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चुनावी सीजन में राजनीतिक दलों का 'फेस्टिवल ऑफर'

Election Manifesto: लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए दावों और वादों का पिटारा खुल गया है। जितने उम्मीदवार, उतने वादे। जितने दल, उतने दावे। इन वादों और दावों की अंधी गलियों में आम आदमी खो सा गया है। आम आदमी से जुड़े रोटी, कपड़ा, रोजगार, मकान, पढ़ाई और दवाई के मुद्दे बात-बहस में तो बढ़ चढ़कर बोले जा रहे हैं लेकिन तलाशने पर वैसे ही गायब हैं जैसे चील के घोसले से मांस।

राजनीतिक दलों की ओर से घोषणाओं की प्रतिस्पर्धा चालू है। कोई घी दूध की नदियां बहाने का सपना परोस रहा है, तो कोई पलक झपकते चांद सूरज मुट्ठी में कर लेने का पासा फेंक रहा है। संख्या बल के हिसाब से जो दल न तीन में है न तेरह में वे तो घोषणाओं के मामले में स्थापित दलों से कई गज आगे कूद रहे हैं। मिनटों में हथेली पर सरसों उगा लेने जैसे असंख्य नुस्खों के साथ वे जनता को भरमाने में जुटे हुए हैं।

Election Manifesto Festival offer of political parties during election season

आप चाहे मोदी की गारंटी कहें, 'न्याय पत्र' कहें, 'संकल्प पत्र' कहें, 'विजन डॉक्यूमेंट' कहें या फिर 'घोषणापत्र', बात एक ही है कि किसी तरह जनता को सपनों की दुनिया में ले जाकर उनके कीमती वोटों की फसल काटना। इस सपनीली दुनिया की माया भी है, और राम भी। गेहूं भी है, और गुलाब भी। निर्भर जनता पर करता है कि उसकी रुचि किसमें है, लौकिक जीवन के सुख में, या पारलौकिक दुनिया में सब कुछ पा लेने की उम्मीद भरे संतोष में।

बहरहाल, 18वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव के नये घोषणापत्र पर आम और खास सभी की नजरें टिकी हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र का नाम 'न्याय पत्र' दिया है। इसके नाम के पीछे तर्क है, 'न्याय पत्र' आम लोगों को न्याय दिलाएगा। कांग्रेस के 'न्याय पत्र' में पांच न्याय और 25 गारंटी हैं। पांच न्याय हैं- 'हिस्सेदारी न्याय', 'किसान न्याय', 'नारी न्याय', 'श्रमिक न्याय' और 'युवा न्याय'।

कांग्रेस के घोषणापत्र में सभी वर्गों के लिए रेवड़ियां हैं। इसमें 30 लाख नौकरियां, गरीब परिवार की महिलाओं को एक लाख रुपये सालाना, राष्ट्रीय स्तर पर जातीय जनगणना, एमएसपी को कानूनी दर्जा, मनरेगा मजदूरी को प्रति दिन 400 रुपये किया जाना, जांच एजेंसियों का दुरुपयोग रोकना, सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू किया जाना और पीएमएलए कानून में बदलाव किया जाना शामिल हैं।

मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के न्याय पत्र के जवाब में सत्ताधारी दल भाजपा ने भी मोदी की गारंटी शीर्षक से अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है। घोषणा पत्र में 10 सामाजिक समूहों के लिए वादों पर खूब जोर है। यह समूह है गरीब, मध्यम वर्ग, महिलाएं, युवा, वरिष्ठ नागरिक, किसान, मछुआरे, मजदूर, व्यापारी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे पारंपरिक रूप से वंचित वर्ग।

मोदी की गारंटी में 70 साल के सभी बुजुर्गों को 5 लाख तक की मुफ्त स्वास्थ्य योजना, थर्ड जेंडर को भी आयुष्मान में शामिल करना, वन स्टूडेंट वन आईडी कार्ड, ओलंपिक की मेजबानी के साथ-साथ इंसान को चांद पर भेजने का वादा किया गया है। भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में एक राष्ट्र एक चुनाव और समान नागरिक संहिता को लागू करने की प्रतिबद्धता को दोहराया है लेकिन राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) जैसे विवादास्पद मुद्दे से परहेज रखा है। 76 पृष्ठों के इस घोषणा पत्र में मोदी की गारंटी के 24 अध्याय हैं जिसमें विकास के लिए चुनिंदा क्षेत्रों को रेखांकित किया गया है।

इस क्रम में समाजवादी पार्टी (सपा) ने 'जनता का मांग पत्र हमारा अधिकार' शीर्षक से अपना घोषणापत्र 'विजन डॉक्यूमेंट' जारी किया है। इस 'विजन डॉक्यूमेंट' में 2025 तक जाति आधारित जनगणना कराने की बात कही गई है, जिसके आधार पर 2029 तक सबको न्याय एवं हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का वादा किया गया है। 2025 तक अनुसूचित जाति/जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के सभी सरकारी रिक्त पदों को भरने, निजी क्षेत्र में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने, पेपर लीक से मुक्ति दिलाने और किसान को सभी फसल पर एमएसपी स्वामीनाथन फॉर्मूले के तहत दिलाने की बात भी कही है।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने अपने घोषणापत्र में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को निरस्त करने का वादा किया है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा हटाने का भी वादा किया गया है। यह भी कहा है कि मनरेगा के तहत दैनिक मजदूरी बढ़ाकर 700 रुपये की जाएगी। भाकपा ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के खात्मे, आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा हटाने, जाति जनगणना कराने, संपत्ति कर व विरासत कर जैसे कराधान उपाय लागू करने, कॉरपोरेट कर बढ़ाने, निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने का भी वादा किया है।

मोटे तौर पर राजनीतिक दल चुनाव के समय अपने कार्यक्रम, नीतियों तथा उद्देश्यों को बताने के लिए घोषणापत्र जारी करते है। लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में घोषणापत्र एक तरह से राजनीतिक दलों के कार्यों का आईना होता है। इसके माध्यम से दलों की नीतियों का पता चलता है। जनता को यह जानने का पूरा हक है कि जिस प्रतिनिधि को वह अपना बहुमूल्य वोट देने जा रही है, वह क्या करना चाहता है, उसकी नीतियां क्या हैं।

मौजूदा चुनाव के लिए विभिन्न दलों की ओर से आ रही गारंटी 'फेस्टिवल ऑफर' का एहसास कर रही हैं। एक तरफ मोदी की गारंटी हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस की 25 गारंटी। ये गारंटी सही मायने में 'फेस्टिवल ऑफर' की तरह हैं। मतलब लोकतंत्र के महोत्सव में राजनीतिक दलों का 'फेस्टिवल ऑफर।' बाजारवाद का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। वोट दो और ये ऑफर (गारंटी) ले जाओ। जनता के वोट 24 कैरेट सोने की तरह हैं, लेकिन गारंटी कितनी पक्की हैं, यह वक्त बताएगा।

लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा के संकल्प पत्र के 10 मुख्य बिंदुओं में शामिल थे- अयोध्या में राम मन्दिर, जम्मू-कश्मीर से धारा 35ए और 370 हटाना, छोटे किसानों के लिए पेंशन, छोटे दुकानदारों के लिए पेंशन, राष्ट्र सुरक्षा पर वादा, एक साथ चुनाव कराने का संकल्प, प्रत्येक परिवार के लिए पक्का मकान, आयुष्मान भारत योजना, समान नागरिक संहिता और ट्रांसजेंडर्स को समाज को मुख्य धारा में लाने का वादा।

भाजपा ने अयोध्या में राममन्दिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से धारा 35ए और 370 हटाने, आयुष्मान भारत योजना जैसे वादों को पूरा किया है लेकिन, 'प्रत्येक परिवार के लिए पक्का मकान', 'छोटे दुकानदारों के लिए पेंशन', 'छोटे किसानों के लिए पेंशन' किसानों की दो गुनी आय, प्रतिवर्ष 2 करोड़ रोजगार अभी भी दूर की कौड़ी साबित हो रहे हैं।

यहां यह कहना गलत न होगा कि दस साल के शासनकाल में भाजपा अपने 'संकल्प पत्र' को पूरा करने के लिए संकल्पित दिखी। कई एक वादों पर भाजपा ने गंभीरता से काम किया है। समान नागरिक संहिता की दिशा में भी पर्याप्त प्रगति हुई है। वादे के अनुरूप भाजपा के काम करने का उत्साह सहज ही देखा जा सकता है।

कांग्रेस भी विधानसभा चुनावों में जिन राज्यों में सत्ता में आई, वहां घोषणापत्र को अमली जामा पहनाने के लिए प्रयासरत दिखी। 2014 से कांग्रेस केंद्रीय सत्ता से दूर है, ऐसे में कहना मुश्किल है कि कांग्रेस अगर केंद्र की सत्ता में आती है, तो अपने घोषणापत्र को जमीन पर उतारने में सफल रहती, या उसके सिर्फ वादे ही रह जाते हैं।

अब देखना है कि 2024 लोक सभा चुनाव का ऊंट किस करवट बैठता है। कौन-सा गठबंधन केंद्र की सत्ता तक पहुंचता है, और अपने घोषणापत्र में किए गए दावे और वादों के अनुरूप जनता को सशक्त करने के लिए काम करता है। फिलहाल राजनीतिक सौदागर सपना बेचने में जुटे हुए हैं। गारंटी के जाल में कौन फंसता है और किस बहेलिए की किस्मत खुलेगी, इसका अंतिम निर्णय 4 जून को मतगणना के बाद ही होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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