पुरखों से लेकर डॉगी तक, राहुल गांधी का क्या है कनेक्शन?
Rahul Gandhi Pet: इंस्टाग्राम पर राहुल गांधी ने पिछले दिनों अपने डॉगी Yassa के साथ वीडियो शेयर किया है। जिस Yassa की तस्वीरें राहुल गांधी ने इंस्टाग्राम पर शेयर की हैं, उसके नाम का अर्थ सीधे-सीधे मंगोल हमलावर चंगेज खान से जुड़ता है।
मंगोल और तुर्की में इस शब्द का अर्थ है सैन्य फरमान। मंगोल आक्रांता चंगेज खान ने इस नाम से सीक्रेट सिविल कोड बनाए थे, बेटे को लागू करने की जिम्मेदारी दी थी और जो नहीं मानता था उसका कत्ल कर दिया जाता था। क्रूरता और आतंक से जुड़े इस नाम को राहुल गांधी ने अपने डॉगी के लिए क्यों चुना होगा, समझ से बाहर है।

ये उसी तरह है कि तैमूर के दिल्ली में नरसंहार के दिनों यानी 19-20 दिसम्बर में पैदा हुए बेटे को सैफ अली खान और करीना कपूर ने तैमूर नाम दे दिया था। राहुल गांधी के कुत्ते यासा से जुड़ी एक चौंकानेवाली बात यह भी है कि वह जिस जैक रसेल टैरियर ब्रांड का कुत्ता है, उस नस्ल का नाम जैक रसेल नामक एक ईसाई पादरी पर रखा गया था।
बहरहाल, नेहरु-गांधी परिवार पर उनके पुरखों के जमाने से उन पर मुस्लिम समुदाय के प्रति झुकाव के आरोप लगते रहे हैं और इसके पीछे वाजिब वजहें भी हैं। नेहरू परिवार का सबसे पुराना ज्ञात चेहरा है राज कौल या राज नारायण कौल का। कश्मीर में फारसी और संस्कृत दोनों विषयों पर उनकी पकड़ के चलते विद्वानों में गिनती होती थी। ऐसे में 1716 में कश्मीर यात्रा के दौरान मुगल बादशाह फरूखशियर ने राज कौल को दिल्ली में बसने का न्यौता दिया।
हालांकि ये बात बहुत अजीब लगती है कि अगले ढाई से तीन साल के अंदर सैयद बंधुओं ने फर्रुखशियर को मारकर दिल्ली की गद्दी कब्जा ली, उस दौरान फर्रुखशियर के करीबियों पर भी बिजली गिरी, लेकिन राज कौल दिल्ली में ही बने रहे। बीस साल बाद 1739 में नादिर शाह ने भी दिल्ली में जमकर कत्ल ए आम मचाया, लेकिन तब भी कौल परिवार कश्मीर नहीं लौटा।
राज कौल के किसी बेटे के बारे में तो जानकारी नहीं मिलती, लेकिन दो नातियों के बारे में जरुर पता चलता है। एक थे मौसाराम कौल और दूसरे थे साहेब राम कौल। मौसाराम कौल के बेटे थे लक्ष्मी नारायण कौल जो दिल्ली के मुगल दरबार में ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरफ से पहले वकील नियुक्त किए गए थे। इस बात की जानकारी नहीं मिल पाई कि कैसे कौल परिवार ईस्ट इंडिया कम्पनी के इतने करीब पहुंच गया कि उन्होंने दिल्ली के मुगल दरबार में लक्ष्मी नारायण को अपना वकील नियुक्त कर दिया। लेकिन इस तरह दोनों तरह की संस्कृतियों का गहरा प्रभाव कौल परिवार पर पड़ने लगा था।
लक्ष्मीनारायण के बेटे गंगाधर नेहरु के बारे में नेहरू परिवार दावा करता है कि वह मुगल राज में दिल्ली शहर के कोतवाल थे। 1857 में जब प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों ने मेरठ से आकर दिल्ली पर धावा बोला तो गंगाधर जान बचाकर अपने परिवार के साथ भाग निकले और आगरा में शरण ली। अगले साल गंगाधर की मौत हो गई। हालांकि कई लोगों ने दावा किया है कि उस साल दिल्ली का कोतवाल गंगाधर नहीं बल्कि कोई गयासुद्दीन गाजी था।
बहरहाल, गंगाधर नेहरु के बेटे मोतीलाल के पहले शिक्षक बने काजी सदरुद्दीन। जिंदगी के शुरूआती 12 साल उन्हें हिंदी या अंग्रेजी से कोई लेना देना नहीं था, संस्कृत से तो बिलकुल नहीं। केवल फारसी या अरबी भाषाएं ही सीखते रहे। जाहिर है काजी की शिक्षाओं और सीख का शुरूआती असर पूरी जिंदगी पर छाया रहा। हालांकि नेहरूजी ने लिखा है कि जब मोतीलाल मरने को हुए तो अंतिम दिनों में वो गायत्री मंत्र का जाप करने लगे थे। हालांकि अंग्रेजियत का आलम ये था कि मोतीलाल के घर में अंग्रेजी बोलना तक अनिवार्य कर दिया गया था। बेटे जवाहर के लिए शुरू से ही अंग्रेजी शिक्षक घर पर पढ़ाने आता रहा।
प्रयागराज में संगम तट पर लगने वाले माघ मेले को लेकर मोतीलाल नेहरू ने लंदन में पढ़ रहे जवाहर को लिखा था कि, "मुझे यह देखकर दुख होता है कि मेरे देश के लोग ऐसे मूर्खतापूर्ण कामों में व्यस्त रहते हैं।" इंदिरा गांधी की जीवनीकार पुपुल जयकर ने लिखा है कि मोतीलाल नेहरु आखिरी समय तक नास्तिक रहे और पुजारियों और मंत्रोच्चार से घिन करते थे।" इसी का असर जवाहर लाल नेहरू पर भी खूब पड़ा था।
आम भारतीयों में गांधीजी की लोकप्रियता बढ़ती देख मोतीलाल ने अचानक अंग्रेजियत कम कर सादगी अपना ली, खादी पहनना शुरू कर दिया, जबकि एक दौर था, उनके सूट लंदन का वो टेलर सिलता था, जिसके यहां अंग्रेजों में भी रईस लोगों के सूट्स सिलते थे। हालांकि हिंदू धर्म से नफरत करने वाले तथा ईसाइयों और मुस्लिमों के पक्षधर रहे मोतीलाल को अपनी बेटी स्वरूपरानी के अपने अखबार के मुस्लिम सम्पादक के अफेयर से समस्या हो गई, जिसके चलते उन्हें गांधीजी से कहकर उसे विदेश भिजवाना पड़ा। बेटी का नाम बदलना पड़ा।
उसके बाद जवाहरलाल नेहरू ने भी अली भाइयों से कई मामलों में खिलाफत आंदोलन के दौरान और बाद में भी थोड़ी असहमति जताई, लेकिन अंदर से वो भी नास्तिक जैसे ही थे। सोमनाथ मंदिर प्रकरण पर जिस तरह उन्होंने राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के जाने पर कैबिनेट से रोक लगाने की बात की, कश्मीर और हैदराबाद में ढुलमुल रवैया अपनाया, मुस्लिमों को अलग मोहल्ले ना देने की सरदार पटेल की बात नहीं मानी, संघ के खिलाफ अरसे तक मोर्चा खोले रखा, यहां तक कि लालकिले से कभी भी भाइयों, बहनों जैसे सम्बोधनों के बजाय हमारी कौम के लोगों जैसे शब्दों का ही इस्तेमाल किया, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर हुए समझौते का पालन नहीं करवाया, उसके चलते वो हमेशा हिंदूवादी शक्तियों के निशाने पर रहे।
इंदिरा गांधी ने भले ही धार्मिक मामलों में पिता से उलट रवैया अपनाया, लेकिन साधुओं पर गोली चलवाना, हज सब्सिडी और वक्फ बोर्ड जैसे फैसलों से दूरगामी सनातन विरोधी फैसले लिए। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी जीवनी में तो यह भी लिखा है कि इंदिरा गांधी जब अफगानिस्तान के दौरे पर गयी थीं तब बाबर की कब्र पर जाने के लिए बेचैन थीं।
इसी तरह राजीव गांधी ने एक विदेशी क्रिश्चियन महिला सोनिया माइनों से शादी ही नहीं की बल्कि शाहबानो प्रकरण में अपनी फजीहत भी करवाई। सुूब्रमण्यम स्वामी तो लंबे समय तक आरोप लगाते ही रहे हैं कि सोनिया गांधी ने अपने दोनों बच्चों राहुल और प्रियंका को क्रिश्चियन ही बनाया है। कांग्रेस में भी सोनिया के करीबी और विश्वस्त नेताओं में ईसाई और मुस्लिम नेता ही रहे हैं। अति तो हो गई सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के दौर में। ना केवल मुस्लिमों का संसाधनों पर पहले अधिकार की बात की गई बल्कि मुस्लिम आरक्षण का खेल भी चुपके से शुरू हो गया।
कहीं ना कहीं कांग्रेस को टीएमसी, सपा, एनसीपी जैसी पार्टियों के चलते खिसकते मुस्लिम वोट बैंक का डर था। लेकिन सनातन हिन्दू धर्म को मिलने वाली गालियों पर कोई बड़ा एक्शन ना लेना, जय श्री राम सुनकर भड़क जाना और अब डॉगीज तक में नूरी, Yassa और जैक रसेल टैरियर जैसी ब्रीड का जब धार्मिक कनेक्शन सामने आ रहा है तो लगता है कि मुद्दा केवल मुस्लिम या ईसाई वोट बैंक का नहीं बल्कि सोच का भी है। नेहरु वंश अपने आपको इस्लामिक और ईसाई पहचान में सहज पाता है इसलिए जाने अनजाने उसी पहचान के करीब जाने की कोशिश करता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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