Karnataka Elections: भाजपा और कांग्रेस के लिए सत्ता का रोड़ा, वोक्कालिग्गा और देवगौड़ा

लिंगायत वोटर जहां भाजपा के साथ हैं वही वोक्कालिग्गा देवगौड़ा परिवार के वफादार। ऐसे में वोक्कालिग्गा वोटरों के बल पर देवगौड़ा फिर से कांग्रेस और भाजपा के लिए सत्ता की राह का रोड़ा नजर आ रहे हैं।

Karnataka Elections politics is divided between Lingayat and Vokkaliga voters

Karnataka Elections: इस साल मई के महीने में जब दक्षिण के भाजपा शासित राज्य कर्नाटक में चुनाव होंगे तो भाजपा और कांग्रेस दोनों सत्ता प्राप्त करने की होड़ में पूरी ताकत से शामिल होंगी। लेकिन 224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में आधा रास्ता (112) पार करने की भाजपा और कांग्रेस दोनों की क्षमता जनता दल (एस) के प्रदर्शन पर निर्भर करती है। पुराने मैसूर क्षेत्र में जद (एस) अगर मज़बूत प्रदर्शन करता है तो भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अपने दम पर सरकार बनाना आसान नहीं होगा।

इसका कारण है वोक्कालिग्गा वोटरों पर देवगौड़ा परिवार की पकड़। लिंगायत वोटर जहां भाजपा के साथ हैं वही वोक्कालिग्गा वोटरों पर देवगौड़ा परिवार की मजबूत पकड़ रही है। इस पकड़ को कमजोर करने के लिए ही पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री मोदी ने बेंगलूरू के संस्थापक केम्पेगौड़ा की 108 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण कर अपने अघोषित प्रचार अभियान को शुरू किया था। मोदी का मकसद साफ था 'केम्पेगौड़ा की 108 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण कर कर्नाटक के वोक्कालिगा समुदाय को लुभाना।

केम्पेगौड़ा वोक्कालिगा समुदाय के ऐतिहासिक प्रतीक हैं और इस समुदाय का वोट अब तक मुख्य रूप से जनता दल (सेक्युलर) या जेडीएस को मिलता रहा है। वोक्कालिगा समुदाय का गढ़ माने जाने वाले दक्षिण कर्नाटक के ओल्ड मैसूर क्षेत्र के सात-आठ जिलों पर भाजपा की लंबे समय से नजर है और भाजपा यहां कांग्रेस, जेडीएस गठबंधन को कमजोर करने में जुटी है जिससे कुछ ही दिनों बाद होने वाले कर्नाटक चुनाव में भाजपा अपनी सरकार फिर से बना सके।

दक्षिण कर्नाटक में भाजपा के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो वोक्कालिंगा समुदाय के वोट भाजपा के पक्ष में करवा सके। हालांकि भाजपा बेंगलूरू और अन्य शहरों में वोक्कालिगा मतदाताओं को आकर्षित करने में सफल रही है, फिर भी ग्रामीण आबादी अब तक बाहर है। इसी वजह से भाजपा के वोक्कालिगा नेता जैसे कि सी.नारायण, सी.टी. रवि, आर. अशोक और के सुधाकर आदि पिछले कुछ वर्षों से ग्रामीण इलाकों में पार्टी की पैठ बनाने की कोशिश में लगे हैं। भाजपा की उम्मीद है कि इससे वह वोक्कालिगाओं के गढ़ में पैठ बना सकेगी।

कर्नाटक में दो ही जातियां राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है। एक लिंगायत समुदाय जिस पर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में भाजपा के पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य येदियुरप्पा की पकड़ है। दूसरा समुदाय वोक्कालिग्गा है जिस पर जनता दल सेक्युलर के प्रमुख देवगौड़ा की पकड़ है। वोक्कालिग्गा समुदाय जेडीएस और कांग्रेस के बीच बंटे हुए हैं। भाजपा को कर्नाटक में सत्ता के लिए संघर्ष हमेशा इसी वोक्कालिग्गा समुदाय के कारण करना पड़ा है।

हालांकि भाजपा ने तटीय क्षेत्रों में हिंदुत्व के मुद्दे को उभारकर स्थानीय वोक्कालिग्गा समुदाय में कुछ जगह बनाने में सफलता पाई है। पुराने मैसूर क्षेत्र में ग्रामीण वोक्कालिगाओं के लिए कृषि उपज और आजीविका से जुड़े मुद्दे मुख्य रहे है और इन वोक्कालिग्गा समुदाय के किसानों को लुभाने के लिए केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर खुद तीन बार इस क्षेत्र का दौरा कर चुके है और किसानों को राहत देने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं जिससे चुनाव में इनका वोट भाजपा के पक्ष में जा सके।

भाजपा की तमाम कोशिशों के बाद भी जेडीएस को अभी भी वोक्कालिगा के एक बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त है। 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में वोक्कालिगा समुदाय ने जेडीएस के पक्ष में एकमुश्त वोट किया, जिसके कारण ही कांग्रेस और जेडीएस का गठबंधन सरकार बनाने में सफल हुआ था। इस विधानसभा चुनाव में भी जेडीएस का प्रदर्शन इस समुदाय से मिलने वाले मतों पर निर्भर रहेगा, यह तय है।

हालांकि अब वोक्कालिग्गा समुदाय को अपनी जागीर मानने वाला जनता दल (सेक्युलर) भी इस बात से परेशान है कि मोदी और शाह के नेतृत्व में भाजपा उसके इस सबसे मजबूत वोट बैक में सेंध लगाने में सफल हो रही है। कांग्रेस भी समय समय पर वोक्कालिंगा मतदाताओं का एक हिस्सा अपने नाम करती रही है। देवगौड़ा की पार्टी से नेताओं के लगातार पलायन के कारण भी पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के नेतृत्व में वोक्कालिग्गा जाति समूह के समर्थन वाली इस पार्टी की पहुंच लगातार कमजोर हुई है। ऐसे में देवगौड़ा को अपने पारंपरिक वोटरों को कांग्रेस और भाजपा में जाने से रोकना आने वाले विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती होगी।

जहां तक दोनो राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा की बात है तो दोनों आगामी कर्नाटक विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना से परेशान हैं। भाजपा हर हाल में स्पष्ट बहुमत चाहती है जिससे अपने दम पर सरकार बना सके, वही कांग्रेस भी देवगौड़ा पर कम से कम निर्भरता चाहती है जिससे सरकार बनाने के लिए उसके नखरे न झेलना पड़े। इस कारण भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपना निशाना देवगौड़ा की पार्टी को कमजोर करने पर लगा रखा है।

इसी साल 28 जनवरी को राज्य के उत्तरी जिले बेलगावी में भाजपा की विजय संकल्प रैली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संबोधन में दोनों पार्टियों को 'परिवारवादी' बताते हुए कहा था कि जद (एस) को मिलने वाला हर वोट अंततः कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगा। क्षेत्रीय दल जद (एस) के खिलाफ ऐसा ही हमला शाह ने कुछ हफ्ते पहले दक्षिणी कर्नाटक के मंड्या में किया था। मंड्या को जद (एस) का गढ़ माना जाता है। राज्य के 10 दक्षिणी जिलों से बना पुराना मैसूर वह क्षेत्र है जहां जड़ें जमाना भाजपा के लिए सबसे कठिन रहा है।

ऐसे में भाजपा जहां एक ओर वोक्कालिग्गा का वोट लेने के लिए आतुर है, वहीं उसके सामने अपने मजबूत गढ़ को बरकरार रखने की भी कठिन चुनौती है। कांग्रेस और जद(एस) गठबंधन की सरकार से कुछ विधायकों को तोड़कर भाजपा कर्नाटक में सरकार बनाने में जरूर सफल रही लेकिन भाजपा नेताओं के भ्रष्टाचार ने भाजपा के स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की हवा निकाल दी। दो दिन पूर्व ही भाजपा विधायक और कर्नाटक सोप्स एंड डिटर्जेट लिमिटेड कंपनी के चेयरमेन मदल विरूपक्षप्पा के घर से छह करोड़ नगद और उनके बेटे के पास से दो करोड़ रूपये बरामद होने के बाद भाजपा की भ्रष्टाचार मुक्त मुहिम को तगड़ा झटका लगा है। हालांकि मदल विरूपक्षप्पा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और भाजपा फिलहाल डेमेज कंट्रोल में जुटी है।

वर्तमान में, भाजपा के पास बेंगलुरू की 28 में से 15 विधानसभा सीटें है इसीलिए चुनाव से पहले पार्टी की प्रमुख प्राथमिकताओं में यह शहर शामिल है, लेकिन पड़ोस के रामनगर, मंड्या, हासन, कोलार, और यहां तक कि तुमकुर और मैसूर जैसे जिले इसके गले की फांस रहे हैं। वर्ष 2018 में इन जिलों की कुल 51 सीटों में से भाजपा ने केवल आठ पर जीत हासिल की थी। उपचुनाव और दलबदल के कारण वर्तमान में यह संख्या 11 है।

कर्नाटक के अन्य क्षेत्रों में भाजपा की उपस्थिति सुदृढ़ है फिर भी विधानसभा में सुरक्षित संख्या तक पहुंचने के लिए उसे इन दक्षिणी जिलों में जीत सुनिश्चित करनी होगी। लेकिन परंपरागत रूप से यहां जद (एस) और कांग्रेस के बीच मुकाबला होता रहा है। कांग्रेस के दिग्गज नेता और कर्नाटक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार भी वोक्कालिग्गा जाति से आते हैं और उनका भी अपने समुदाय में प्रभाव है। डीके शिवकुमार वोक्कालिग्गा समुदाय को यह संदेश पहुचाने में जुटे है कि कांग्रेस की सरकार आने पर वह मुख्यमंत्री बनेंगे ऐसे में वोक्कालिंगा कांग्रेस को मतदान करें जद(एस) को नहीं क्योकि जद(एस) को दिया गया वोट भाजपा को मजबूत करेगा और भाजपा की सरकार आने पर लिंगायत मुख्यमंत्री बनेगा, वोक्कालिग्गा नहीं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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