Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

JDS Karnataka: कर्नाटक में सत्ता के सच्चे 'सेकुलर' सौदागर

कर्नाटक में देवगौड़ा की जेडीएस को न कांग्रेस से परहेज है और न ही भाजपा से। अगर परहेज है तो इन दोनों दलों को मिलनेवाले पूर्ण बहुमत से। अगर किसी को भी पूर्ण बहुमत मिला तो सबसे बड़ी हार जेडीएस की ही होगी।

Karnataka election 2023 analysis of JDS vs bjp and congress maths

JDS Karnataka: अगले महीने 18 मई को अपने जीवन का 90 वां जन्मदिन जेडीएस के समर्थकों के साथ धूमधाम से मनाने के लिए एच.डी. देवगौड़ा ने 26 मार्च को मैसूर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि जनता दल (सेक्युलर) की सरकार बनाने से बेहतर उनके लिए जन्मदिन का कोई और तोहफा नहीं हो सकता। उनके बेटे एच.डी. कुमारस्वामी ने उत्साह में भरकर कहा कि डॉक्टर ने इतने महीनों में उपचार से उनके शरीर को जितनी राहत पहुंचाई, उससे ज्यादा लाभ तो यहां उमड़ी भीड़ ने पहुंचा दिया। देवगौड़ा इस उम्र में भी फिर से प्रचार करने के लिए सड़को पर हैं।

जनता दल (सेक्युलर) के कार्यकर्ताओं के लिए वयोवृद्ध देवेगौड़ा द्वारा रैली का मतलब है कि पार्टी अपनी वापसी के लिए आशान्वित है और उसके संरक्षक नया जोश भरने आए हैं। देवगौड़ा ने पार्टी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया, "हमारा संघर्ष यहां से फिर से शुरू होता है।" अपने खराब स्वास्थ्य के कारण देवगौड़ा ने सार्वजनिक सभाओं में जाना लगभग बंद कर दिया था लेकिन पिछले चुनावों की तरह इस चुनाव में भी जेडीएस को कांग्रेस और भाजपा से मिल रही दोहरी चुनौतियों से निपटने और अपनी जमीन बचाने के लिए देवगौड़ा को अपने बेटे कुमारस्वामी का सारथी बनकर जमीन पर उतरना पड़ा है।

देवगौड़ा परिवार की घर की पार्टी जेडी (एस) को जनता दल से अलग होकर अस्तित्व में आए 24 साल हो चुके हैं। 2019 के मध्य में कर्नाटक की सत्ता से बाहर हो चुकी जेडीएस तीन बार गठबंधन सरकारों का हिस्सा रही है, लेकिन इनमें से कोई भी गठबंधन 20 महीने से अधिक नहीं चला। जेडीएस ने गठबंधन की पहली सरकार 2004 में कांग्रेस के साथ, फिर 2006 में भाजपा के साथ और 2018 में फिर से कांग्रेस के साथ बनाई थी। लेकिन कोई भी गठबंधन देवगौड़ा परिवार को पूरे पांच साल सत्ता का सुख नहीं दे सका।

जेडीएस बनने के बाद से हर विधानसभा चुनाव में देवगौड़ा परिवार सत्ता की धुरी रहा है। कांग्रेस और भाजपा का कर्नाटक में प्रदर्शन जेडीएस के प्रदर्शन पर निर्भर रहा है। वोक्कालिग्गा वोटबैंक पर मजबूत कब्जा रखने वाले देवगौड़ा परिवार की इसी अहमियत को भाजपा और कांग्रेस अच्छे से समझते हैं। इसी कारण दोनों राष्ट्रीय दल अपने चुनाव प्रचार में मतदाताओं को लगातार सावधान कर रहे हैं कि जेडीएस को वोट देकर त्रिंशकु स्थिति बनाने से बेहतर है कि किसी एक पार्टी को ही सत्ता में लेकर आएं। मोदी और शाह अपने प्रचार में जेडीएस के परिवारवाद को लगातार निशाना बनाते रहे हैं लेकिन देवगौड़ा की अपने क्षेत्र में लोकप्रियता का आलम ही है कि परिवारवाद के तमाम आरोपों के बाद भी देवगौड़ा का पूरा परिवार राजनीति में सक्रिय है।

देवगौड़ा परिवार के छह सदस्य वर्तमान में किसी न किसी सदन के सदस्य हैं। देवगौड़ा खुद राज्यसभा सदस्य हैं। देवेगौड़ा के बड़े बेटे एच.डी. रेवन्ना, देवगौड़ा के गृहनगर हासन जिले के होलेनरसीपुरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुमारस्वामी और उनकी पत्नी अनीता क्रमशः चन्नापटना और रामनगर से विधायक हैं। 2019 के बाद से, रेवन्ना के बेटे प्रज्वल और सूरज ने भी राजनीतिक कैरियर शुरू कर दिया है। प्रज्वल हासन से लोकसभा सांसद हैं जबकि सूरज विधान परिषद के सदस्य है। अब अनीता की जगह उनके बेटे निखिल को रामनगर के उम्मीदवार के रूप में स्थापित किया जा रहा है। जबकि बसाने विधानसभा सीट के लिए खुली लड़ाई चल रही है। यहां से रेवन्ना की पत्नी भवानी पार्टी का टिकट चाहती है।

कर्नाटक के इस विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर में जेडीएस किंग मेेकर बन सकता है। मतदान का दिन जैसे जैसे करीब आ रहा है, जेडीएस की संभावना हरी होने लगी है। इस लेख को लिखे जाने तक भाजपा उम्मीदवारों की एक भी सूची जारी नहीं हुई है और कांग्रेस ने 58 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा रोककर रखी है। कांग्रेस में टिकट न मिलने से बगावत के उभर रहे सुर और भाजपा मे भी टिकट न मिलने पर बगावत की गंध में जेडीएस अपने लिए बेहतर अवसर देख रही है।

कर्नाटक में जेडीएस ने पूरा ध्यान किसी भी तरह 50 सीटें जीतने पर केन्द्रित कर दिया है। देवगौड़ा को इस बात का एहसास है कि जेडीएस के 50 विधायक आने पर भाजपा और कांग्रेस दोनों को 224 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने के लिए जेडीएस को साथ लेना मजबूरी हो जाएगी। जेडीएस कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ सरकार बना सकता है क्योकि अतीत में वह इनके साथ गठबंधन में रह चुका है। जेडीएस को यह बात अच्छे से पता है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों उसके साथ सरकार बनाने को तत्काल तैयार हो जाएंगे।

जेडीएस दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए अछूत नहीं है। इसका उदाहरण 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम में देखा जा सकता है। 2018 के चुनाव के अंतिम परिणाम आते ही सोनिया गांधी ने राहुल गांधी के आवास पर पहुंचकर देवगौड़ा से बात की और गुलाम नबी आजाद को तुरंत कुमारस्वामी से मिलने उनके घर भेजा। 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने कर्नाटक में 78 सीटें जीती थी जबकि जेडीएस ने कांग्रेस से आधे से भी कम 37 सीटें जीती थी। इसके बाद भी कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का पद कुमारस्वामी को देने का ऑफर दिया।

जनता दल (सेकुलर) का वोट प्रतिशत 2004 से 18 के बीच 20 प्रतिशत बना हुआ है। सीटों के हिसाब से देखें तो 1999 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जेडीएस को 10 सीटें, 2004 में 58 सीटें, 2008 में 28 सीटें, 2013 में 40 सीटें और 2018 में 37 सीटें मिली थी। अपने पिछले प्रदर्शन को देखते हुए अगर देवगौड़ा 50 सीटों का टार्गेट लेकर चल रहे हैं तो कुछ गलत नहीं है। इतनी ही सीटें जेडीएस को मुख्यमंत्री पद दिला सकती है।

कम से कम 50 सीट हासिल करने के लिए देवगौड़ा परिवार इमोशनल कार्ड भी खेल रहा है। एचडी देवगौड़ा ने मैसूर की रैली में कहा कि 'हो सकता है कि यह उनके जीवन का अंतिम विधानसभा चुनाव हो और अगला चुनाव देखने के लिए वह जिंदा न रहे। लेकिन वह इस अंतिम चुनाव में जेडीएस की सरकार देखना चाहते हैं।" देवगौड़ा मतदाताओं को याद दिलाने की कोशिश करते हैं कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री का उनका कार्यकाल बेहद छोटा रहा लेकिन उन्होंने कर्नाटक में सभी वर्गो-महिलाओं, दलितों और मुसलमानों के लिए काम किया। देवगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी भी मतदाताओं से भावनात्मक अपील कर कह रहे हैं कि उनके मुख्यमंत्री के दोनों कार्यकाल केवल 20 महीने और 14 महीने तक चले। अब मुझे पांच साल मुख्यमंत्री बनाने के लिए पूर्ण बहुमत नहीं दे सकते तो कम से कम 50 सीटें जरूर दें।

कुमारस्वामी ने कांग्रेस और भाजपा की भव्य रैलियों के उलट 'अपन पंचरत्न यात्रा' के दौरान छोटे शहरों और गांवों पर ध्यान केन्द्रित किया है। जेडीएस के पांच सूत्रीय एजेंडे में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, कृषि और आवास के कार्यक्रम शामिल हैं। जेडीएस ने ऐसी सीटों पर भी ज्यादा जोर लगाया है जो उन्होंने कम मार्जिन से हारी थीं। पांच हजार से कम मार्जिन से 2018 में जेडीएस ने छह सीटें और दस हजार के अंतर से 10 सीटे गंवाई थी। 2018 में अपनी जीती सीटों के साथ इन हारी हुई सीटों पर भी जेडीएस का फोकस है।

लेकिन पार्टी के नेताओं के दलबदल ने जेडीएस की राह को मुश्किल कर दिया है। गुब्बी के विधायक एस आर श्रीनिवास और कोलार केे विधायक के श्रीनिवास ने पिछले साल राज्यसभा चुनाव में क्रास वोटिंग कर जेडीएस का साथ छोड़ दिया था। अभी कुछ दिन पहले ही अर्सीकेर के विधायक के एम शिवलिंगे गौड़ा और अर्कालगुड विधायक एटी रामास्वामी ने भी जेडीएस को अलविदा कह दिया था।

ऐसे में आंतरिक विद्रोह से जूझ रही और चुनाव बाद कई विधायकों के पाला बदलने के डर के बाद भी देवगौड़ा हर हाल में कर्नाटक को कांग्रेस और भाजपा के पूर्ण बहुमत से बचाना चाहते हैं। उनकी यह मुहिम कितनी रंग लाती है इसे देखने के लिए 13 मई मतगणना के दिन तक इंतजार करना होगा।

यह भी पढ़ें: Amul बेस्ट या Nandini, कर्नाटक में छिड़ी जंग, जानिए दोनों कंपनियों ने कितना रखा है दूध का भाव?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+