Article 370: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी लेकिन जमीनी सच्चाई जानना भी जरूरी
Article 370: जम्मू-कश्मीर से धारा 370 एवं अनुच्छेद 35A हटाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय में 2 अगस्त से चल रही सुनवाई पूरी हो गयी है। 16 दिन चली इस सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से दी जाने वाली दलीलें न केवल जम्मू-कश्मीर की परिस्थिति पर यथार्थ प्रकाश डालती हैं, अपितु जम्मू-कश्मीर की भावी दिशा एवं दशा की ओर भी संकेत करती हैं। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायाधीश संजय किशन कौल, न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।
2 अगस्त को धारा 370 की सुनवाई के पहले दिन मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्त्ताओं के वकील कपिल सिब्बल से पूछा कि यह धारा जब अस्थाई एवं ट्रांजिशनल है तो क्या संविधान सभा के अभाव में संसद इसे निरस्त नहीं कर सकती? इस पर जवाब देते हुए वरिष्ठ वकील एवं कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा था कि संविधान के मुताबिक, ''जम्मू-कश्मीर से 370 को कभी हटाया नहीं जा सकता। केंद्र सरकार का निर्णय असंवैधानिक है। सरकार ने लोकतंत्र बहाल करने की आड़ में जम्मू-कश्मीर के लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए हैं। अनुच्छेद 370 को संविधान-सभा की सिफारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता। चूँकि संविधान-सभा का अस्तित्व ही नहीं बचा है, इसलिए इसे किसी भी सूरत में हटाया नहीं जा सकता। संसद खुद को एक संविधान-सभा में परिवर्तित नहीं कर सकती।''

सुनवाई की शुरुआत से लेकर आखिर तक अपनी दलीलों में कपिल सिब्बल न्यायालय में वहीं बातें करते रहे जो पाकिस्तान के हुक्मरान और कश्मीर के अलगाववादी नेता कहते आ रहे हैं। कांग्रेस समेत 'इंडिया' गठबंधन में सम्मिलित विपक्षी दलों को कश्मीर मुद्दे पर यह स्पष्ट करना चाहिए कि कपिल सिब्बल की दलीलों पर उनका क्या स्टैंड है? सत्ता में आने के बाद क्या वे पुनः धारा 370 और अनुच्छेद 35A को बहाल करेंगें या जनमत संग्रह करवाएँगे? वैसे इस गठबंधन में सम्मिलित पीडीपी एवं नेशनल कांफ्रेंस के नेता लगातार इन्हें बहाल करने की माँग करते रहे हैं और इनके समर्थन में गुपकार वार्त्ता से लेकर विदेशी शक्तियों तक के हस्तक्षेप की वकालत कर चुके हैं।
ग़ौरतलब है कि 17 अक्टूबर 1949 को अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का हिस्सा बना। इसे एक अस्थाई प्रावधान के रूप में जोड़ा गया था। इसकी रूपरेखा फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला ने 1947 में तैयार की थी। उन्हें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की निकटता प्राप्त थी। नेहरू ने ही उन्हें जम्मू-कश्मीर का प्रथम प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। अनुच्छेद 370 के अंतर्गत संसद को जम्मू-कश्मीर के लिए केवल रक्षा, विदेश और संचार से संबंधित कानून बनाने का ही अधिकार था, जबकि अन्य कानूनों को लागू कराने के लिए केंद्र राज्य के अनुमोदन पर पूरी तरह निर्भर था। इसी धारा के कारण वहाँ पर संविधान का अनुच्छेद 356 लागू नहीं होता था। इसकी वजह से ही जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा एवं प्रतीक-चिह्न भी था।
लेकिन 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अहम फैसला लेते हुए धारा 370 और अनुच्छेद 35A को समाप्त कर दिया था। इसके चार साल बाद अगर आज के जम्मू-कश्मीर को देखें कभी आतंकवादी घटनाओं एवं अलगाववादी गतिविधियों के कारण सुर्खियाँ बटोरनेवाला जम्मू कश्मीर अब सुधार, विकास, सुशासन, शिक्षा, निवेश, पर्यटन, अमरनाथ-यात्रा में जुटने वाली श्रद्धालुओं की भारी संख्या तथा जी-20 की बैठकों आदि के लिए जाना जाने लगा है।
जिस प्रकार वहाँ आतंकवादी, अलगाववादी एवं देश-विरोधी गतिविधियों पर विराम लगा है, पत्थरबाज़ी, आगजनी, पाकिस्तान परस्त नारेबाज़ी एवं आतंकवादियों के जनाज़े में उमड़ने वाली भीड़ आदि में कमी आई है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि जम्मू कश्मीर के लोगों को इस फैसले से राहत मिली है। जम्मू कश्मीर में निवेश से लेकर कारोबार व पर्यटन को बढ़ावा मिला है तथा 2020 में हुए पंचायत चुनावों में अधिकाधिक जन-भागीदारी देखने को मिली है। यह सब देखकर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि 5 अगस्त 2019 को लिए गए ऐतिहासिक फैसले का वहाँ के आम नागरिकों पर अनुकूल प्रभाव पड़ा है।
आतंक और अलगाव का सुर अलापने वालों की बातों में न आकर घाटी की अवाम ने विकास व शांति की राह पर बेख़ौफ़ कदम बढ़ाया है। सर्वोच्च न्यायालय में चली सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 2018 से 2023 की तुलना में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में 45% की कमी आई है। सीमा पार से होने वाली घुसपैठ में 90% कमी देखने को मिली है। कानून-व्यवस्था के लिए भारी चुनौती रही पथराव की घटना में 97.2% की कमी आई है। सुरक्षाबलों के हताहत होने की घटनाओं में 65.9% की कमी दर्ज की गई है। 2018 में पत्थरबाजी की 1767 घटनाएँ हुई थीं, जो कि 2019 से अभी तक शून्य हैं। ये केवल प्रभावी पुलिस एवं सुरक्षा व्यवस्था के कारण ही नहीं, अपितु युवाओं को रोजगार देने जैसे अनेक कारगर कदम उठाए जाने के कारण संभव हुआ है।
इसी तरह संगठित बंद एवं हड़ताल की 2018 में 52 घटनाएँ हुई थीं, 2019 से लेकर अभी तक शून्य हैं। धारा 370 हटने के बाद घाटी में आतंकवाद को पोषण देने वाला पूरा ईको सिस्टम ख़त्म हो गया। ये आतंकवादियों की भर्ती से जाहिर होता है। 2018 में कश्मीर घाटी से जहाँ 199 युवा आतंकवादी बने, वहीं 2023 में उनकी संख्या महज 12 रह गई है।
आज घाटी में स्कूल, कॉलेज, उद्योग समेत सभी ज़रूरी संस्थान सामान्य रूप से चल रहे हैं। औद्योगिक विकास हो रहा है। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद हुई प्रगति जैसे पर्यटन और निवेश बढ़ने के आँकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस केंद्र शासित प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए 28,400 करोड़ की सेंट्रल सेक्टर स्कीम लागू हुई है। इसके अलावा 78,000 करोड़ के निजी निवेश के भी प्रस्ताव आए हैं। केवल 2022-2023 में वहां 2,153 करोड़ रुपए का निवेश हुआ है।
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए नई पहल करते हुए वहाँ ई-टेंडरिंग शुरु की गई है। 2022-23 में विभिन्न परियोजनाओं के लिए एक लाख करोड़ रुपए की ई-टेंडरिंग वहाँ हो चुकी है। लैंड रिकॉर्ड सहित 450 से अधिक सेवाएँ वहाँ पहली बार ऑनलाइन शुरु की गई हैं, जिससे दूर-दराज के लोगों को बड़ी सुविधा हो रही है।
धारा 370 और अनुच्छेद 35A को हटाए जाने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वहाँ पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि देखने को मिल रही है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक साल 2022 में 1.88 करोड़ पर्यटकों ने जम्मू कश्मीर की खूबसूरती का लुत्फ उठाया। इस वर्ष अभी तक वहाँ एक करोड़ से अधिक पर्यटक गए हैं। इसी वर्ष प्रारंभ की गई अमरनाथ यात्रा में भी पिछले वर्षों की तुलना में रिकॉर्डतोड़ वृद्धि देखी गई। इस वर्ष अमरनाथ यात्रा में लगभग साढ़े चार लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा बर्फ़ानी के दर्शन कर चुके हैं।
निश्चय ही धारा 370 हटने के बाद जम्मू कश्मीर के जमीनी हालात बेहतर हुए हैं। न केवल आतंकी घटनाओं पर नियंत्रण हुआ है बल्कि जन सामान्य का जीवन स्तर भी बेहतर हुआ है। राज्य में चुनी हुई सरकारें जो नहीं कर पायीं वो केन्द्र की मोदी सरकार ने कर दिखाया है। हां, कश्मीरी पंडितों की घर वापसी जरूर अधूरी है। फिर भी उम्मीद करनी चाहिए कि माननीय सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाने से पहले आर्टिकल 370 के हटने से जम्मू कश्मीर में जमीनी स्तर पर आये बदलाव को भी ध्यान में रखेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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