जम्मू कश्मीर में शुरू हुई चुनाव कराने की तैयारी

मोदी-शाह की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी जिस राजनैतिक राष्ट्रवाद की 'साधना' में लगी है और उसमें जल्द ही जम्मू कश्मीर राज्य का नाम भी जुड़नेवाला है। सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज रंजना प्रकाश देसाई के अध्यक्षता वाले परिसीमन आयोग का काम पूरा होने के बाद अब केन्द्र सरकार जम्मू कश्मीर में इसी साल के अंत तक चुनाव करवाने की तैयारी में है। चुनाव आयोग ने भी केन्द्र सरकार को जानकारी दी है कि 31 अक्टूबर तक वह संशोधित मतदाता सूची तैयार कर लेगा।

jammu kashmir assembly elections Preparations

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले परिसीमन आयोग ने 20 दिसंबर 2021 को दिल्ली में जम्मू कश्मीर के नेताओं के साथ बैठक की थी । इस बैठक में 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों के जिलावार आवंटन का मसौदा इन नेताओं से साझा किया गया जिसमें जम्मू के लिए छह और कश्मीर के लिए एक सीट का विस्तार प्रस्तावित था।

जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 लागू होने के बाद अब जम्मू कश्मीर में विधानसभा में कुल सीटें बढ़कर 114 हो गई है। इनमें से 24 सीटें सिर्फ नाम के लिए है, क्योकि वे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पीओके से संबधित हैं। जम्मू कश्मीर को अब जो 90 सीटें मिली है, उनमें जम्मू का हिस्सा 37 से बढ़कर 43 हो गया जो कि कश्मीर की सीटों की संख्या के करीब आ गया है। कश्मीर में अब बस जम्मू से चार सीटें ज्यादा हैं यानी 47 विधानसभा सीट।

गौरतलब है कि 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को मिलाकर विधानसभा की कुल 87 सीटें थीं। इसमें 4 सीटें लद्दाख की शामिल थीं, लेकिन लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल 83 सीटें रह गई थीं। परिसीमन के बाद 7 सीटें बढ़ी हैं। इसके बाद कुल सीटों की संख्या 90 हो गई है। इसमें जम्मू में 43 और कश्मीर में 47 विधानसभा क्षेत्र बनाए गए हैं। इसमें 9 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए भी आरक्षित की गई हैं।

परिसीमन का मुख्य आधार आमतौर पर आबादी होती है, लेकिन केवल आबादी पर निर्भर करने के बजाय आयोग ने भूगोल, स्थलाकृति और अंतरर्राष्ट्रीय सीमा से नजदीकी पर भी विचार किया। जम्मू में हर निर्वाचन क्षेत्र की आबादी करीब 1,25,000 है, जबकि कश्मीर में यह 1,45,000 है। जम्मू-कश्मीर में आखिरी बार परिसीमन 1995 में तब हुआ था, जब वहां राष्ट्रपति शासन लागू था। तब वहां विधानसभा की सीटें 76 से बढ़ाकर 87 की गई थीं, जिनमें जम्मू की सीटें 32 से बढ़ाकर 37 और कश्मीर की सीटें 42 से बढ़ाकर 46 की गई थीं। 2002 में जम्मू-कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार ने राज्य के परिसीमन को 2026 तक के लिए टालने का प्रस्ताव पारित किया था।

जम्मू डिवीजन की विधानसभा सीटें बढने पर न केवल कश्मीर डिवीजन के लोग शिकायत कर रहे हैं बल्कि जम्मू डिवीजन के नेता भी खुश नहीं है। भले ही केन्द्र सरकार को यह पूरी कवायद रास आ रही हो लेकिन जम्मू कश्मीर के स्थानीय नेता इसे पंसद नहीं कर रहे हैं। जम्मू के लोगों का कहना है कि जम्मू को 20 नई सीटें मिलना चाहिए थी, क्योकि कश्मीरी पंडित यहां बसे हैं और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो केन्द्र को पीओके के लिए आरक्षित 24 सीटें जम्मू के लोगों में बांट देना चाहिए। वहीं कुछ नेताओं का कहना है कि जम्मू में बसे पीओके के विस्थापित बाशिंदों को पीओके के लिए आरक्षित 24 सीटों से आरक्षण देना चाहिए।

कश्मीर के लोगों का कहना है कि परिसीमन की कवायद के मूल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण है। वे कहते है कि अगर आबादी मुख्य कसौटी है तो कश्मीर को 51 सीटें मिलना चाहिए थी। इस संदर्भ में जम्मू को छह और कश्मीर को केवल एक नई सीट देकर राजनैतिक सत्ता संतुलन कश्मीर के बजाय जम्मू के पक्ष में झुकाने की कोशिश की गयी है।

जम्मू कश्मीर में हिंदू मुख्यमंत्री देखना भाजपा की पुरानी ख्वाहिश है और जम्मू को अतिरिक्त सीटें देना इसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। बहरहाल परिसीमन के बाद हुए इन बदलावों के बाद जम्मू की 44% आबादी 48% सीटों पर वोटिंग करेगी। कश्मीर में रहने वाले 56% लोग बची हुई 52% सीटों पर मतदान करेंगे। अभी तक कश्मीर के 56% लोग 55.4% सीटों पर और जम्मू के 43.8% लोग 44.5% सीटों पर वोट करते थे।

गौरतलब है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सिर्फ एक बार 2014 में जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए थे। उस समय किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। करीब तीन महीने बाद 1 मार्च 2015 को मुफ्ती मोहम्मद सईद दूसरी बार भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने, लेकिन 7 जनवरी 2016 को उनके निधन के बाद लगभग 3 महीने प्रदेश में फिर से राष्ट्रपति शासन रहा। इसके बाद फिर से भाजपा के समर्थन से मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती 4 अप्रैल 2016 को प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन भाजपा के समर्थन वापस लेने के कारण 9 जून 2018 को महबूबा मुफ्ती की सरकार गिर गई थी।

ताजा परिसीमन और राजनैतिक गुणा गणित से इतना तो स्पष्ट है कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भाजपा की सरकार बनाने की मुहिम में जुटी भाजपा के लिए अब जम्मू कश्मीर में सरकार बनाना मुश्किल नहीं होगा। यह लगभग तय है कि इसी साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों के साथ केन्द्र सरकार जम्मू कश्मीर में भी चुनाव करवाने और भाजपा का मुख्यमंत्री देने का मन बना चुकी है। नरेन्द्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद कहा था कि ''उनकी इच्छा है कि जिस जम्मू कश्मीर में हमारे वैचारिक मार्गदर्शक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने प्राण त्यागे, उसी राज्य में हम अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि दें।" लगता है जम्मू कश्मीर में मोदी की इच्छा पूरी होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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