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Nehru Memorial Library: क्या कांग्रेस नेताओं के लिए दुधारू गाय बन चुकी थी नेहरु मेमोरियल लाइब्रेरी?

Nehru Memorial Library: दिल्ली के लुटियन इलाके में अंग्रेजों ने दो बड़े आलिशान भवनों का निर्माण करवाया था। एक वायसराय का घर था, जो स्वाधीनता के बाद राष्ट्रपति भवन बना। दूसरा भवन, वायसराय भवन के सामने साउथ एवेन्यू के अंतिम छोर पर बने तीन मूर्ति सर्किल पर बनाया गया। यह ब्रिटिश इंडियन आर्मी के कमांडर-इन-चीफ का आधिकारिक निवास था। तीन मूर्ति सर्किल से सटे होने कारण इसे 'तीन मूर्ति भवन' के नाम से लोकप्रियता मिली। वैसे उन दिनों राजनैतिक गलियारों में इसे 'छोटा राष्ट्रपति भवन' के नाम से भी जाना जाता था।

आजादी से पहले जवाहरलाल नेहरु 17 यॉर्कशायर रोड पर रहते थे। उनके इस घर के सामने ही सरदार वल्लभभाई पटेल का निवास था। फिर जब जवाहरलाल नेहरु प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपने रहने के लिए इसी तीन मूर्ति भवन को चुना।

Congress leaders over Nehru Memorial Library background history

साल 1972 में सरदार पटेल के पत्रों का संकलन 10 खंडों में अहमदाबाद के नवजीवन ट्रस्ट ने प्रकाशित किया। इस विमोचन के कार्यक्रम में सरदार पटेल की बेटी मणिबेन पटेल बतौर अथिति के नाते मौजूद थी। उन्होंने इस कार्यक्रम में उन शुरुआती दिनों को याद करते हुए खुलासा किया कि मेरे पिताजी और श्रीमान नेहरु जब आमने-सामने रहते थे, तो लगभग हर दिन मिलते थे। वे दोपहर या रात्रि के भोजन पर अकसर मिलते रहते थे। एक-दूसरे के घरों में बैठकों के सिलसिले में आना-जाना लगा रहता था। मगर यह बातचीत तब कठिन हो गयी, जब लार्ड माउंटबैटन की सलाह पर श्रीमान नेहरु तीन मूर्ति मार्ग पर रहने लगे। यहीं से दोनों के बीच मतभेद भी बढ़ते चले गये।

इन उठापटकों के बावजूद जवाहरलाल नेहरु जबतक देश के प्रधानमंत्री रहे, तबतक इसी तीन मूर्ति भवन में रहे। उनका निधन 27 मई 1964 को इसी भवन में हुआ। इसके लगभग एक महीने बाद यानी 27 जून को तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस तीन मूर्ति भवन को जवाहरलाल नेहरु को समर्पित करते हुए एक मेमोरियल बनाये जाने का प्रस्ताव रखा।

फिर 14 सितम्बर को ललित सेन ने लोकसभा में बताया कि तीन मूर्ति भवन प्राथमिक तौर पर एक पुस्तकालय के साथ म्यूजियम बनेगा, जोकि जवाहरलालजी को समर्पित होगा। यह सरकार ने तय कर लिया है।

सरकार के इस फैसले पर लोकसभा सांसद प्रकाशवीर शास्त्री ने सवाल उठाया कि समाचारपत्रों में प्रधानमंत्री नेहरु की जो वसीयत प्रकाशित हुई है, उसमें उन्होंने मेमोरियल बनाने जैसा कोई अनुरोध नहीं किया गया था। इसपर प्रधानमंत्री शास्त्री ने सदन को बताया कि जहां तक पंडित जवाहरलाल नेहरु की बात है, यह सही है कि उन्होंने न तो मन में ऐसी कल्पना की होगी और न उन्होंने कभी इस सम्बन्ध में लिखा है, लेकिन यह हमारा (कांग्रेस) फैसला था। हमने इसपर विचार किया, सरकार ने भी विचार किया और निश्चय किया कि वहीं उनका एक स्मारक बने।

दरअसल, विपक्षी दलों का अनुरोध था कि इस भवन को प्रधानमंत्री का आधिकारिक निवास रहने दिया जाये। यही बात प्रधानमंत्री नेहरु के निजी सचिव एम.ओ. मथाई ने अपनी पुस्तक 'रेमिनेंसिस ऑफ द नेहरु ऐज' में लिखी है कि प्रधानमंत्री के निवास को जवाहरलाल नेहरु म्यूजियम में बदलना एक गलती थी।

इस दौरान मेमोरियल के नामपर 14 अगस्त तक 8 लाख 34 हजार रुपये का चंदा भी इकट्ठा हो गया। जनता से मांगे गये इस पैसे पर तब कई सांसदों ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के माध्यम से चिंता जताई थी। उनका कहना था कि इस रकम के दुरुपयोग होने की सम्भावना है। इसे लेकर पारदर्शिता सहित तत्काल प्रभावी कदम उठाने चाहिए। दरअसल, इससे पहले भी गांधी स्मारक निधि और कस्तूरबा स्मारक निधि के धन का गलत इस्तेमाल हो चुका था।

इन सवालों का जवाब प्रधानमंत्री शास्त्री ने यह कहकर दिया कि सरकार पूरी कोशिश करेगी कि मेमोरियल के पैसे का सही तरीके से इस्तेमाल हो। इसलिए आनन-फानन में तीन दिन बाद यानी 17 अगस्त को जवाहरलाल नेहरु मेमोरियल फंड का गठन कर दिया गया। इसका अध्यक्ष डॉ. जाकिर हुसैन और सचिव इंदिरा गांधी को बनाया गया। इस बीच चंदा एकत्र करने का क्रम लगातार जारी था। उन दिनों 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' में जनता से चंदा मांगने के कई विज्ञापन प्रकाशित हुए थे। दानदाताओं की सूचियां भी समाचार-पत्र में छापी गयी। ऐसे ही 57वीं सूची के अनुसार जनवरी 1965 तक ₹2,39,330.46 मेमोरियल के नामपर पैसा आ चुका था। कांग्रेस पार्टी की तरफ से भी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को करोड़ों रुपये इकट्ठा करने का टारगेट दिया गया। जैसे केरल को 50 लाख का तो महाराष्ट्र को 2 करोड़ के टारगेट मिले।

इस बीच प्रधानमंत्री शास्त्री अपने फैसले पर अड़े रहे और उन्होंने 14 सितम्बर 1964 को लोकसभा में फिर से दोहराया कि जवाहरलाल नेहरु को समर्पित मेमोरियल बनाने का फैसला सरकार ने और हमने (कांग्रेस पार्टी ने) विचार कर बनाया है। इस तरह तमाम विरोधों और सवालों को दरकिनार करते हुए 14 नवम्बर को तत्कालीन राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने प्रधानमंत्री शास्त्री की मौजूदगी में नेहरु मेमोरियल का उद्घाटन किया।

उन शुरुआती दिनों में यही कल्पना की गयी थी कि यह मेमोरियल सिर्फ जवाहरलाल नेहरु के दस्तावजों का संकलन और प्रकाशन करेगा। 27 नवम्बर 1964 को केंद्रीय शिक्षामंत्री एम.सी. छागला ने भी राज्यसभा में यही बात कही कि तीन मूर्ति मुख्य रूप से पुस्तकालय के साथ-साथ एक म्यूजियम बनेगा जोकि दिवंगत श्री जवाहरलाल नेहरु को समर्पित होगा। फिर अप्रैल 1966 में इस काम के प्रशासन एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी नेहरु मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी सोसाइटी को सौंप दी गयी।

गौरतलब है कि इन बीते दो सालों में जनता से जो लाखों-करोड़ों रुपये मेमोरियल अथवा फंड के नामपर देशभर से इकठ्ठा किये गये, उसका क्या हुआ, कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुछ सालों बाद केंद्र सरकार ने राज्यसभा में बताया कि अब पुस्तकालय से किताबें भी गायब होने लगी है और 1986 में 257 किताबें खो चुकी थी।

उपरोक्त अपारदर्शी वित्तीय व्यवस्था और किताबों के गुम होने के बीच समय के साथ-साथ नेहरु मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी ने शोध तथा अकादमिक दुनिया में लोकप्रियता हासिल कर ली। फिलहाल इस पूरे परिसर में चार इमारतें है। मुख्य इमारत में जवाहरलाल नेहरु के निजी सामानों की प्रदर्शनी सहित स्वाधीनता संग्राम की संक्षिप्त जानकारियां तस्वीरों के माध्यम से सहेजी गयी हैं। इसके दाहिनी और प्लेनेटोरियम है और बायीं तरफ माइक्रोफिल्म्स तथा मैन्यूस्क्रिप्ट का एक बड़ा पुस्तकालय है। जहां सरदार पटेल, डॉ. आंबेडकर, वीर सावरकर, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और चौधरी चरण सिंह सरीखे 500 से ज्यादा प्रमुख लोगों के मूल दस्तावजों का संकलन मौजूद है। साथ ही सैकड़ों समाचार-पत्रों का भी डिजिटल संग्रह यहां उपलब्ध है। साल 2022 में मुख्य इमारत के पीछे की तरफ देश के सभी प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया।

यह भी एक विडंबना है कि साल 2013 में कांग्रेस सरकार से संसद में पूछा गया कि नेहरु मेमोरियल जैसा ही एक मेमोरियल सरदार पटेल के नामपर भी होना चाहिए। इसपर तत्कालीन संस्कृति मंत्री चन्द्रेश कुमारी कटोच ने साफ इंकार कर दिया। इसलिए वर्तमान में देखें तो जो कल्पना शुरुआत में सिर्फ पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु तक सीमित थी, तब से अनेक प्रधानमंत्री हो चुके हैं। इस नाते जरुरी है कि इस राष्ट्रीय संस्थान को व्यापक दर्जा मिले जोकि सभी महापुरुषों के योगदान के साथ न्यायसंगत हो। अतः 'नेहरु मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी' का नाम बदलकर 'प्राइम मिनिस्टर्स म्यूजियम एंड लाइब्रेरी सोसाइटी' रखना एक सामयिक कदम है।

अब कांग्रेस पार्टी को यह नाम बदलने की योजना रास नहीं आ रही है। पार्टी के नेता इस कदम का विरोध जताते रहे है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी की सरकार, भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के योगदान को कमतर करने में लगी है। मगर इससे पहले उन्हें अपने उन कारनामों पर भी नजर डालनी चाहिए जो यूपीए सरकार ने प्रधानमंत्री नेहरु के मेमोरियल के नामपर किये थे।

जैसे शुरुआती दिनों में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पैसों का लेनदेन अपारदर्शी रखा, वैसे ही कांग्रेस सरकारों में मेमोरियल को वित्तीय अनियमितताओं से भर दिया गया। साल 2011 में केंद्रीय संस्कृति मंत्री कुमारी शैलजा ने इन वित्तीय अनियमितताओं को खुद स्वीकार किया था। उनका कहना था कि 2007-08 में आधुनिकीकरण के नामपर नेहरु मेमोरियल को ₹20 करोड़ की रकम आवंटित की गयी थी। चीफ कंट्रोलर एकाउंट्स ने अपनी जांच में इस पैसे के इस्तेमाल में अनियमितताओं की जानकारी दी है। केंद्रीय मंत्री ने आगे बताया कि 2006 से 2009 के बीच प्रकाशन, पुस्तकालय के विकास, रेप्रोग्राफी और निधि संरक्षण में अनियमिततायें मिली हैं। कंसल्टेंट की नियुक्तियों में भी गड़बड़ियों की बात कही गयी। साथ ही वित्तीय नियमों का भी उल्लंघन किया गया।

इसी प्रकार कुमारी शैलजा ने ही साल 2012 में भी बताया कि साल 2009-10 की ऑडिट रिपोर्ट में वित्तीय गड़बड़ियाँ मिली हैं। इस दौरान नेहरु मेमोरियल म्यूजियम लाइब्रेरी के ₹5 करोड़ जवाहरलाल नेहरु मेमोरियल फंड को ट्रांसफर किये गये थे। जबकि यह एक निजी फंड था। 43 पेज की ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया कि यह ट्रांसफर अवैध तरीके से हुआ था। ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया कि यह पैसा जवाहरलाल नेहरु और सी. राजगोपालचारी के नाम पर स्पेशल प्रकाशनों के लिए लिया गया था। जबकि जवाहरलाल नेहरु मेमोरियल फंड ने इस रकम को प्रकाशन के काम में न लेकर फिक्स्ड डिपोजिट कर दिया।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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