India GDP: चार ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से 140 करोड़ लोगों की उम्मीदें

India GDP: भारत की अर्थव्यवस्था 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुकी है। वित्त वर्ष 2023-24 की पहली तिमाही के दौरान सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, तब भारतीय अर्थव्यवस्था 3.75 ट्रिलियन डॉलर से कुछ अधिक की थी। अब आंकड़े बता रहे हैं कि भारत 18 नवंबर 2023 की देर रात को ही 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का मुकाम हासिल कर 5 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य की ओर बढ़ चला है।

भारत अभी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है। जर्मनी इस मामले में चौथे नंबर पर है जिसकी अर्थव्यवस्था 4.28 ट्रिलियन डॉलर है। इसी तरह 4.39 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ जापान तीसरे पायदान पर है। आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो जिस रफ्तार से भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ रही है अगर यह आगे भी कायम रहती है तो 2025 आते-आते भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। साइज के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था 26.7 ट्रिलियन डॉलर के साथ अमेरिका की है, वहीं दूसरे नंबर पर चीन है जिसकी अर्थव्यवस्था 19.24 ट्रिलियन डॉलर है।

India GDP: Expectations of 140 crore people from a 4 trillion dollar economy

देश पर ढाई सौ सालों तक शासन करने वाले अंग्रेजों की अर्थव्यवस्था को पछाड़कर भारत पिछले साल ही दुनिया की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था। 10 साल पहले जब हमारी अर्थव्यवस्था 11वें स्थान पर थी, ब्रिटेन तब भी पांचवें नंबर पर था। वर्ष 2014 में एनडीए के सत्ता में आने के समय भारतीय अर्थव्यवस्था दो ट्रिलियन डॉलर की थी, तब 3 ट्रिलियन डॉलर के साथ ब्रिटेन पांचवें स्थान पर था। फ्रांस, ब्राजील, इटली और रूस क्रमशः छठवें, सातवें, आठवें, और नवें स्थान पर थे। पिछले 10 सालों में भारत एक-एक करके सबको पीछे छोड़ आज 4 ट्रिलियन डॉलर के सम्मानजनक स्तर को पार कर चुका है।

फिलहाल विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत का योगदान 3.6 प्रतिशत है जबकि 2014 में यह 2.6% था। भारत के विकास की गति को देखते हुए पहले यह अनुमान लगाया गया था कि भारत 2027 तक दुनिया की चौथी और 2029 तक दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन सकता है। लेकिन ताजा आंकड़ों तथा रिजर्व बैंक के गवर्नर के उत्साहजनक बयान से यह उम्मीद जगती है कि भारत समय से पहले ही लक्ष्य प्राप्त कर लेगा।

पहले रूस यूक्रेन युद्ध, फिर इजराइल और हमास के बीच सीधी जंग के कारण तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा अन्य कारकों से दुनिया के अनेक हिस्सों में आर्थिक गतिविधियां सुस्त है, जबकि भारत में लगातार कारोबारी माहौल बेहतर हो रहा है। विश्व बैंक के 10 मानदंडों के आधार पर इज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग में भी भारत ऊपर चढ़ा है।

दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था में नाटकीय बदलाव की पटकथा 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की सरकार के द्वारा लिखी गई। तत्कालीन वित्त मंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री रहे डॉक्टर मनमोहन सिंह के साथ मिलकर नरसिंह राव ने देश को एलपीक्यूआई राज यानी लाइसेंस, परमिट, कोटा और इंस्पेक्टर राज से मुक्ति दिलाई और एलपीजी यानी लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, और ग्लोबलाइजेशन के सिद्धांत को आत्मसात किया।

यह बड़ा बदलाव था, क्योंकि आजादी के बाद प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की विदेश नीति और अर्थनीति दोनों ही समाजवादी सोवियत रूस से प्रभावित थी। रूस की ही तरह भारत में ज्यादातर उद्योगों को सरकारी नियंत्रण के तहत रखे जाने के लिए तमाम जतन किए गए थे। बिजली, सड़कें, पानी, टेलीफोन, रेल यातायात, हवाई यातायात, होटल आदि सेवाएं सरकारी नियंत्रण में थी और निजी क्षेत्र को उद्योगों में निवेश की अनुमति नहीं थी या अगर कहीं थोड़ी बहुत अनुमति दी भी जाती थी तो उससे कुछ चहेतों को ही बढ़ावा मिला। यहां तक कि बैंकों को भी सरकारी नियंत्रण में रखा जाता था।

इसका परिणाम हुआ कि अन्य पड़ोसी देश जहां लगभग 10 प्रतिशत वार्षिक दर से प्रगति कर रहे थे और एशियाई शेर के तमगों से विभूषित किया जा रहे थे, वहीं भारत की आर्थिक विकास दर तीन प्रतिशत के आसपास ही सिमटी रही। वर्ष 1951 से लेकर 1979 तक के बीच के तीन दशक सिर्फ समाजवादी नीतियों को सही साबित करने में निकल गए और इसका खमियाजा 0.1% प्रति व्यक्ति विकास दर के रूप में देखने को मिला।

आर्थिक सुधारों के लिए छिटपुट प्रयास तब शुरू होने शुरू हुए जब 80 के दशक में देश के सामने भुगतान संतुलन का संकट गंभीर रूप लेने लगा। वर्ष 1991 में चंद्रशेखर सरकार के दौरान यह समस्या विकराल हो गई और शर्मनाक रूप से भारत को सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा। इस समस्या का एकमात्र समाधान देश के बाजार को निजी और विदेशी निवेशकों के लिए खोलना था, जिससे अब तक की सरकारें मुंह मोड़ती आ रही थी। नरसिंह राव के नेतृत्व में भारत सरकार ने बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधार करने का फैसला लिया। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी नीत एनडीए की सरकार ने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया और विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में सरकार की दखलअंदाजी और नियंत्रण को न्यूनतम करने का काम किया।

वाजपेयी सरकार ने तो एक कदम आगे बढ़कर पहली बार देश में विनिवेश के लिए अलग से मंत्रालय तक का गठन कर दिया। उसके बाद डॉ मनमोहन सिंह और फिर पिछले लगभग 10 वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने के लिए कड़े कदम उठाते रहे। सरकारी कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी को न्यूनतम और समाप्त करना साहसिक कदम है। एयर इंडिया जैसे उपक्रम को निजी हाथों में सौंपना लाभ का सौदा साबित हुआ। वर्ष 1991 के बाद की सरकारों का प्रयास ही रहा कि कभी हेय दृष्टि से देखे जाने वाली और 'हिंदू ग्रोथ रेट' के ताने सुनने वाली अर्थव्यवस्था आज 4 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बन गयी है।

वर्ष 2017 से लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने संपूर्ण भारत को एक समान बाजार में परिवर्तित कर दिया। व्यवसाय करने की सुगमता के लिए तमाम जतन करना और राज्यों के मध्य प्रतिस्पर्धा की स्थिति तैयार करने से भी अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। इन सुधारों और बदलावों का ही नतीजा है कि आजादी के समय 1947 में मात्र 2.5 लाख करोड़ वाली अर्थव्यवस्था 2023 का नवंबर महीना आते-आते चार ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए कुलांचे भर रही है। सरकारी रिकार्ड में आजादी के समय प्रति व्यक्ति सालाना आय 274 रुपए थी, वह अब बढ़कर 2 लाख रूपए हो गई है, जिसके आजादी के 100 साल पूरा होने तक 15 लाख होने की उम्मीद है।

आंकड़ों में भारत के विकास की चमक है। बेशक भारत ने आर्थिक उपलब्धि हासिल की है लेकिन आम भारतीय के हालात बहुत अच्छे हो गए हों, ऐसा नहीं है। अभी ढेर सारे ऐसे सेक्टर हैं जो सुधारों से अछूते हैं और उनमें बड़े बदलाव की जरूरत है। कृषि सुधार, प्रशासनिक सुधार के साथ-साथ गैर संगठित क्षेत्र के लिए लिए काम किया जाना बाकी है।

मोदी सरकार दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ काम कर रही है। अगर हम दुनिया की तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था की पहचान को बनाए रखने में सफल रहते हैं तो अगले कुछ सालों में तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान और अरमान दोनों पूरे हो सकते हैं। लेकिन हमें वित्तीय समायोजन के उन उपायों को भी निरंतर अपनाना होगा ताकि सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा सिर्फ कागजों पर ही न बढे बल्कि हकीकत में आम जन तक उसका लाभ पहुंचे। अगर पूंजी का केन्द्रीयकरण होता है और उत्पादन और पूंजी एक वर्ग तक सीमित होते जायेंगे तो यही उपलब्धि 140 करोड़ वाले भारत के लिए हानि का सौदा बन सकती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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