India Pakistan Relations: जितना भरोसा किया, उतना धोखा खाया

इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक पाकिस्तान पर भरोसा करते रहे और धोखा खाते रहे। इंदिरा गांधी ने जिया उल हक पर भरोसा किया और धोखा खाया। यही हाल राजीव गांधी का था। उन्होंने बेनजीर भुट्टो पर भरोसा किया और धोखा खाया।

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अगर आपने 2021 में आई अक्षय कुमार की मूवी 'बेल बॉटम' देखी होगी, तो उसमें पाया होगा कि कैसे पाकिस्तान का तानाशाह राष्ट्रपति जिया उल हक भारत के विमानों की हाईजैकिंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। कैसे हर भारतीय विमान हाईजैक होकर लाहौर पहुंच जाता है और हर बार उन्हें छोड़ने के लिए पाकिस्तानी बिचौलियों की टीम कई आतंकवादियों को छुड़वा लेती है, और भारत सरकार से मोटा पैसा भी वसूलती है। बावजूद इसके इंदिरा गांधी जिया उल हक पर गुस्सा होने की बजाय उनका अहसान मानती है कि यात्रियों को सुरक्षित वापस भारत भेजकर भारत में उनकी फजीहत होने से बचा ली।

ये कहानी पूरी तरह फिल्मी नहीं है। हमारे देश की सबसे ताकतवर पीएम माने जाने वाली इंदिरा गांधी वाकई में एक दुश्मन देश के फौजी राष्ट्रपति पर इतना भरोसा करती थीं कि उन्हें आसानी से यकीन नहीं होता था कि ये व्यक्ति उनके खिलाफ या भारत के खिलाफ साजिश भी कर सकता था। इतना ही नहीं उस साजिश को वो अहसान भी मानती थीं। दिलचस्प बात ये है कि इसी गलती को उनके बेटे राजीव गांधी ने भी दोहराया था। वो भी इसी तरह बेनजीर भुट्टो के वायदे पर यकीन करते रहे और वो उन्हें धोखा देकर आंतकियों की फौज तैयार करती रहीं। इसका खुलासा बाद में रॉ के एक पूर्व अफसर ने किया था।

दरअसल जिया उल हक फौजी अफसर थे। जब ट्रेनिंग पर थे तो उनकी जॉर्डन में ड्यूटी लगी थी। उस वक्त इजरायल से अरब देशों का युद्ध चल रहा था। यहीं पर जिया ने जॉर्डन के शासकों को कई सलाहें देकर उनसे अपनी दोस्ती मजबूत कर ली और उसी के चलते पाकिस्तानी सेना में उनका ओहदा बढ़ गया था। जिया उल हक ने पाकिस्तान के पीएम भुट्टो की विश्वसनीयता जरुरत से ज्यादा हासिल कर ली थी। भुट्टो ने जिसे बेवकूफ समझा था, एक दिन उसी ने सत्ता से उन्हें हटाकर कब्जा कर लिया और भुट्टो को फांसी पर चढ़ा दिया।

जिया ने ऐसे ही इंदिरा गांधी का भी भरोसा जीता था। इंदिरा गांधी को समझ नहीं आया कि जिया उनसे दोस्ती क्यों करना चाहते हैं? उन्हें लगा जिया उल हक सचमुच शांति चाहते हैं इसलिए उनकी बातों पर यकीन कर लिया। हालांकि तब भी ज्ञानी जैल सिंह को शक था। दिल्ली यात्रा के दौरान जब जिया उल हक ने कहा कि पाकिस्तान भारत से अच्छे रिश्ते चाहता है, तो ज्ञानी जैल सिंह ने ठेठ पंजाबी में कहा था कि ''ए नहीं हो सकदा कि जनानी अख वी मारे, ते घंड वी कड्डे'। यानी ऐसा हो नहीं सकता कि एक एक महिला आंख भी मारे और घूंघट में भी रहे। उनका इशारा था कि भारत से दोस्ती भी रखो और खालिस्तानियों को समर्थन भी दो, ये चल नहीं सकता।

इंदिरा को समझ नहीं आई पाकिस्तान की ये 'बिचौलिया चाल'
पहले खालिस्तानी आतंकी किसी भारतीय विमान को हाईजैक करते थे, फिर उसे लाहौर ले जाते थे, एक निश्चित समय सीमा में यात्रियों को मारने की धमकी देकर कई आतंकियों को छ़ुड़ाते थे या मोटा पैसा लेते थे। इसमें पाकिस्तान ने एक बार तो अपने कमांडोज के जरिए विमान बिना कुछ लिए दिए छुडवा भी दिया था। ऐसा करके एक बार भरोसा जीता औऱ फिर कई बार बिचौलिया बनकर खूंखार आतंकियों को छुड़वाया। लेकिन इंदिरा गांधी उसे अपना हितैषी ही समझती रहीं।

बहुत बाद में इंदिरा गांधी की समझ में आया था कि जिया उल हक उन्हें धोखा दे रहे हैं। जब भिंडरावाले के सहयोगी शाबेग सिंह ने उनकी फौज की कमान संभाली तो सारे हथियार यहां तक कि रॉकेट लांचर तक आईएसआई के जरिए पाकिस्तान से मंगवाए थे। पाकिस्तान मदद ना करता तो ऑपरेशन ब्लू स्टार में ना टैंक मंगाने पड़ते और ना ही इतने लोग मरते।

जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में बनी कम्युनिस्ट सरकार पर संकट आने पर अपनी फौज सोवियत संघ पर भेजकर कब्जा कर लिया, तो अमेरिका ने वहां के कट्टर मुस्लिमों को पैसा और हथियार भेजने शुरू कर दिए।

अमेरिका ने जिया उल हक को आर्थिक मदद देकर पाकिस्तान की जमीन को सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। सोवियत संघ की दोस्त इंदिरा गांधी पर दवाब पड़ा तो इंदिरा गांधी ने जिया उल हक से 'अच्छे रिश्तों' के चलते उसे एक क्षेत्रीय समझौते में लाने की कोशिश की। सीआईए की रिपोर्ट से बाद में खुलासा हुआ था कि इंदिरा गांधी की काफी कोशिशों के बाद भी जिया उल हक ने ये समझौता नहीं किया और बाद में जिन कट्टर आतंकी तत्वों को अमेरिकी पैसे से उसने अफगानिस्तान के खिलाफ पाला पोसा था, दशकों तक उन्हें भारत में (खासतौर पर कश्मीर में) आतंक फैलाने के लिए इस्तेमाल किया था। दिखाने के लिए भारत के साथ 1981 में एक 'नॉन एग्रेसन पैक्ट' जरुर कर लिया था, लेकिन उससे आतंकियों को समर्थन में कोई कमी नहीं आई।

राजीव गांधी काल में हुआ रॉ और आईएसआई के बीच समझौता
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो वो भी जिया उल हक की बातों में आ गए। उनके जमाने में फिर जॉर्डन के शासक की पत्नी ने अहम भूमिका निभाई। दरअसल वो भारतीय मूल की थी और उसका पूरा परिवार आजादी से पहले बंगाल से पाकिस्तान चला गया था। जॉर्डन के शासक से राजीव गांधी के भी ठीक रिश्ते थे। उनकी पत्नी ने राजीव को भरोसे में लिया कि आतंकी तत्वों को लेकर रॉ और आईएसआई को आपस में सूचना साझा करनी चाहिए। फिर वो हुआ, जो भूतो ना भविष्यति है।

रॉ चीफ ए के वर्मा और आईएसआई चीफ हामिद गुल की पहली मुलाकात अम्मान में और दूसरी जेनेवा में हुई। बाद में कुछ खालिस्तानी आतंकी भी इन सूचनाओं के आधार पर गिरफ्त में आए। बेनजीर भुट्टो के समय भी ये जारी रहा लेकिन अचानक 1988 में एक प्लेन विस्फोट में जनरल जिया की मौत हो गई।

राजीव गांधी नजीबुल्ला की मान लेते तो 1990 में कश्मीर नरसंहार नहीं होता
इस दौर में भी राजीव गांधी लगातार गलतियां कर रहे थे। रॉ के एक पूर्व अधिकारी बी रामन ने लिखा है कि कैसे अफगानिस्तान के राष्ट्रपति नजीबुल्ला लगातार राजीव गांधी सरकार को संदेश पर संदेश भेज रहे थे कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में कश्मीरी लड़कों को आतंकी ट्रेनिंग दे रहा है। लेकिन राजीव गांधी उन दिनों सोच भी नहीं सकते थे कि पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो जिनसे उनके युवावस्था से मित्रवत संबंध थे, वो उन्हें धोखा भी दे सकती हैं।

बेनजीर पर भरोसे के ही कारण राजीव गांधी ने नजीबुल्ला की चेतावनी को अनसुना कर दिया। भारत को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। राजीव गांधी की सरकार गिर गई। वीपी सिंह की संयुक्त मोर्चा सरकार में उन्हीं प्रशिक्षित आंतकियों ने कश्मीर में सबसे बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया। भयानक कत्ल ए आम के बाद हजारों कश्मीरी पंडितों ने हमेशा के लिए कश्मीर छोड़ दिया। बाद में 'कश्मीर फाइल्स' जैसी मूवी 32 साल बाद आई, तब देश को सच्चाई पता चली।

मोदी सरकार में अब पाकिस्तान की धोखा देनेवाली चालें कामयाब नहीं हो पा रही हैं इसलिए खिसियानी बिल्ली की तरह पहले वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान और अब वहां के विदेश मंत्री और बेनजीर भुट्टो के बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही बुरा भला कहकर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं।

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