Disqualification of MPs: सुप्रीमकोर्ट की गलती से बर्खास्तगी और बहाली का ड्रामा
Disqualification of MPs: पहले सुप्रीमकोर्ट के एक फैसले और अब केरल हाईकोर्ट के फैसले ने लोकसभा स्पीकर और लोकसभा सचिवालय का तमाशा बना कर रख दिया है| बात 11 जनवरी 2023 से शुरू होती है। लक्षद्वीप के कावारत्ती सत्र न्यायालय ने लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल को 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान पूर्व कांग्रेस सांसद पी.एम. सईद के दामाद पी. सालिह की हत्या के प्रयास के आरोप में दोषी ठहराया था| दो अन्य अपराधियों के साथ उन्हें भी 10 साल कैद की सजा सुनाई गई थी|
जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8(3) में कहा गया है कि दोषी ठहराए जाने पर और कम से कम दो साल की कैद की सजा होने पर सांसद या विधायक की सदस्यता रद्द हो जाएगी| इससे पहले इसी क़ानून में धारा 8 (4) थी, जिसमें कहा गया था कि अगर फैसले के बाद तीन महीनों में ऊपरी अदालत में याचिका दाखिल कर दी जाती है, और मामला ऊपरी अदालत में लंबित हो जाता है, तो उच्चतम अदालत के फैसले तक सदस्यता बनी रहेगी|

केरल की लिली थामस ने 2005 में सुप्रीमकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया कि जन प्रतिनिधित्व की धारा 8 (4) के कारण सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों के मामले सालों तक अदालतों में लटके रहते हैं और अपराधी ठहराए जाने के बावजूद सांसद और विधायक निर्वाचित सदनों के सदस्य बने रहते है| राजनीति को अपराधीकरण से मुक्ति दिलाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण याचिका थी|
10 जुलाई 2013 को सुप्रीमकोर्ट के दो जजों जस्टिस एके पटनायक और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय ने अपने फैसले में जन प्रतिनिधित्व क़ानून की इस धारा 8 (4) को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि इसके कारण कोर्ट में सालों साल मुकदमा चलता रहता है और सांसद विधायक अपने पदों पर बने रहते हैं|
इसके बाद अपराधी ठहराए गए सजायाफ्ता सांसदों विधायकों की सदस्यता खत्म होने लगी| उस समय लालू यादव को सजा हुई थी और उनकी लोकसभा सदस्यता जाने वाली थी| लालू यादव यूपीए सरकार को समर्थन दे रहे थे, इसलिए मनमोहन सरकार ने सुप्रीमकोर्ट का फैसला पलटने के लिए मंत्रीमंडल से एक अध्यादेश पारित करवाया था| अध्यादेश की इसी प्रति को राहुल गांधी ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस के दौरान फाड़ दिया था|
राहुल गांधी की हरकत से मनमोहन सिंह और उनके मंत्रिमंडल की स्थिति हास्यस्पद हो गई थी| कांग्रेस के भीतर भी बहुत हलचल हुई थी और राहुल गांधी के इस कदम को सरकार का अपमान माना गया था| लेकिन पब्लिक में राहुल गांधी की बहुत वाहवाही हुई थी कि वह राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करना चाहते हैं|
अध्यादेश यह था कि अगर ऊपरी अदालत कन्विक्शन पर रोक लगा देती है, तो सदस्यता बहाल हो जाएगी| जन प्रतिनिधित्व क़ानून के मुताबिक़ कन्विक्शन पर स्टे के बावजूद सदस्यता बहाल का कोई प्रावधान नहीं था, इसी लिए मनमोहन सरकार को अध्यादेश लाना पड़ा था| राहुल गांधी के इस कदम के बाद मनमोहन सरकार दुबक कर बैठ गई और अध्यादेश अपनी मौत मर गया|
लोकप्रहरी नामक उत्तर प्रदेश की एक संस्था ने अदालत के माध्यम से ही वह काम करके दिखा दिया, जो मनमोहन सरकार राहुल गांधी के विरोध के कारण नहीं कर पाई थी| लोकप्रहरी ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में कन्विक्शन पर स्टे के बाद सदस्यता बहाली की जनहित याचिका दाखिल की, लेकिन वहां जब याचिका खारिज हो गई तो लोकप्रहरी ने 2016 में सुप्रीमकोर्ट में जनहित याचिका दायर की|
26 सितंबर 2018 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड (मौजूदा चीफ जस्टिस) ने 2013 के सुप्रीमकोर्ट के एतिहासिक फैसले पर पानी फेर दिया| सुप्रीमकोर्ट की इस तीन सदस्यीय बेंच ने अपने फैसले में कहा कि ऊपरी अदालत कन्विक्शन पर स्टे लगा देती है, तो दोषी पाए गए सांसद और विधायक की सदस्यता बहाल हो जाएगी|
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले ने लोकसभा स्पीकर और विधानसभा स्पीकरों को मजाक का पात्र बना दिया है| वे जनप्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (3) के तहत सजायाफ्ता सांसद, विधायक की सदस्यता रद्द करते हैं, और कोर्ट कन्विक्शन पर स्टे लगा कर सदस्यता बहाल करने के लिए मजबूर कर देती है| सदनों के स्पीकर अदालतों की कठपुतली बन कर रह गए हैं|
मोहम्मद फैजल के मामले में हुआ यह था कि उन्हें 11 जनवरी को दस साल कैद की सजा सुनाई गई थी| जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (3) के मुताबिक़ 25 जनवरी को उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म कर दी गई| लेकिन केरल हाईकोर्ट की एक सदस्यीय पीठ के जज जस्टिस बेचू कुरियन ने यह कहते हुए मोहम्मद फैजल की कन्विक्शन पर रोक लगा थी कि निचली अदालत ने सजा सुनाते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा कि उसके फैसले के कारण लोकसभा चुनाव दुबारा करवाना पड़ेगा| और जो नया सांसद चुना जाएगा, उसे सिर्फ 15 महीने का वक्त मिलेगा|
न्यायपालिका के इतिहास में इससे ज्यादा बेहूदा और गलत फैसला हो ही नहीं सकता था। इसमें संविधान के अनुच्छेद 14 का बेशर्मी से उल्लंघन किया गया था, जिसके मुताबिक़ क़ानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं| जज को इस बात से क्या लेना देना था कि चुने गए विधायक या सांसद की कितनी अवधि होगी| केरल हाईकोर्ट के इस अजीब फैसले ने सांसद के लिए अलग क़ानून की अवधारणा पैदा कर दी थी|
लक्षद्वीप प्रशासन ने केरल हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी| लेकिन सुप्रीमकोर्ट में याचिका लंबित होने के बावजूद लोकसभा स्पीकर ने जल्दबाजी करते हुए 29 मार्च को मोहम्मद फैजल की सदस्यता बहाल कर दी| कन्विक्शन पर स्टे के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में याचिका के चलते लोकसभा स्पीकर मोहम्मद फैजल की सदस्यता बहाली को रोक सकते थे| उन्होंने दो महीने तक रोका भी, इसी दौरान सदस्यता बहाल न होने पर मोहम्मद फैजल ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका लगाई थी, 29 मार्च उनकी याचिका पर सुनवाई थी, लेकिन लोकसभा स्पीकर ने सुप्रीमकोर्ट का फैसला सुनने का इन्तजार तक नहीं किया और सुनवाई से कुछ घंटे पहले ही मोहम्मद फैजल की सदस्यता बहाल कर दी|
उसके बाद 22 अगस्त को सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुईयां की दो सदस्यीय पीठ ने लक्षद्वीप प्रशासन की याचिका पर फैसला सुनाते हुए केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को गलत करार दे दिया, जिसमें मोहम्मद फैजल की कन्विक्शन पर स्टे दिया गया था| सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट को दुबारा विचार करने के लिए कहा| सुप्रीमकोर्ट का फैसला साफ़ इशारा था कि हाईकोर्ट का कन्विक्शन पर स्टे का फैसला गलत था, जिसे सुधारा जाना चाहिए|
आखिर वही हुआ, केरल हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर को मोहम्मद फैजल के कन्विक्शन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया, तो लोकसभा स्पीकर ने 4 अक्टूबर को फिर से उनकी सदस्यता रद्द करने का आदेश जारी कर दिया| उनकी सदस्यता उनके कन्विक्शन की तारीख 11 जनवरी से ही रद्द की गई है| अब सवाल पैदा होता है कि पहले 11 जनवरी से 25 जनवरी और फिर 29 मार्च से 4 अक्टूबर तक सांसद के रूप में मोहम्मद फैजल की लोकसभा में हाजिरी, और समितियों की बैठकों में उनकी मौजूदगी किस दायरे में आएगी|
क्या लोकसभा स्पीकर को 29 मार्च को मोहम्मद फैजल की सदस्यता बहाल करने से पहले सुप्रीमकोर्ट में सदस्यता बहाली की उनकी खुद की याचिका और लक्षद्वीप प्रशासन की केरल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका के फैसले का इन्तजार नहीं करना चाहिए था| स्पीकर ने उनकी सदस्यता बहाली का फैसला किस मजबूरी में लिया था| आज उनकी हड़बड़ी के कारण विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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