकुलर पार्टियों की मदद करता है और वो पार्टियां मुसलमानों के अशराफिया तबके की मांगें पूरी करती हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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