Regional Parties: मोदी को ही नहीं, तीसरे मोर्चे को भी बढ़ा खतरा
इन चुनाव नतीजों से तीसरे मोर्चे की उन गैर कांग्रेसी सेक्यूलर पार्टियों को धक्का लगा है, जो मुस्लिम वोटों की बदौलत कांग्रेस को ब्लैकमेल करके एक ऐसा गठबंधन बनाना चाहती थीं, जिसमें लोकसभा की आधी से ज्यादा सीटें वे लड़तीं।

Regional Parties: हिमाचल प्रदेश के बाद कर्नाटक में कांग्रेस की आसान जीत को भाजपा हल्के से नहीं ले सकती| दोनों ही राज्यों में कांग्रेस को बहुत बढ़िया बहुमत मिला, इन दोनों ही राज्यों में मध्यप्रदेश या कर्नाटक दोहराए जाने की कोई संभावना नहीं है| पिछली बार भाजपा ने विपक्ष के बहुत कम बहुमत के कारण तोड़ फोड़ करके सरकारें गिरा दी थीं|

कर्नाटक में 34 साल का रिकार्ड टूटा है| 34 साल पहले कांग्रेस को 43.76 फीसदी वोट और 178 सीटें मिलीं थीं| इस बार सीटें भले ही 135 मिली लेकिन वोट उतने ही प्रतिशत मिल गए हैं | हिमाचल में तो कांग्रेस भाजपा का सीधा मुकाबला था, लेकिन कर्नाटक में तो तीसरी ताकत जेडीएस भी थी| जेडीएस के कारण त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणियाँ की जा रही थीं|
कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने का सबसे बड़ा कारण यह है कि दलित, आदिवासी और मुस्लिम कांग्रेस की और लौट आए हैं| अगर यही ट्रेंड सारे देश में चलता है, तो भाजपा के लिए राज्य विधानसभाओं में जीतना तो मुश्किल होगा ही, लोकसभा चुनावों में भी मुश्किल हो सकती है| अब यह चर्चा चल रही है कि लोकसभा चुनाव में भी कर्नाटक दोहराया जाएगा| गैर कांग्रेसी विपक्षी नेता भी बहुत उत्साहित हैं कि सबने मिलकर चुनाव लड़ा, तो 2024 में मोदी को हराना मुश्किल नहीं| ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, स्टालिन, महबूबा मुफ्ती, शरद पवार, उद्धव ठाकरे सभी के बयान इसी लाईन पर आए हैं|
लेकिन वे समझ नहीं पा रहे कि कर्नाटक के नतीजे कोई विपक्षी एकता के कारण नहीं आए| कांग्रेस ने कर्नाटक में तीसरे मोर्चे की बड़ी ताकत जेडीएस के बावजूद बल्कि जेडीएस की कीमत पर चुनाव जीता है| कर्नाटक चुनाव नतीजों का मतलब यह है कि कांग्रेस ने तीसरे मोर्चे की बढ़ती ताकत को रोक दिया है| जेडीएस का कोई भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता, जबकि कांग्रेस के 15 मुस्लिम उम्मीदवारों में से 9 जीते हैं| जेडीएस ने कांग्रेस से डेढ़ गुणा यानि 22 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिये लेकिन इनमें से एक भी नहीं जीता|
यह साफ़ संकेत है कि 90 के दशक में बाबरी ढांचा टूटने के बाद कांग्रेस को छोड़ कर छोटे छोटे सेक्यूलर दलों की ओर गया मुसलमान एकमुश्त कांग्रेस की तरफ लौटना शुरू हो गया है| कर्नाटक विधानसभा चुनाव से ठीक एक महीने पहले वाराणसी में मुस्लिम बुद्धिजीवियों की एक चर्चा हुई थी, इस चर्चा में यह आवाज निकली थी कि मुसलमानों को कांग्रेस की ओर लौटना होगा| उसी आवाज के नतीजे कर्नाटक में परिलक्षित हुए हैं| करीब 82 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों ने एकमुश्त कांग्रेस को वोट दिया है, जबकि जनता दल सेक्युलर को सिर्फ पंद्रह प्रतिशत का ही समर्थन मिला| मुस्लिम प्रभाव वाली 65 सीटों में से आधी कांग्रेस ने जीती हैं|
इन चुनाव नतीजों से तीसरे मोर्चे की उन गैर कांग्रेसी सेक्यूलर पार्टियों को धक्का लगा है, जो मुस्लिम वोटों की बदौलत कांग्रेस को ब्लैकमेल करके एक ऐसा गठबंधन बनाना चाहती थीं, जिसमें लोकसभा की आधी से ज्यादा सीटें वे लड़तीं| वह 1996 जैसा प्रयोग होता, जिसमें गैर कांग्रेसी दलों की सीटें कम से कम कांग्रेस के बराबर होतीं, और सरकार बनने की स्थिति आती तो कांग्रेस का प्रधानमंत्री नहीं बन पाता|
इसी रणनीति के तहत नीतीश कुमार पर्दे के पीछे जनता दल के विभाजित दलों का विलय करवा कर 1996 जैसा जनता दल बनाने की कोशिश में जुटे हुए थे| इस ऑपरेशन में जनता दल के डीएनए वाले जनतादल यू, जनतादल एस, राष्ट्रीय जनता दल, बीजू जनता दल और समाजवादी पार्टी शामिल होते| इसी सिलसिले में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने पिछले दिनों नवीन पटनायक से मुलाक़ात की थी, लेकिन नवीन पटनायक ने जनता दल में विलय और गैर भाजपा मोर्चा बनाने के दोनों प्रस्तावों को ठुकरा दिया|
नीतीश कुमार समझ रहे थे कि कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा आएगी, तो जनता दल एस के कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बन जाएंगे| लेकिन नीतीश कुमार को दोनों ही मोर्चों पर सफलता नहीं मिली, पहले नवीन पटनायक ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया और बाद में कर्नाटक में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल गया| इसलिए कर्नाटक के चुनाव नतीजे अगर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ा झटका है, तो गैर कांग्रेस सेक्यूलर दलों को भी बड़ा झटका है, जो कांग्रेस पर भारी पड़ने की कोशिश कर रहे थे|
हिंदुत्व में फिर बिखराव
कर्नाटक के चुनाव नतीजों का एक दूसरा भावार्थ भी है। वह भावार्थ यह है कि कर्नाटक में हिंदुत्व की हार हुई है, और भाजपा के लिए दक्षिण का द्वार बंद हो गया है| भारतीय राजनीति में हिंदुत्व का उदय रामजन्मभूमि आन्दोलन से हुआ था| 90 के दशक तक ब्राह्मण, दलित, आदिवासी, ओबीसी और मुस्लिम कांग्रेस का कोर वोट बैंक था|
राजनीति में बड़े बदलाव की शुरुआत कमंडल राजनीति के साथ 90 में शुरू हुई थी, जिससे कांग्रेस का ओबीसी वोट बैंक गैर कांग्रेस सेक्यूलर दलों की तरफ चला गया था। उस समय मुलायम सिंह और लालू यादव की जातीय राजनीति का उदय हुआ| उसी समय रामजन्मभूमि आन्दोलन और बाबरी ढांचा टूटने के कारण कांग्रेस का मुस्लिम वोट भी उन्हीं गैर कांग्रेस सेक्यूलर दलों की ओर खिसक गया|
हिंदुत्व के उदय के साथ सवर्ण हिन्दुओं, आदिवासियों और दलितों के एक वर्ग का झुकाव भाजपा की ओर होने लगा| हालांकि दलितों का एक बड़ा वर्ग कांशीराम और मायावती की पार्टी बसपा का कोर वोट बैंक बन गया था| 2014 में नरेंद्र मोदी की अगवानी में हिंदुत्व की राजनीति का फेज-टू शुरू हुआ तो दलित और ओबीसी भी भाजपा की ओर खिसक गए| जिससे कांग्रेस के बाद बसपा, सपा, राजद और जनता दल यू जैसे दलों को भी नुकसान हुआ|
कर्नाटक का संकेत यह है कि न सिर्फ गैर कांग्रेसी सेक्यूलर दलों की ओर गया मुस्लिम कांग्रेस की ओर लौटा है, बल्कि भाजपा की तरफ गया दलित, ओबीसी और आदिवासी वोट भी कांग्रेस की ओर लौटना शुरू हो गया है| 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में दलितों की आरक्षित 35 सीटों में से 16 सीटें भाजपा जीती थी, लेकिन इस बार घटकर 12 हो गई, आदिवासियों की आरक्षित 16 सीटों में से भाजपा को 6 मिलीं थी, इस बार एक भी नहीं मिली|
कुछ लोग यह समझते हैं कि कांग्रेस ने जेडीएस का पांच प्रतिशत वोट खा कर बढ़ोतरी हासिल की है, जबकि भाजपा के लिए वोट बढ़ाने का स्कोप नहीं था| इसलिए वह सत्ता से बाहर हो गई, हालांकि उसने अपना 36 प्रतिशत वोट सुरक्षित रखा है, इसलिए भाजपा को कोई खतरा नहीं है| वे यह भी समझते हैं कि जिस तरह 2019 में भाजपा ने 28 में से लोकसभा की 25 सीटें जीत ली थीं, उसी तरह 2024 में भी 25 सीटें जीत जाएगी|
लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कर्नाटक में 50 प्रतिशत वोट मिले थे, जिसे वह विधानसभा चुनाव में बरकरार नहीं रख पाई| 2018 के चुनाव नतीजों में भाजपा को सर्वाधिक 105 सीटें मिली थीं, जब कांग्रेस और जेडीएस ने भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए हाथ मिला था, तो 2019 में उसकी प्रतिक्रिया में भाजपा को बंपर फायदा हुआ था| 2023 का नतीजा यह है कि 2020 में अपनी सरकार बनाने के बाद भाजपा 2019 के वोट को बरकरार नहीं रख पाई| भाजपा ने भले ही 2018 वाला 36 प्रतिशत का आंकड़ा बरकरार रखा है, लेकिन जिस जातीय संतुलन को उसने 2018 और 2019 में साधा था, उसका विश्वास खो दिया है|
भाजपा के लिए खतरे की घंटी यह है कि सब का साथ, सब का विकास और सबका विश्वास उसके लिए आत्मघाती साबित हो रहा है| कर्नाटक के चुनाव नतीजों का एक मतलब यह भी है कि जिन हिन्दुओं ने उन्हें जिताया था, उन्हीं के हितों की रक्षा करके ही वह सत्ता में बनी रह सकती है, खासकर दलित, ओबीसी और आदिवासी| जबकि सब का विश्वास पाने के चक्कर में भाजपा की हालत "न माया मिली, न राम" वाली हो गई है|
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सवाल यह है कि मुस्लिम तो भाजपा के साथ था ही नहीं, आदिवासी और दलित भाजपा से क्यों खिसका| तो इसकी वजह है भाजपा के खोखले वादे| चुनावों से तीन महीने पहले भाजपा सरकार एससी का आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत करने और आदिवासियों के आरक्षण का कोटा तीन प्रतिशत से बढाकर सात प्रतिशत करने का वायदा करती है, लेकिन न केंद्र सरकार को कोटा बढ़वाने के लिए लिखती है, न सुप्रीमकोर्ट में याचिका डालती है|
लोकसभा में जब कांग्रेस के सांसद ने सवाल पूछा था तो केन्द्रीय मंत्री नारायण स्वामी ने कहा कि कर्नाटक में आरक्षण का कोटा बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है| भाजपा की इस कथनी और करनी के फर्क ने आदिवासियों और दलितों को भी भाजपा से दूर कर दिया| इसलिए यह समझना कि लोकसभा चुनावों में हिंदुत्व में दिखाई दे रहे बिखराव से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, यह मात्र खामख्याली है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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