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Govt vs Judiciary: सुप्रीम कोर्ट को आईना दिखाने का सिलसिला जारी

जहां सुप्रीम कोर्ट लगातार इस प्रयास में है कि विधायिका और कार्यपालिका के कामों में उसका हस्तक्षेप बढ़ता जाए, वहीं अब सरकार भी न्यायपालिका की तानाशाही पर नकेल कसने की तैयारी में है।

Govt vs Judiciary supreme court and modi government on Judiciary system

Govt vs Judiciary: आप मानो, या न मानो, मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट को अपनी हद में रखने के लिए हर संभव कदम उठा रही है| जो पिछले 29 साल से पांच सरकारें नहीं कर पाई थीं, वह मोदी सरकार कर रही है| चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों को लेकर सरकार ने कोर्ट में दो-टूक कहा कि वह कार्यपालिका के काम में दखल न दे|

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जजों की नियुक्तियों को ले कर क़ानून मंत्री और उपराष्ट्रपति की सख्त टिप्पणियों के बाद केंद्रीय सूचना आयुक्त ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को संविधान विरोधी बता कर उस पर हमला बोला है| यह संयोग है कि यह फैसला उसी साल 1993 का ही है, जब सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से जजों की नियुक्तियों का अधिकार छीन कर कोलेजियम बनाया था|

सुप्रीमकोर्ट के उस संविधान विरोधी फैसले और सूचना आयुक्त की ताज़ा टिप्पणी पर चर्चा से पहले हमें 2012 का एक फैसला याद करना चाहिए| अपने उस फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि सूचना आयोगों में मुख्य सूचना आयुक्त के पदों पर रिटायर्ड या मौजूदा जजों को नियुक्त किया जाए और बीस साल का क़ानून का अनुभव रखने वालों को सूचना आयुक्त बनाया जाए|

सुप्रीमकोर्ट की यह जजमेंट विधायिका के अधिकार को चुनौती थी, क्योंकि संसद ने सूचना का अधिकार क़ानून बनाया था। उसमें सूचना आयुक्तों और मुख्य सूचना आयुक्तों के पदों पर नियुक्ति के लिए पात्रता लचीली तय की गई थी| सरकार उन्हें कोर्ट नहीं बनाना चाहती थी कि जहां वकीलों और जजों का धंधा पानी शुरू हो जाए| सूचना के अधिकार क़ानून के अनुसार कार्यपालिका के वरिष्ठ पदों से रिटायर्ड अधिकारी, पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता भी पात्र थे|

सुप्रीम कोर्ट ने क्योंकि कहा था कि मुख्य सूचना आयुक्त रिटायर्ड जजों को नियुक्त किया जाए, इसलिए क़ानून को संशोधित कर के मुख्य सूचना आयुक्त की आयु सीमा 65 साल से बढा कर 70 साल करनी पड़ती| संसद से पारित क़ानून में मुख्य सूचना आयुक्त की रिटायरमेंट आयु 65 वर्ष निर्धारित है और जजों की रिटायरमेंट आयु भी 65 वर्ष है, तो उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त कैसे बनाया जा सकता था|

इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका पर भी चोट की थी, क्योंकि राजनीतिक जुगाड़ से ज्यादातर सूचना आयुक्तों के पदों पर रिटायर्ड आईएएस ही नियुक्त होते हैं| राजनीतिज्ञों और ब्यूरोक्रेसी की मिलीभगत से कानून के लचीलेपन का दुरूपयोग हुआ है, लेकिन यह अलग विषय है|

तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने ब्यूरोक्रेसी के दबाव में सुप्रीमकोर्ट के फैसले को नहीं माना और रिव्यू पटीशन डाल कर फैसले को बदलवाने में सफलता हासिल की| कहा जाता है सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असल कारण यह था कि केंद्रीय सूचना आयोग ने जजों की संपत्ति के संबंध में जानकारी देने का फैसला सुनाया था| जिससे जजों में हडकंप मचा हुआ था, जबकि सूचना आयोग के उस फैसले से समाज बहुत उत्साहित था। मीडिया में भी सूचना आयोग के फैसले की तारीफ़ में लेख लिखे गए थे, जिनमें कहा गया था कि इस फैसले से न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलेगी|

तब सरकार की रिव्यू पिटीशन के कारण सूचना आयोग और सुप्रीमकोर्ट का टकराव टल गया था, लेकिन अब केन्द्रीय सूचना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को संविधान विरोधी बता कर उसे कटघरे में खड़ा कर दिया है|

यह मामला दिल्ली सरकार की ओर से मस्जिदों के इमामों को 18000 रूपए वेतन दिए जाने का है| इमामों को सरकारी खजाने से वेतन देने का रास्ता सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के एक फैसले से खोला था, जिसे विभिन्न सरकारों ने मुस्लिम वोट बैंक के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया| 1993 में ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन ने एक याचिका दाखिल की थी, जिसमें गुजारिश की गई थी कि वह वक्फ बोर्डों को उन मस्जिदों के इमामों को वेतन देने का निर्देश दे, जिनका प्रबंधन वक्फ बोर्ड के हाथ में है| सुप्रीमकोर्ट ने आल इंडिया इमाम आर्गेनाईजेशन के पक्ष में फैसला दिया| जबकि वक्फ बोर्ड तो सरकारी अनुदान पर चलते हैं, जिस कारण इमामों का वेतन सरकारी खजाने से जाना शुरू हो गया|

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के कारण जनता से वसूले गए टैक्स का एक धर्म विशेष को बढावा देने के लिए दुरूपयोग किया जा रहा है| जैसे दिल्ली वक्फ बोर्ड की अपनी सालाना कमाई तो सिर्फ साढ़े तीन करोड़ रूपए है, लेकिन केजरीवाल सरकार वक्फ बोर्ड को सालाना 62 करोड़ रूपए का अनुदान देती है, जो इमामों को वेतन में लुटाया जाता है, जबकि किसी मन्दिर के पुजारी या गुरूद्वारे के ग्रन्थी को एक कौड़ी नहीं दी जाती|

अब एक आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल के आवेदन की सुनवाई करते हुए सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने सुप्रीम कोर्ट के 1993 के फैसले को संविधान के अनुच्छेद 27 का उलंघन करार दे दिया है| उन्होंने अपने फैसले में कहा है कि करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल किसी एक धर्म को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जा सकता| माहुरकर ने अपने आदेश की प्रति केंद्रीय कानून मंत्री को भी भेजी है ताकि संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक का सही अर्थों में पालन सुनिश्चित हो सके|

सूचना आयुक्त माहुरकर ने सुप्रीम कोर्ट पर कड़ी टिप्पणी में कहा है कि कोर्ट के फैसले से देश में एक गलत संदेश गया, बल्कि समाज में द्वेष की भावना भी पनपी है| सूचना आयुक्त ने यह भी कहा कि 1947 से पहले भी मुसलमानों को इसी तरह के विशेष प्रावधान के अन्तर्गत रियायतें हासिल हुई थीं। इसी तुष्टीकरण ने भारत के बंटवारे में अहम भूमिका निभाई| अब सूचना आयोग के इस फैसले के बाद मोदी सरकार के सामने सुप्रीमकोर्ट में 1993 के फैसले पर पुनर्विचार करने की याचिका दाखिल करने का रास्ता खुल गया है|

यह भी पढ़ें: Govt vs Judiciary: सरकार और सुप्रीम कोर्ट में शीत युद्ध की जगह अब वास्तविक युद्ध

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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