राजराजा चोला हिन्दू नहीं थे तो फिर दसवीं सदी में हिन्दू कौन था?
राजराजा चोला के बारे में उत्तर भारत के लोग बहुत कम जानते हैं, तो उनके नाम पर होनेवाले विवाद से भी उसका वास्ता कहां होगा? हां, उत्तर से दक्षिण जानेवाले तीर्थयात्री उस वृहदेश्वर मंदिर जरूर जाने का प्रयास करते हैं जो तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित है। कोई हजार साल पुराना ये शिव मंदिर यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में घोषित किया गया है।

इस साल इस मंदिर के नाम एक रिकार्ड और जुड़ गया। तंजावुर के वृहदेश्वर मंदिर को देखने के लिए ताजमहल से ज्यादा विदेशी पर्यटक आये। इसकी वजह से तमिलनाडु विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के नाम पर देश का पहला राज्य बन गया।
लेकिन जिस राजराजा चोला (प्रथम) ने 1003 से 1010 के बीच इस वृहद शैव मंदिर का निर्माण करवाया उसी के नाम पर इस समय तमिलनाडु से एक विवाद पैदा किया गया है। विवाद पैदा किया है एक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक वेथिमारन ने। उन्होंने कहा है कि राजराजा चोला को हिन्दू राजा नहीं कहा जा सकता। दसवीं सदी में जब वो राज कर रहे थे तब हिन्दू धर्म जैसा कुछ नहीं था। इसलिए उनको 'महान हिन्दू राजा' के तौर पर प्रस्तुत करना इतिहास के साथ अन्याय होगा। इससे "हमारे" प्रिय शैव राजा का भगवाकरण होगा।
वेथिमारन की यह टिप्पणी तमिल फिल्म "पोन्नियिन सेल्वन-1" के बारे में है। तमिल भाषा में बनी ये फिल्म राजराजा चोला प्रथम के जीवन से जुड़ी है। चोल साम्राज्य के बारे में तमिल फिल्मकार भी लंबे समय से फिल्म बनाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन यह सफलता मिली मणिरत्नम को जो कि तमिल के अलावा हिन्दी में भी अनेक फिल्में बना चुके हैं।
मणिरत्नम ने फिल्म को सिर्फ तमिल भाषा तक सीमित रखा है। इसको किसी और भाषा में रिलीज नहीं किया गया है। इसके बावजूद 30 सितंबर को रिलीज होनेवाली पोन्नियिन सेल्वन ने एक सप्ताह में 325 करोड़ की कमाई करके तमिल सिनेमा में नया रिकार्ड कायम किया है।
वेथिमारन की राजराजा चोला के बारे में की गयी टिप्पणी इसी फिल्म से जुडी हुई है। उनकी इस टिप्पणी के बाद तमिल अभिनेता कमल हासन ने भी उनको सही ठहराते हुए कहा है कि उस समय हिन्दू धर्म था ही नहीं। उस समय शैव, वैष्णव और शाक्तम आदि धर्म थे। ऐसे में राजराजा चोला को हिन्दू राजा कैसे कहा जा सकता है? कुछ अन्य इतिहासकार भी इसी बात को सही ठहरा रहे हैं कि जब दसवीं सदी में हिन्दू धर्म था ही नहीं तो राजराजा चोला को हिन्दू कैसे कहा जा सकता है?
अब सवाल ये उठता है कि अगर दसवीं सदी के राजराजा चोला हिन्दू नहीं थे तो फिर उस समय हिन्दू कौन था? इस परिभाषा के अनुसार तो पूरे भारत में कोई हिन्दू नहीं था। भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार की धार्मिक मान्यताएं प्रचलित थीं। शैव और वैष्णव। इन्हें आप निर्गुण और सगुण के रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं। शैव मुख्य रूप से निर्गुण निराकार ईश्वर की साधना करते थे जबकि वैष्णव ईश्वर को सगुण और साकार रूप से पूज रहे थे। इनका प्रभाव उत्तर से लेकर दक्षिण तक था। उत्तर में शैव मत उतना ही प्रासंगिक था जितना दक्षिण में वैष्णव मत।
छठी शताब्दी से नौंवी शताब्दी के बीच वर्तमान तमिलनाडु में अलवार संतों का जोर था जो कि वैष्णव संत परंपरा थी। उसके पहले और उसके बाद भी नयनार संतों का तमिल संस्कृति पर अच्छा खासा प्रभाव रहा है जो शैव परंपरा के वाहक थे।
इसलिए जिस तमिलनाडु में वेथिमारन या कमल हासन राजराजा चोला को शैव बताकर अहिन्दू घोषित कर रहे हैं वहां आज भी शैव और वैष्णव दोनों मौजूद हैं। लेकिन क्या दोनों में कोई झगड़ा है? क्या दोनों अपनी पहचान हिन्दू के रूप में स्वीकार नहीं करते?
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हिन्दू शब्द के उद्भव और विकास को लेकर बहुत बहस है। कुछ इसकी प्रामाणिकता पौराणिक काल तक ले जाते हैं लेकिन सामान्यतया ये माना जाता है कि इस्लामिक आक्रमणकारियों ने भारत के रहने वालों को हिन्दू के रूप में परिचय दिया। भारत के रहनेवाले को वो अल हिन्दी या हिन्दू कहते थे। अंग्रेजों ने इसी पहचान को यहां के लोगों के साथ धार्मिक पहचान के रूप में जोड़ दिया। इस नयी पहचान के बाद शैव और वैष्णव की पहचान सामान्य जनमानस के लिए बहुत प्रासंगिक नहीं रह गयी है। एक सामान्य भारतीय ये नहीं जानना चाहता है वह शैव, शाक्त या वैष्णव किस मत से जुड़ा हुआ है। उसके लिए धर्म के कॉलम में हिन्दू शब्द उसकी पहचान के लिए पर्याप्त है।
इसकी वजह से भारतीय धर्म व्यवस्था में एक प्रकार का केन्द्रीयकरण भी दिखाई देता है। शैव वैष्णव या फिर शाक्त के अलावा आज भी ऐसे सैकड़ों पंथ हैं जिनकी अपनी अलग धार्मिक पहचान है। लेकिन हिन्दू होने के कारण उनकी उस पहचान को कोई खतरा पैदा नहीं होता। कर्नाटक के लिंगायत हों कि उत्तर प्रदेश के कबीरपंथी। दोनों को अपनी अपनी धारणा और मान्यता के साथ हिन्दू बने रहने में कोई परेशानी नहीं है।
हां, परेशानी तब होती है जब राजनीतिक इच्छाओं का धार्मिक व्यवस्था में प्रवेश होता है। जैसे तमिलनाडु का ही उदाहरण लें तो जिस वेथिमारन ने राजराजा चोला को जोर से अहिन्दू बताकर धीरे से शैव ठहराया है, वो स्वयं पेरियार के परिवार से आते हैं। पेरियार को तमिलनाडु में दलित सभ्यता का नायक कहा जाता है जिन्होंने पूरे जीवन सिर्फ धर्म को अपमानित करने का ही काम किया। उन्होंने वेथिमारन की तरह अपने आप को कभी शैव तो नहीं कहा, लेकिन सबसे जोरदार प्रहार वैष्णव मान्यताओं पर ही किया। उन्होंने अपनी एक 'सच्ची रामायण' ही लिख दी थी जिसमें रामायण के हर चरित्र की मनमानी चित्रण किया है। स्वाभाविक है, उनके परिवार की तीसरी पीढी इस पंरपरा से अपने आप को अलग तो नहीं करेगी?
वेथिमारन हों या कमल हासन, वो उस शैव वैष्णव संघर्ष को दोबारा जिन्दा करना चाहते हैं जो हिन्दू पहचान के कारण भारत का अतीत हो गया है। इसलिए समय समय पर ऐसे बेतुके बयान देते रहते हैं जिसका धर्म से ज्यादा संबंध राजनीति से होता है।
तमिल सिनेमा के बारे में कहा ही जाता है कि तमिल सिनेमा द्रविड़ राजनीति की जननी है। एमजीआर हों, करुणानिधि हों या फिर जे जयललिता। ये सब तमिल सिनेमा से ही तमिल राजनीति में आये। तमिल सिनेमा में ब्राह्मणों को शोषक और दलितों को शोषित के तौर प्रस्तुत करना वहां का स्थापित विषयवस्तु है।
ऐसे में अब एक कदम और आगे निकलकर वेथिमारन और कमल हासन हिन्दू शब्द पर प्रहार कर रहे हैं ताकि तमिल इस पहचान को स्वीकार न कर पायें और राज्य में जाति से बाहर निकलकर धार्मिक ध्रुवीकरण न होने पाये।
तथ्यात्मक रूप से उनकी बात सही होने के बावजूद व्यावहारिक रूप से पूरी तरह से अप्रासंगिक है। इस बारे में कर्ण सिंह की टिप्पणी बिल्कुल सटीक है कि यह विवाद वैसे ही है जैसे किसी ईसाई को कहा जाए कि तुम ईसाई नहीं हो बल्कि कैथोलिक या प्रोटेसटेंट हो। तथ्यात्मक रूप से सही होने के बाद भी व्यावहारिक रूप से ऐसे वर्गीकरण का धार्मिक महत्व क्या है?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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