E-Waste: गाड़ियों की तरह अब इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स को भी एक्सपायर करने की तैयारी
E-Waste: वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इसी सप्ताह इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के संदर्भ में एक सूची जारी की है। सूची में शामिल 134 उत्पादों में से कोई भी अगर आपके पास है तो आगे आप उसकी एक्सपायरी डेट तक ही उसका इस्तेमाल कर पाएंगे। ऐसा नहीं कि कभी मरम्मत करा ली या कभी कोई कल-पुर्जा बदलवा लिया और सालों तक उसी से काम चलाते रहे।
इस बारे में अभी तक जो जानकारी उपलब्ध है, उससे तो यही लगता है कि जिस तरह पंद्रह वर्ष से अधिक पुराने वाहनों को फिटनेस टेस्ट पास न करने के बाद उसे सड़क पर चलाने के लिए आप पर जुर्माना लगाया जा सकता है, इलेक्ट्रानिक आइटम पर भी इससे मिलती-जुलती कोई व्यवस्था लागू होने जा रही है।

फर्ज कीजिए कि एक्सपायरी डेट लिखी आपकी वाशिंग मशीन को लिए दस साल पूरे हो जाते हैं। वह अच्छे से काम कर रही है और आपका उसे बदलने का कोई इरादा या जरूरत नहीं है। लेकिन, ग्यारहवां साल शुरू होते ही आपको उसे मैनुफैक्चर करने वाली कंपनी के नुमाइंदे का फोन आता है कि आपकी मशीन एक्सपायर हो चुकी है। अब आपको उसे वापस देकर स्क्रैप का सर्टिफिकेट लेना पड़ेगा।
नियम ऐसा बनाया गया है कि कंपनी की मजबूरी यह होगी कि कानूनन उसे नई वाशिंग मशीनों के उत्पादन की अनुमति तभी मिलेगी, जब वह इस बात का प्रमाण दे दे कि दस साल पहले उसने जितनी मशीनें बनाई थीं, उनका साठ प्रतिशत वह नष्ट कर चुकी है। एक अप्रैल 2023 को पारित इससे संबंधित कानून के प्रावधानों में, ई-वेस्ट की श्रेणी में आने वाले सामान को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी उत्पादक पर ही डाल दी गई है।
यह सिर्फ वाशिंग मशीन की ही बात नहीं है। इस सूची में कम्प्यूटर, मॉनिटर, माउस, की-बोर्ड, लैपटॉप, कंडेंसर, माइक्रो चिप, टेलीविजन, वॉशिंग मशीन जैसे 134 इलेक्ट्रॉनिक प्रॉडक्ट शामिल हैं, जिन पर एक्सपायरी डेट डालने की संस्तुति की गई है। यह डेट गुजर गई तो आपका सामान आधिकारिक रूप से ई-वेस्ट बन जाएगा। पंखे, फ्रिज, वाशिंग मशीन दस साल में, रेडियो आठ साल में, टैबलेट/लैपटॉप/स्मार्टफोन/आईपड/स्कैनर पॉंच साल में कबाड़ घोषित हो जाएंगे और उन्हें आपको वापस करके सर्टिफिकेट लेना ही होगा।
'नया नौ दिन, पुराना सौ दिन' के विचार ने भारतीय जनमानस में सदियों तक पैठ बनाए रखी थी। लेकिन, उदारीकरण के बाद एक ऐसा बाजार सृजित हुआ है, जिसने यूज एंड थ्रो की संस्कृति को बहुत परवान चढ़ाया है। आप चीजें लाते हैं, साल-दो साल की वारंटी, उसके बाद प्रॉब्लम शुरू। आप जिद्दी हैं, तो उसको ठीक कराकर कुछ महीने और चला लेंगे। लेकिन, अन्तत: आपको उसे फेंक कर नया प्रॉडक्ट खरीदना ही होगा। अब शायद इसकी भी गुंजाइश न रहे। क्योंकि नई पॉलिसी के तहत कंपनियॉं आगे ऐसे ही प्रॉडक्ट बनाएंगी, जो बहुत अधिक टिकाऊ न हों। न उनके स्पेयर पार्ट्स का फिर से उपयोग किया जा सकेगा, और न ही शायद वे आपको बाजार में मिलेंगे।
जाहिर है कि आपके पास उसे फेंकने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। यह भी सोचने की बात है कि अगर आपका प्रॉडक्ट, एक्सपायरी डेट से पहले ही खराब हो जाता है तो उसके पुर्जे न मिल पाने की वजह से आप उसे ठीक नहीं करा पाएंगे। इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या वारंटी पीरियड को एक्सपायरी डेट तक एक्सटेंड किया जाएगा? कंपनियॉं तो चाहती ही हैं कि आप सामान को जल्द से जल्द घर से बाहर करें, ताकि उनके नए उत्पाद बिकते रहें। ऐसे में यह कानून ग्राहक से ज्यादा उत्पादकों के ही हित में है।
इलेक्ट्रॉनिक्स कचरा, पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या है। यह पर्यावरण और जीवित प्राणियों के स्वास्थ्य, दोनों के लिए खतरा है। लेकिन, इस बारे में हमारा अज्ञान कहें या अवहेलना, हम इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों के खराब हो जाने पर उन्हें या तो यूं ही फेंक देते हैं या कबाड़ी को बेच देते हैं, जो उसे अवैज्ञानिक ढंग से डिस्पोज करते हैं। इससे जल, मिट्टी और हवा में मर्करी, आर्सेनिक, लेड, केडमियम, सेलेनियम और हेक्सावेलेंट क्रोमियम जैसे विषाक्त पदार्थ घुल जाते हैं और तरह-तरह की घातक बीमारियों का कारण बनते हैं। प्रत्यक्षत: एक्सपायरी डेट वाले सामानों की यह सूची हमें इन्हीं खतरों से बचाने के लिए तैयार की गई है। इसकी नीयत पर भले ही संदेह न किया जाए, लेकिन इसकी सफलता संदिग्ध ही है।
यह सर्वविदित है कि दुनिया भर में हर साल करोड़ों टन ई-वेस्ट लैंडफिल में चला जाता है या इधर-उधर डम्प कर दिया जाता है। इसकी मात्रा बढ़ती जा रही है। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर, 2020 की रिपोर्ट का कहना है कि वर्ष 2020 में वैश्विक स्तर पर 50.9 मिलियन टन ई-वेस्ट पैदा हुआ। यह 450 लैपटॉप हर सेकेंड कचरे में फेंकने जैसा है। वर्ष 2030 तक इस ई-वेस्ट के 74.7 मिलियन टन तक पहुँचने की संभावना है। भारत में भी हालात बेहतर नहीं है। इस रिपोर्ट के अनुसार, हम विश्व के तीसरे सबसे बड़े ई-वेस्ट उत्पादक देश हैं और हर सेकेंड 280 लैपटॉप कचरे में फेंकते हैं, यानि साल में 32 लाख टन ई-वेस्ट प्रोड्यूस करते हैं। अफसोस की बात यह है कि ग्लोबली ई-वेस्ट का सिर्फ 17.4 प्रतिशत ही ट्रीट हो पाता है और 82.6 प्रतिशत लैंडफिल या सड़कों-मैदानों पर पड़ा रह जाता है।
भारत में यह दर करीब एक तिहाई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले साल हमने 1.71 मिलियन मीट्रिक टन ई-वेस्ट प्रोड्यूस हुआ, जो 170000 हाथियों के वजन के बराबर है। हम इसका 32.9 प्रतिशत ही ट्रीट कर सके। लगभग 1.2 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा अनुपचारित ही रह गया।
लेकिन सवाल तो यह है कि नये कानून से जहां ई कचरे कानूनी तौर पर निपटान सुनिश्चित होगा वहीं ई कचरे का बोझ भी बढेगा। प्रधानमंत्री मोदी हमेशा सस्टेनेबलिटी की बात करते हैं तथा रिड्यूस, रियूज और रिसाइकिल के सिद्धांत को अपनाने पर जोर देते हैं। यह सूची इस विचार को निरस्त करने वाली ज्यादा प्रतीत होती है।
सीधी सी बात है, ज्यादा संख्या में इलेक्ट्रॉनिक आइटमों का उत्पादन, बिक्री और खरीदारी, पहले से ज्यादा ई-वेस्ट पैदा करेंगे। फिर ई-सामानों का बढ़ता उत्पादन भी तो पर्यावरण के लिए ज्यादा समस्याएं पैदा करेगा। इसकी बजाए, क्या यह अच्छा नहीं होता कि कंपनियों को ज्यादा टिकाऊ और रिपेयरेबल चीजों के उत्पादन के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि लोग ज्यादा समय तक उन्हें इस्तेमाल कर सकें और वे कबाड़ बनकर सड़कों पर न आएं।
बाजार के फायदों के लिए हमने लगातार उपभोगवादी संस्कृति को प्रोत्साहित किया है। अगर धरती को बचाना है तो यह समय उपभोक्तावाद की जगह आवश्यक उपभोग को बढ़ावा देने का है। उपभोग कम होगा तो उत्पादन कम होगा, उत्पादन कम होगा तो ई-वेस्ट खुद ब खुद कम होता चला जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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