Disqualification of MP/MLA: न्यायपालिका और विधायिका ने खड़ा किया संवैधानिक संकट
दो वर्ष या अधिक की सजा पाने वाले सांसदों एवं विधायकों की सदस्यता रद्द होने के कानून पर सुप्रीम कोर्ट और लोकसभा स्पीकर के ताजा फैसलों ने बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

Disqualification of MP/MLA: कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद राहुल गांधी ने अपने अमेरिका दौरे में उस जज पर फिर सवाल उठाया है, जिसने उन्हें मानहानि की सजा दी| उनकी आपत्ति यह है कि यह उनका पहला आपराधिक मामला था और जज ने उन्हें क़ानून की अधिकतम सजा दे दी| एक बात उन्होंने और कही कि जबसे मानहानि कानून बना है तबसे किसी को भी दो साल की सजा नहीं हुई थी| अब इसके दो पहलू हैं। एक पहलू तो यह है कि जब क़ानून में दो साल की सजा का प्रावधान है, तो जज ने अपनी सीमा पार नहीं की| दूसरा पहलू यह है कि राहुल गांधी ने यह मान लिया कि उन्होंने अपराध तो किया था, लेकिन वह इतना बड़ा नहीं था कि उन्हें दो साल की सजा सुनाई जाती|

राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस का हर नेता यह कह रहा है कि जब उन्होंने लोकसभा में मोदी और अडानी के रिश्तों पर सवाल पूछे तो मानहानि के इस बंद केस को दुबारा खोल दिया गया| याचिकाकर्ता भाजपा विधायक ने खुद केस की सुनवाई पर हाईकोर्ट से स्टे लगवाया हुआ था, और जब उन्होंने लोकसभा में मोदी से सवाल पूछे तो याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से स्टे हटाने को कहा| राहुल गांधी को सजा सुनाने वाले जज सहित कई अन्य जजों को मिली प्रमोशन को सुप्रीमकोर्ट ने रोक दिया है, जिससे राहुल गांधी के आरोपों पर लोग विश्वास कर रहे हैं| लेकिन सवाल यह है कि जज को डरा कर क्या उन बड़बोले नेताओं को बड़बोलेपन की छूट दे दी जाएगी, जो बिना आधार के अपने विरोधियों पर अनर्गल आरोपबाजी करके उनकी छवि खराब करने की कोशिश करते रहते हैं|
जज के फैसले से नेताओं में एक डर पैदा हुआ था कि उन्हें जुबान संभाल कर बोलना चाहिए| इसलिए संसद सत्र के दौरान एक दूसरे के कट्टर विरोधी दल भी अदालत के फैसले के खिलाफ एकजुट दिखाई दिए| आम आदमी पार्टी जो कभी भी खुद को कांग्रेस के साथ दिखाने से परहेज करती रही थी, वह भी राहुल गांधी को मानहानि के मामले पर सजा के खिलाफ कांग्रेस के साथ खड़ी हुई| क्योंकि केजरीवाल को लगा कि अगला नंबर उन्हीं का होगा| अब यह मामला गुजरात हाईकोर्ट में है और राहुल गांधी समेत कांग्रेस का हर नेता निचली अदालत के जज की आलोचना कर रहा है| इस आलोचना का असर गुजरात हाईकोर्ट के जज पर भी पड़ेगा, क्या उसे भी डराने की कोशिश की जा रही है? संसद में दिखी विपक्षी एकता का दबाव भी जज पर होगा ही|
ठीक ऐसा ही एक और मामला भी अहमदाबाद के कोर्ट में चल रहा है| यह मामला आम आदमी पार्टी के दो बड़े नेताओं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और सांसद संजय सिंह के खिलाफ है| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री के मामले में ये दोनों नेता गुजरात यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी पर छींटाकसी करते रहे हैं| केजरीवाल ने कहा था कि गुजरात और दिल्ली विश्वविद्यालय प्रधानमंत्री की डिग्री इसलिए नहीं दिखा रहे क्योंकि या तो यह डिग्री नकली है, या फर्जी है| जबकि दोनों यूनिवर्सिटियों ने प्रधानमंत्री की डिग्रियां बाकायदा अपनी वेबसाईट पर डाल दी थी| केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की रोज रोज की छींटाकसी से तंग आ कर गुजरात यूनिवर्सिटी ने केजरीवाल के खिलाफ मानहानि का केस दायर कर दिया|
कोर्ट ने दोनों को 23 मई का नोटिस दिया था, लेकिन दोनों कोर्ट में पेश नहीं हुए। आम आदमी पार्टी ने दावा किया कि कोर्ट से कोई सम्मन ही नहीं मिला था| इसके बाद कोर्ट ने दोबारा सम्मन जारी किया और 7 जून को पेश होने के लिए कहा| लेकिन 7 जून को भी वे अदालत में पेश नहीं हुए, अलबत्ता उन्होंने अपने वकील के जरिए कोर्ट से वे दस्तावेज मांगे हैं, जिनके आधार पर उनके खिलाफ केस दायर किया गया है| लेकिन मानहानि केस में राहुल गांधी का हश्र देखने के बाद आम आदमी पार्टी ने अपना डिग्री दिखाओ अभियान तुरंत बंद कर दिया, क्योंकि उन्हें भी सजा हो सकती है, और उनकी सदस्यता भी जा सकती है|
सांसदों और विधायकों को आपराधिक मामलों में सजा होने पर उनकी सदस्यता तुरंत खत्म कर दिए जाने का प्रावधान सुप्रीमकोर्ट के 2013 के फैसले से हुआ था| जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (3) में प्रावधान है कि किसी विधायक या सांसद को अगर किसी आपराधिक मामले में दो साल या उससे ज्यादा सजा होती है, तो उसकी सदस्यता खत्म हो जाएगी| लेकिन जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (4) उनका बचाव करती थी, इस धारा में कहा गया था कि अगर मामला अगली अदालत में लंबित है, तो धारा 8 (3) लागू नहीं होगी, इसका मतलब यह था कि सुप्रीमकोर्ट का अंतिम फैसला आने तक वे विधायक या सांसद बने रह सकते थे|
वर्ष 2013 में सुप्रीमकोर्ट के दो जजों जस्टिस ए.के. पटनायक और जस्टिस एस.जे. मुखोपाध्याय की पीठ ने अधिवक्ता लिली थॉमस और एनजीओ लोक प्रहरी के सचिव एसएन शुक्ला की जनहित याचिका पर धारा 8 (4 ) को रद्द कर दिया था| तब अपने फैसले में अदालत ने यह भी कहा था कि जिन विधायकों या सांसदों का मामला ऊपरी अदालतों में इस समय लंबित है, उन पर यह फैसला लागू नहीं होगा| यह छूट सिर्फ उस समय के लंबित फैसलों पर दी गई थी| लेकिन सुप्रीमकोर्ट के हाल ही के रूख से सुप्रीमकोर्ट का 2013 का फैसला अर्थहीन साबित हो गया है, जब ऊपरी अदालत की ओर से सजायाफ्ता के कन्विक्शन पर रोक लगा देने के बाद उसकी सदस्यता बहाल हो गई। इस मामले में राजनीतिक जुगाड़ तो हुआ ही, खुद सुप्रीमकोर्ट ने भी सांसद को उसकी सदस्यता बचाने में मदद की| यह मामला लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल का है, जिनकी सदस्यता रद्द हो जाने के बाद बहाल की गई है|
मोहम्मद फैजल एनसीपी के सांसद हैं, उन्हें हत्या के प्रयास के मामले में 11 जनवरी 2023 को दोषी करार देकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी| लोकसभा सचिवालय ने 13 जनवरी को फैजल की सदस्यता रद्द कर दी|18 जनवरी को चुनाव आयोग ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि 27 फरवरी को उपचुनाव होगा| इस बीच फैजल अपनी सजा के खिलाफ हाईकोर्ट गए थे|
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर स्टे की सुनवाई के लिए 20 फरवरी की तारीख तय की हुई थी| फैजल चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट चले गए। सुप्रीमकोर्ट ने सुनवाई के लिए 27 जनवरी की तारीख तय कर दी| इस बीच केरल हाईकोर्ट ने 25 जनवरी को मोहम्मद फैजल के कन्विक्शन पर स्टे लगा दिया| 27 जनवरी को सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई, तो मोहम्मद फैजल के वकील ने हाईकोर्ट का फैसला दिखा दिया|
इस पर जब सुप्रीमकोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा, तो चुनाव आयोग ने कहा कि वह हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार आगे का फैसला लेगा| लेकिन यह तभी हो सकता था जब लोकसभा स्पीकर उनकी सदस्यता बहाल करते| मोहम्मद फैजल ने अपनी लोकसभा सदस्यता बहाली के लिए लोकसभा स्पीकर को भी याचिका लगाई| एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने लोकसभा स्पीकर से मुलाक़ात करके उनकी सदस्यता बहाली के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और स्पीकर पर दबाव बनाया|
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लोकसभा स्पीकर ने क़ानून मंत्रालय की राय लेकर मोहम्मद फैजल की सदस्यता बहाल कर दी, और उपचुनाव रूक गया| यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि क़ानून मंत्रालय ने क़ानून के किस प्रावधान के तहत सदस्यता बहाल करने की सिफारिश की, और स्पीकर ने किस आधार पर सदस्यता बहाल की। क्योंकि क़ानून में सदस्यता रद्द करने का प्रावधान तो है, लेकिन सदस्यता बहाल करने का कोई प्रावधान नहीं है| जब 2013 के फैसले में ऊपरी अदालत के प्रावधान को खत्म ही कर दिया गया था, तो ऊपरी अदालत की ओर से कन्विक्शन पर तुरत फुरत रोक लगाने, क़ानून मंत्रालय की ओर से सदस्यता बहाल करने की सिफारिश करने और लोकसभा स्पीकर की ओर से सदस्यता बहाल करने पर संदेह पैदा होता है, क्योंकि इन सबने मिल कर सुप्रीमकोर्ट के 2013 के फैसले को निष्प्रभावी और नकारा बना दिया|
लेकिन उत्तर प्रदेश के रामपुर के विधायक आजम खान के मामले में सुप्रीमकोर्ट का 2013 का फैसला हास्यस्पद साबित हो रहा है| इसी फैसले के कारण संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है| हेट स्पीच के मामले में रामपुर की निचली अदालत ने आजम खान को तीन साल की सजा सुनाई थी| विधानसभा स्पीकर ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी, छह महीनों के भीतर उनकी खाली सीट पर चुनाव हो गया| लेकिन सातवें महीने एमएलए एमपी विशेष अदालत ने उन्हें हेट स्पीच से बरी कर दिया| अब सुप्रीमकोर्ट को जवाब देना पड़ेगा कि लक्षद्वीप के सांसद की सदस्यता बहाल की गई, तो रामपुर के विधायक की सदस्यता क्यों बहाल नहीं होनी चाहिए| अगर आजम खान की सदस्यता बहाल होती है, तो नए चुने गए विधायक का क्या होगा, उसे भी तो इसी संविधान के तहत चुना गया है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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