India on Moon: इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ
India on Moon: पीयूष मिश्रा की एक प्रसिद्ध कविता है।
"इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ,
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ,
हम चाँद पे रोटी की चादर डाल कर सो जाएँगे,
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे।"
पीयूष मिश्रा अपनी इस कविता में चांद और रोटी की जो तुलना करते हैं वह भारत के भौतिक और वैज्ञानिक प्रगति की भी तुलना है। भारत में एक वर्ग है जो वैज्ञानिक प्रगति पर यह कहकर सवाल उठाता रहा है कि क्या इससे गरीब को रोटी मिल जाएगी? चंद्रयान-3 की सफलता पर दबे स्वर में यह आवाज एक बार फिर सुनाई दी है।

वैसे तो यह तुलना ही बेमतलब है। एक आम की तुलना करनी ही हो तो दूसरे आम से की जानी चाहिए। आम की तुलना अमरुद से, या पपीते से नहीं की जा सकती। ऐसे में जब कुछ लोग चंद्रयान जैसी वैज्ञानिक उपलब्धि पर पूछते हैं कि "क्या इससे गरीब को रोटी मिल जाएगी?" तो यह सवाल भी बचकाना ही कहा जाएगा।
अंतरिक्ष विज्ञान अपार संभावनाओं का क्षेत्र है जिसे काफी पहले ही मौजूदा सरकार ने पहचान लिया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात करें तो अंतरिक्ष विज्ञान 546 बिलियन डॉलर का वैश्विक बाजार भी है। सिर्फ भारत की बात करें तो इस क्षेत्र में भारत 2025 तक 13 बिलियन डॉलर के कारोबार पर पहुँच पायेगा। अगर इसी क्षेत्र में हम लोग ऑस्ट्रेलिया से तुलना कर लें तो नजर आता है कि उनके पास "ऑस्ट्रेलियन सिविल स्पेस स्ट्रेटेजी 2019-28" तैयार है। इन योजनाओं के जरिए वो 2030 तक इस क्षेत्र के निजी कारोबार को बढ़ाकर 12 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर पहुँचना चाहते हैं।
निजी क्षेत्र के दोगुने हो जाने से ऑस्ट्रेलिया में 2030 तक इस क्षेत्र में कम से कम 20,000 नए रोजगार पैदा हो जायेंगे। इनकी तुलना में भारत की जो तथाकथित समाजवादी व्यवस्था है, उसमें निजी उद्यमों को शंका और हेय दृष्टि से देखे जाने की परंपरा ही रही है। निजी निवेश इस क्षेत्र में न हो और न ही बढ़े, इसके लिए लाइसेंस-परमिट राज ने अथक प्रयास किये हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र में सत्तर वर्षों में शायद ही कोई निजी उपक्रम शुरू होते दिखते हैं।
सिर्फ पिछले एक दशक में अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अंतरिक्ष क्षेत्र का योगदान करीब 91 प्रतिशत बढ़ चुका है। पिछले अंतरिक्ष अभियानों की मदद से जल परिशोधन में मदद मिली और पीने के साफ पानी के क्षेत्र में काम हुआ। स्टारलिंक के जरिए करीब-करीब हर व्यक्ति तक इन्टरनेट की पहुँच और शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव सामने आये हैं। आज विश्व भर में दूर-दराज के विद्यालयों में जो स्मार्ट क्लासरूम बनने लगे हैं तो वह अन्तरिक्ष क्षेत्र में किये गये शोध का ही परिणाम है। जीपीएस, सैटॅलाइट इमेजिंग इत्यादि के जरिए भी जनजीवन में व्यापक बदलाव आये हैं।
सोचिए कि आज डिलीवरी बॉय की गाड़ी पर लगा जो गूगल मैप उसकी मदद कर रहा होता है, उसने क्या परिवर्तन ला दिया है। या फिर किसी हिल स्टेशन, किसी पर्यटक स्थल के लिए कोई कार से निकले तो रास्ते में खाने का कोई अच्छा ढाबा/रेस्तरां कैसे ढूंढता है? दूर-दराज की किसी जगह ढाबा खोले बैठे छोटे से व्यापारी के जीवन में क्या सेटेलाइट नेविगेशन और गूगल की मदद से बदलाव आया है। उसका व्यापार क्या अब अधिक प्रसिद्ध नहीं हुआ है? लाखों के विज्ञापन पर खर्च करने में असमर्थ व्यापारियों की आजीविका पर इससे असर पड़ा है। यानी चांद पर पहुंचने की जद्दोजहद में गरीब की रोजी रोटी के उपाय भी सरल हुए हैं।
हाल ही में एलन मस्क ने जब ट्विटर पर नियंत्रण ले लिया तो शायद भारतीय लोगों का भी ध्यान गया होगा कि अन्तरिक्ष विज्ञान का क्षेत्र कितना बड़ा होता है। आज वो चंद्रयान की प्रशंसा कर रहे हैं और भारत को बधाई भी दे रहे हैं लेकिन मस्क अपने असफल राकेट का भी खुद ही मजाक उड़ाने के लिए जाने जाते हैं। भारत में इसी क्षेत्र को देखें तो समाजवाद की चपेट में आई सरकारों ने वर्षों तक इस पर बहुत कड़ा नियंत्रण रखने की कोशिश की। जिसे भारत में उदारवाद का दौर कहते हैं, उस समय (1992) में एंट्रिक्स नाम की एक सरकारी कंपनी स्थापित हुई जो इसरो के भी विपणन (मार्केटिंग) का काम देखने लगी। अन्तरिक्ष में उपग्रह भेजना सस्ता सौदा नहीं होता, फिर भी भारत जिस मूल्य पर ये कर सकता है, वो अन्य जगहों की तुलना में काफी सस्ता है।
एंट्रिक्स का काम 2019 से न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) देखती है। एनएसआईएल के बाद आया स्पेस एक्स जिसने ऐसी कीमतों पर काम शुरू किया कि 2018 तक वैश्विक व्यावसायिक प्रक्षेपण (कमर्शियल लॉन्च) बाजार का करीब 65 प्रतिशत बाजार इसके हाथ में था। इनके पीछे कई निजी उद्यमियों ने काम करना शुरू किया। निजी उपक्रमों के आने की गति बहुत धीमी थी और 2012 तक सिर्फ ध्रुव स्पेस नाम की ऐसी कंपनी ही शुरू हुई थी, जिसका आज नाम लिया जा सकता है। व्यवस्था में बदलाव होने के बाद स्थिति बदली और 2014 के बाद भारत में बेलाट्रिक्स (2015), अग्निकुल (2017), स्काईरूट (2018) और पिक्सेल (2019) जैसी निजी कंपनियां अंतरिक्ष विज्ञान में काम करने के लिए मैदान में आ गयीं।
सरकार के अन्तरिक्ष विभाग (डीओएस) के अंतर्गत "इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराईजेशन सेण्टर (इन-स्पेस) की स्थापना हुई जो सरकारी और निजी उद्यमों के बीच संपर्क का काम करती है। इससे निजी क्षेत्र को और बढ़ावा मिला और उपग्रह से लेकर रॉकेट तक भारत में बनाने के लिए निजी क्षेत्र का मार्ग खुल गया। नवम्बर 2022 में भारत से जिस पहले निजी कंपनी के रॉकेट की उड़ान की खबर आई थी, वो स्काईरूट का रॉकेट था। भारतीय अन्तरिक्ष के क्षेत्र में 2020 के बाद से और भी कई नियमों में बदलाव हुआ है। निजी कंपनियां अब इसरो के आधारभूत ढांचे का उपयोग कर सकती हैं। भारत 2023 में अपनी स्पेस पॉलिसी भी ले आया है जिससे और तेज गति से इस क्षेत्र का विकास होगा।
नए उद्यमों और बदली हुई सोच को जगह देने की दिशा में जो पहल हो रही है, उसका परिणाम भी अब अंतरिक्ष विज्ञान में दिखने लगा है। यह इस बात का उदाहरण है कि इक बगल में चांद हो तो इक बगल में रोटियां भी होती हैं। कवियों के व्यंग लाक्षणिक होते हैं लेकिन जीवन की सच्चाई कवि की कल्पनाओं जैसी हो ये जरूरी नहीं है। जीवन की सच्चाई यही है कि दोनों बगल जिस एक व्यक्ति का है वह दोनों को एक साथ साध सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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