मर चुकी नदी जिंदा हुई तो बाढ़ में डूब गया झीलों का शहर बेंगलुरू
झीलों का शहर बेंगलुरू वर्षा के पानी में डूब गया है। बेतरतीब बसावट, अनाधिकृत निर्माण और जलनिकासी नालों के जाम होने से यह आफत आई है। बाढ़ में आभिजात्य इलाकों से लेकर गरीब बस्तियों के बीच कोई फर्क नहीं रह गया है। सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में सरजापुर, बाहरी रिंग रोड, कोरामंगला, वार्थुर और केआर पुरम हैं। ये सभी ऐसे इलाके है जिनमें बड़ी टेक कंपनियों और बैंकिग संस्थाओं के दफ्तर और रिहाइशी इलाके हैं।

चिंताजनक यह है कि मौसम विभाग ने अभी और वर्षा होने की पूर्वानुमान जारी किया है। वर्षा सप्ताह भर से हो रही है। 31 अगस्त को भारी वर्षा हुई। बाहरी रिंग रोड का इलाका जिसमें टेक कंपनियों के दफ्तर आदि हैं, उसी दिन डूब गए। 5 सितंबर को दोबारा भारी वर्षा हुई। उस एक दिन में 131.6 मिलीमीटर वर्षा हुई। उस दिन पूरा बेंगलुरू शहर त्राहिमाम कर उठा।
इस बीच आउटर रिंग रोड कंपनीज एसोसिएशन जिसमें आईटी कंपनियां और बैंकिग फर्म हैं, ने मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को ज्ञापन देकर कहा है कि 31 अगस्त को आई बाढ़ में करीब 225 करोड़ का नुकसान हो चुका है। उन अमीर, आभिजात्य लोगों के नुकसान का कोई आंकड़ा तो शायद बाहर भी नहीं आ सकेगा, जो जल जमाव की वजह से अपने आलीशान मकान को छोड़कर मंहगे होटलों में रह रहे हैं। उनके कीमती वाहन, फर्नीचर आदि को वर्षा के पानी में तैरते हुए देखा जा रहा है। दरअसल, सप्ताह भर से जारी वर्षा से दशकों से सूखी पड़ी दक्षिण पिनाकिनी नदी पुनर्जीवित हो गई है, जिसका नतीजा हुआ कि अति व्यस्त चन्नासानदरा मेन रोड पर टेक कारीडोर के निकट का हिस्सा पानी में डूब गया। सड़क के ऊपर चार फुट पानी बह रहा है। यह सड़क ह्वाइटफील्ड के पास होपफार्म जंक्शन से शुरु होकर कोरालुर को होसकोटे और मालुर से जोड़ती है। इस इलाके में 25 से अधिक गांव थे जिसमें धीरे धीरे टेक सेक्टर में काम करने वाले लोगों के रिहाइशी घर बन गए हैं। यह नगर में सब्जी और देवानागोंथी तेल डिपों से ईंधन के आने का रास्ता है।
इसलिए इस सड़क के डूब जाने का समूचे शहर पर काफी असर पड़ा है। कोरालुर के पास दोनों तरफ से वाहनों की कतार लग गई है। दक्षिण पिनाकिनी नदी वहां नवनिर्मित पुल के ऊपर से बह रही है। यह नदी नंदी हिल्स से निकलकर चिक्कबालापुर, होसकोटे, कादूगोडी, सर्जापुर और मालुर होकर बेलांदुर व वार्थुर झील में मिलकर तमिलनाडु की ओर चली जाती है।
इस बार बेलांदुर व वार्थुर झील भी उफन रही है। पहले यह नदी मालुर तक एकदम सूख गई थी। बीते तीन दशकों से यही हालत थी। इसके अस्तित्व को करीब करीब भुला ही दिया गया था। परन्तु चिकबाल्लापुर और कोलार में भारी वर्षा होने से नदी में काफी पानी आ गया और वह पुरानी धारा मार्ग से प्रवाहित होने लगी। पानी होसकोटे झील की ओर प्रवाहित हो रहा है जो पहले से भरी हुई है, इसलिए चारों तरफ पानी पानी हो गया है।
बेंगलुरू में आई इस बाढ की समस्या को समझने के लिए बेंगलुरू की बनावट को जानना जरूरी है। बेंगलुरू में कई घाटियां हैं। इनके चारों ओर फैले रिज इलाके में बसावट रही है। घाटियों के भीतर और रिज पर झीलें फैली हुई हैं। वर्षा का पानी इन झीलों में इकट्ठा होता है और आपसी संपर्क नालों के जरिए प्रवाहित होता रहा है। पर हाल के वर्षों में हुए निर्माण में झीलों की जमीन व संपर्क नालों पर अतिक्रमण हो गया है। इन इलाकों में बीते वर्षों में बेतहाशा निर्माण हुए हैं। इसलिए थोड़ी वर्षा में भी बाढ़ की स्थिति बन जाती है।
जानकार बताते हैं कि बेंगलुरू में 19 वीं शताब्दी में 1452 झीलें थीं। इनमें वर्षा का पानी जमा होता था जो एक-दूसरे से होकर धीरे-धीरे प्रवाहित होता था। भूजल भंडार का भरण होता था और वर्षा कहीं से समस्या नहीं थी। आज केवल 193 झीलें बची हैं। उनमें अधिकतर का आपसी संपर्क टूट गया है। महानगर में चार प्रमुख घाटियों - वृश्वभवंती घाटी, कोरामंगला घाटी, चल्लाघट्टा घाटी और हेबाल घाटी में वर्षाजल को आर-पार करने वाली प्राकृतिक व्यवस्था को बेतरतीब निर्माण ने तहस नहस कर दिया है।
इसके पहले बेंगलुरू में 26 सितंबर 2014 को 132.3 मिमी वर्षा हुई थी। तब भी बहुत कोहराम मचा था। सरकार ने झीलों की जमीन पर अतिक्रमण की छानबीन करने के लिए 2015 में एक कोलिवाड कमेटी का गठन किया था। तब उस कमेटी ने कहा था कि झील की जमीन पर कब्जा करने में बड़ी निर्माण कंपनियां और सरकारी संस्थान प्रमुख हैं। कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार झीलों की लगभग 10 हजार 787 एकड़ जमीन पर कब्जा हो गया है जिसकी कीमत डेढ लाख करोड़ रुपए से अधिक होगी।
बेंगलुरू में ही स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस के सेंटर ऑफ इकोलॉजी के प्रोफेसर डॉ टीआर रामचंद्र ने इस बाढ़ के कारणों को सिलसिलेवार ढंग से गिनाया है। कमजोर निकासी प्रणाली, नालों में ठोस कचरा जमा होना, मकानों को ढहाने से निकले कचरे का इधर-उधर पड़ा होना, नालों पर अतिक्रमण, झीलों के बीच आपसी संबंध टूट जाना और झीलों के आसपास खाली जगहों पर अतिक्रमण आदि।
इस सबके पीछे ठेकेदार, इंजीनियर, कंसलटेंट और स्थानीय निर्णयकर्ताओं का भ्रष्ट गठबंधन काम कर रहा है। बाढ के बाद सात दिनों में बेंगलुरू नगर निगम ने वर्षाजल निकासी के नालों पर 300 से अधिक अतिक्रमण को चिन्हित किया है। इस बीच कर्नाटक हाईकोर्ट ने नगर निगम को वार्डवार शिकायत केन्द्र स्थापित करने का निर्देश दिया है ताकि नुकसान की सही तस्वीर सामने आ सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी परिस्थिति से पार पाने का इकलौता उपाय पुरानी व्यवस्था की ओर लौटना है। वैसे नगर निगम इस बार बाहरी रिंग रोड होकर वर्षाजल निकासी नाला बनाने की बात कर रहा है। नालों की सफाई तो नियमित तौर पर होने वाला कार्य है। इस बार भी हुआ है। पर नालों का आपसी संबंध टूट जाना और झील की गहरी जमीन में रिहाइशी कॉलोनी पनप जाने से होने वाले जलजमाव को किसी फौरी उपाय से नहीं टाला जा सकता। पानी अपना रास्ता कभी नहीं भूलता। वह लौट लौटकर आता है जो उसके रास्ते में आते हैं, उनको बहा ले जाता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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