Jat Agitation: जाटों को हरियाणा की भरपाई राजस्थान से होगी क्या?

Jat Agitation: जाट पहलवानों का आन्दोलन अब जाट किसान आन्दोलन में बदल गया है| दोनों ने मिलकर चुनावी राजनीति शुरू कर दी है| कभी पहलवानों के नाम पर झंडा उठाया जा रहा है, तो कभी किसानों के नाम पर| पहलवानों का मामला थोड़ा ठंडा पड़ा, तो हरियाणा में सूरजमुखी की एमएसपी का मुद्दा आ गया| हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सूरजमुखी की एमएसपी का मुद्दा हल किया तो अगले दिन पहलवानों के मुद्दे पर हरियाणा बंद| असल में यह राजस्थान के चुनाव की टूल किट है| राजस्थान के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, तो जाटों का फोकस हरियाणा से राजस्थान शिफ्ट होने वाला है|

जाटों की सब से बड़ी पीड़ा यह है कि राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका अच्छा खासा वोट बैंक होने के बावजूद वे राजनीतिक सत्ता से बाहर हो गए हैं| हरियाणा में 31 प्रतिशत होने के बावजूद पिछले दो चुनावों में मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे छिन गई| बाकी सभी जातियों ने मिल कर राजनीति और सत्ता पर से जाटों का दबदबा खत्म कर दिया है| कांग्रेस ने हरियाणा में लगभग हमेशा ही जाट मुख्यमंत्री बनाया। भजन लाल भी बिश्नोई थे, जो जाटों के समान उपजाति रखते हैं| जिसकी प्रतिक्रिया दूसरी जातियों में हुई, अगर जाट मुख्यमंत्री दूसरी जातियों को साथ ले कर चलते तो आज ऐसी स्थिति नहीं होती|

Jat Agitation farmers protest in haryana Will Jats be compensated from Rajasthan?

हरियाणा के बाद राजस्थान में 10 से 12 प्रतिशत जाट हैं, इसके अलावा 2 प्रतिशत बिश्नोई और जट्ट सिख वोटर भी हैं| चूंकि राजस्थान में जाट लगभग 50 विधानसभा सीटों पर ही सघन रूप से बसे हुए हैं तो दो सौ के सदन में 30 से 35 तक जाट विधायक जीत कर आ जाते हैं, लेकिन वहां कांग्रेस ने कभी जाट मुख्यमंत्री नहीं बनाया| इसकी वजह यह है कि अन्य किसी भी समुदाय के नेतृत्व को दूसरी जातियां स्वीकार कर लेती हैं, लेकिन जाट नेताओं को नहीं कर पाती| बहुत कम वोट प्रतिशत वाली माली जाति के अशोक गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री हैं| शिवचरण माथुर भी दो बार मुख्यमंत्री रहे, जबकि उनका जातीय आधार नगण्य था|

जाटों जितनी जनसंख्या वाले ब्राह्मण तो आधा दर्जन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे| इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 17 प्रतिशत जाट, 2 प्रतिशत सिख और बिश्नोई वोटर होने के बावजूद सिर्फ एक बार चौधरी चरण सिंह को ही मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिला| दूसरी तरफ जाटों से कम संख्या के बावजूद राजपूत राजस्थान में मुख्यमंत्री बन जाता है और यूपी में भी| राजस्थान में भाजपा ने भैरोसिंह शेखावत को तीन बार मुख्यमंत्री बनाया|

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यूपी में भी भाजपा ने पहले एक बार राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाया और अभी भी राजपूत समाज के योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं| इसलिए जाट कभी कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जाटलैंड के नाम पर अलग राज्य बनवाने का आन्दोलन भी चलाते हैं| पहलवानों का मुद्दा खत्म होने के बाद जाटलैंड का आन्दोलन भी कभी भी शुरू हो सकता है| जाटों की सत्ता पर एकछत्र पकड़ छूटने की बेसिक वजह यह है कि हरियाणा हो, राजस्थान हो या यूपी, जाट मोटे तौर पर हमेशा कांग्रेस के साथ रहा| चौधरी चरण सिंह भी पहले कांग्रेस में ही थे| वह कांग्रेस से बाहर आ कर ही यूपी के मुख्यमंत्री बन पाए थे| दूसरी तरफ राजस्थान हो या हरियाणा या यूपी, राजपूत हमेशा भाजपा के साथ ही रहा है| यूपी में अभी भी 18 राजपूत विधायक हैं, और सभी भाजपा के हैं|

जाटों को कांग्रेस से पूछना चाहिए कि उसने आज तक राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया| भाजपा को तो जब भी मौक़ा मिला उस ने जाट मुख्यमंत्री बनाए, भले ही वह दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा हों, या राजस्थान में जाट परिवार की बहू वसुंधरा राजे| यूपी और हरियाणा के जाटों का मुद्दा बदल बदल कर आन्दोलन जारी रखने का एक ही मकसद है कि अगर हरियाणा उनके हाथ से निकल गया है, तो राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री बनना चाहिए| भले ही वह भाजपा बनाए या कांग्रेस|

अभी तो जाटों का जंग ए मैदान हरियाणा है, लेकिन जल्द ही जंग ए मैदान हरियाणा से राजस्थान शिफ्ट हो जाएगा| अगर जाट आन्दोलन के कारण हनुमान बेनीवाल इतनी सीटें ले आए कि उनके बिना कांग्रेस या भाजपा का सरकार बनाना मुश्किल हुआ, तो शर्त एक ही होगी जाट मुख्यमंत्री| पूर्व राज्यपाल और यूपी के जाट नेता सतपाल मलिक राजस्थान में बड़े एग्रेसिव ढंग से भाजपा के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने भी कहा है कि अगर भाजपा वसुंधरा राजे को प्रोजेक्ट कर देती हैं, तो भाजपा जीत सकती है| मलिक भी जाट पहलवान आन्दोलन और जाट किसान आन्दोलन का हिस्सा हैं| इसलिए उनका यह बयान जाटों की रणनीति का खुलासा करने वाला है|

वसुंधरा राजे जन्म से जाट नहीं हैं, लेकिन उनका मामला अलग है| सिंधिया घराने की वसुंधरा राजे की मां नेपाल के राजपरिवार से थीं। वसुंधरा की शादी धौलपुर के जाट राजघराने में हुई थी| हालांकि राजस्थान के राजपूत वसुंधरा राजे के पिता जीवाजी राव सिंधिया को राजपूत नहीं मानते, लेकिन एक राजपूत मां की बेटी होने के नाते, राजपूत उन्हें स्वीकार करते हैं। जाट उन्हें अपनी बहू मान कर स्वीकार करते हैं| गुर्जर उन्हें अपनी समधन मान कर स्वीकार करते हैं, क्योंकि वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह की शादी गुर्जर परिवार में हुई है| भाजपा आज वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर दे तो राजस्थान में जाट आन्दोलन सिर्फ हनुमान बेनीवाल तक सीमित हो जाएगा, जिनका वसुंधरा राजे से 36 का आंकड़ा है, इसीलिए वह भाजपा छोड़कर गए थे|

जाटों की दूसरी पीड़ा यह है कि रेसलिंग में सबसे ज्यादा मेडल जाट पहलवान लाते हैं, लेकिन रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष राजपूत है| इसलिए उनका मकसद राजस्थान में जाट सीएम बनवाने के साथ रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष पद भी राजपूत से छीनना है| पहलवानों की तरफ से यह फीलर भी फेंका गया कि अगर कांग्रेस के नेता दीपेन्द्र सिंह हुड्डा स्वीकार्य नहीं हैं, तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ओपी धनखड़ को रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष बना दीजिए, लेकिन वे चाहते हैं जाट|

जबकि रेसलिंग फेडरेशन का चुनाव किसी के दबाव में नहीं बल्कि फेडरेशन के नियम कायदे के मुताबिक़ होगा| फेडरेशन के जो 54 वोटर हैं, उन्हीं में से अध्यक्ष चुना जाएगा| मुख्यमंत्री की कुर्सी हो या रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष पद, सभी समुदायों को साथ लेकर चलना पड़ता है| जाटों में यह खुलापन होता तो पहलवानों का आन्दोलन सिर्फ जाट पहलवानों का आन्दोलन बन कर नहीं रहता|

जनवरी में जब आन्दोलन शुरू हुआ था, तो दूसरे राज्यों से भी पहलवानों का समर्थन मिला था, लेकिन जल्द ही यह बात उजागर हो गई कि यह जाटों की सत्ता की लड़ाई है, तो वे पीछे हट गए| हरियाणा के जाट पहलवान उन्हें आन्दोलन में भी साथ लेकर नहीं चल पाए| जाटों में सबको साथ लेने की कला होती तो हरियाणा में सभी जातियां उनके खिलाफ लामबंद नहीं होती, जैसे अब हो गई हैं, और सबने मिलकर उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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