Loan Apps: डिजिटल सूदखोरों के ऋणजाल में फंस रहे लोग
Loan Apps: पिछले साल जुलाई 2022 में भोपाल में एक नौजवान निशंक राठौर की आत्महत्या का मामला सुर्खियों में था। वह रेल की पटरी पर मरा हुआ पाया गया और उसके पिता के मोबाइल पर ठीक उसी समय ऐसा मैसेज आया जिससे लगता था कि उसे नबी से गुस्ताखी की सजा दी गयी है। हालांकि पुलिस ने जांच की तो कुछ और ही कहानी सामने आयी। जांच में पुलिस को पता चला कि निशंक ने कई लोन एप्स से लोन लेकर क्रिप्टो करंसी में निवेश किया था। वह पूरी तरह से लोन एप्स के जाल में फंस चुका था और संभवत: इसी जाल से निकलने के लिए उसने आत्महत्या का रास्ता चुना तथा अपनी आत्महत्या का कारण छिपाने के लिए घरवालों को भी गुमराह किया।
ऐसी एक नहीं अनेक घटनाएं सामने आती रहती हैं जहां लोन एप्स के जरिए लिए गये ऋण न चुका पाने पर लोगों को इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वो अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर देते हैं। अभी जब यह लेख लिखा जा रहा है उस समय हैदराबाद में एक युवक नरेश लोन एप के चलते अपनी जीवनलीला समाप्त कर चुका है। मीडिया के अनुसार करीमनगर का रहने वाला नरेश एक वर्ष पहले नौकरी के लिए हैदराबाद आया था और अरबीनगर में लकी डीलक्स बॉयज हॉस्टल में रह रहा था। उसके पास एक दिन प्राइवेट लोन एप से मेसेज आता है और फिर वह उस एप से लोन ले लेता है। वह लगातार उसकी किश्तें चुका रहा होता है। मगर लोन एप के कर्मियों ने उससे कहा कि उन्हें सारा पैसा एक साथ चाहिए जिसके बाद वह अवसादग्रस्त हो गया और उसने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली।

पुलिस का कहना है कि युवा लोन लेने से बचें। परन्तु कोई भी युवा लोन के चक्कर से कैसे बच सकता है जब अपनी इच्छाओं की तुरंत पूर्ति करने के लिए लोन लेने को ही समझदारी बताया जा रहा हो। गर्लफ्रेंड को गिफ्ट देना है तो क्रेडिट कार्ड बिल पर ईएमआई, घर खरीदना है तो होम लोन, या फिर घूमने जाना है तो पर्सनल लोन। मनपसन्द वाहन चाहिए तो व्हीकल लोन! आपकी कोई भी इच्छा है जिसकी पूर्ति नहीं हो रही है, तो बाजार आपके लिए लोन का टोकरा लेकर खड़ा है। कर्ज लेकर खर्च करो के सिद्धांत का प्रचार लोगों को इतना प्रभावित कर चुका है कि लोग अपने आप ही फंसने चले आते हैं। लोन एप्स वालों को बहुत प्रयास नहीं करना पड़ता। आपको करना ही क्या है, बस कुछ डिटेल्स देनी हैं और मिल गया कर्ज।
डिजिटल एप से ऋण कोई भी व्यक्ति किसी भी कारण से ले सकता है। बहुत ही आकर्षक विज्ञापन लोन को लेकर दिन भर नेट पर आते हैं कि एक क्लिक में लोन मिल जाएगा। लोन तो आकर्षक शर्तों पर दे दिया जाता है, परन्तु उसे चुकाया कैसे जाएगा? इस यक्ष प्रश्न पर बात नहीं होती। तब तक इस पूरी प्रक्रिया पर बात नहीं होती तब तक जो भी आत्महत्याएं हो रही हैं, वह आत्महत्याएं ही कहलाती रहेंगी। जबकि वह हत्याएं हैं। वह उन सपनों के जाल में फंसाकर की जानेवाली हत्याएं हैं, जिसमें लोन के माध्यम से क्षणिक खुशियों को पूरा करना तो सम्मिलित होता है, परन्तु उन क्षणिक खुशियों को पूरा करने के पीछे जो अंधकारपूर्ण यथार्थ है, उसे दबा दिया जाता है।
सारा जोर यहाँ पर आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं का है। निरर्थक आवश्यकताओं को प्राथमिकता समझकर व्यक्ति इस प्रकार फंसता है कि वह बाहर निकल ही नहीं पाता। जैसा भोपाल के उस परिवार के साथ हुआ था जिसने थोड़े से लालच में अपनी खुशहाल ज़िन्दगी को तबाह कर दिया। वह व्यक्ति अच्छी खासी नौकरी करके अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ खुशहाल ज़िन्दगी बिता रहा था, मगर थोड़े से पैसों और जरूरतों के चलते वह ऑनलाइन एक्स्ट्रा वर्क और उसके बाद लोन के जाल में फंस गया और जब उसके अनुसार कोई रास्ता नहीं बचा तो उसने पत्नी और दोनों बच्चों के साथ 12 जुलाई 2023 को आत्महत्या कर ली थी! उसने अपने सुसाइड नोट में अपने तमाम परिजनों से क्षमा माँगी थी।
एक दौर में साहूकारों के खिलाफ सामाजिक और बौद्धिक अभियान खूब चला। उन्हें शोषक बताया गया और उनकी जगह बैंकिंग सिस्टम को विकल्प के तौर पर प्रस्तुत किया गया जहां सब कुछ तय मानक पर होता है। लेकिन आज जिस तरह से डिजिटल साहूकार पैदा हो गये हैं, उनका लोन वसूलने का तरीका इतना भयावह है कि उसके सामने मदर इंडिया के सुक्खी लाला की काल्पनिक कहानी भी कम डरावनी लगेगी।
बेरोजगार या कम आय वाले लोगों को जहां बैंक से ऋण मिलना कठिन होता है और तमाम औपचारिकताएँ होती हैं, वहीं डिजिटल एप्स चुटकी बजाते ही व्यक्ति को ऋण प्रदान कर देते हैं। चूंकि उसको ब्याज के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं बताया जाता इसलिए जब वह ऋण चुकाना आरम्भ करता है तो उसे पता चलता है कि वह तो वर्षों के लिए एक बंधुआ मजदूर बन गया। वह जो कमा रहा है वह इन्हीं के लिए कमा रहा है और जब वह एक दिन इनके लिए नहीं कमा पाता तो यह लोग वसूली एजेंट ही नहीं भेजते हैं बल्कि उसके फोन से चुराई गई निजी तस्वीरें और वीडियो भी मोर्फ करके उसकी कॉन्टैक्ट लिस्ट में वायरल कर देते हैं। ऋण लेने वालों के रिश्तेदारों को कॉल करने लगते हैं और उन्हें गालियां देने लगते हैं कि तुम्हारे एक परिचित ने लोन का पैसा नहीं लौटाया है।
एक किस्सा खोजने जाएं तो कई किस्से सामने आते हैं, परन्तु कोई भी आज इन डिजिटल लुटेरों और इंस्टेंट लोन की इस चकाचौंध के विषय में बात नहीं कर रहा। कोई भी इन एप्स को या फिर उस व्यवस्था को जिसमें ऋण न चुकाए जाने पर बैंक द्वारा भी जब समय नहीं दिया जाता तो प्रणाली को दोषी नहीं ठहराता। जैसे हाल में ही केरल में एक मां बेटी ने बैंक लोन के तगादे के कारण आत्महत्या कर ली।
ऐसे डिजिटल लुटेरों की इस संगठित डकैती की चपेट में जो लोग आ रहे हैं वह या तो मध्यवर्ग के लोग हैं या फिर वे गरीब लोग जिन्हें कुछ हजार रूपए तक की आवश्यकता होती है। गरीबों की आवाज उठाने का दावा करने वाले वो लोग ऐसे शोषण से लगातार होती आत्महत्याओं पर शांत हैं जिन्होनें एक दौर में ऐसी सूदखोरी के खिलाफ सामाजिक माहौल खड़ा कर साहूकारों को खलनायक घोषित कर दिया था। लेकिन आज लोन वसूली के नाम पर डिजिटल ऐप्स लोगों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रहे हैं तो कोई इसे सामाजिक विमर्श का मुद्दा क्यों नहीं बनाता?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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