Congress and OBC: पेरियार की विचारधारा पर चलेगी कांग्रेस?
16 सितंबर को हैदराबाद में हुई कांग्रेस कार्यसमिति ने सनातन के मुद्दे पर बयानबाजी से बचने का फैसला किया था। इसी बैठक में जाति आधारित जनगनणा की मांग भी रखी गई। वैसे यूपीए शासनकाल में कांग्रेस सरकार ने जाति आधारित जनगणना करवाई थी, लेकिन समाज में वैमनस्य पैदा न हो इसलिए आंकड़े जगजाहिर नहीं किए गए थे।
अब राहुल गांधी ने लोकसभा में जाति आधारित जनगणना की मांग करते हुए कहा है कि कांग्रेस सरकार की ओर से करवाई गई जाति आधारित आंकड़ों को जगजाहिर किया जाए। इसके साथ ही उन्होंने धमकी भी दी कि अगर मोदी सरकार ने ऐसा नहीं किया, तो वह खुद आंकड़े जगजाहिर कर देंगे।

इसका मतलब साफ़ है कि वे सरकारी दस्तावेज उनके पास हैं, जो सरकारी कार्यालय से चोरी किए गए हैं। यूपीए सरकार ने वे आंकड़े अपने शासनकाल में इसलिए जारी नहीं किए थे, क्योंकि उन्हें समाज में वैमनस्य पैदा होने का डर था। लेकिन अब राहुल गांधी उन आंकड़ों को इसलिए जारी करना चाहते हैं, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए वे हिन्दुओं में जाति आधारित वैमनस्य पैदा करना चाहते हैं।
इंडी एलायंस की मुम्बई बैठक में जाति आधारित जनगणना पर गहरे मतभेद थे। यह मांग राष्ट्रीय जनता दल, जेडीयू और समाजवादी पार्टी ने की थी। इन्हीं दलों के दबाव में तत्कालीन यूपीए सरकार ने जाति आधारित जनगणना करवाई थी। यह जाति आधारित राजनीति 1990 से चल रही थी, जब वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करके ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दे दिया था। हिन्दू समाज में अगड़ों और पिछड़ों में जबर्दस्त वैमनस्य की स्थिति पैदा हो गई थी, जो लगभग 25 साल तक चली।

2014 में सनातन धर्म की विभिन्न जातियां अपने मतभेद भुला कर हिंदुत्व के झंडे तले एकजुट हो गईं, तब से भाजपा दो बार स्पष्ट बहुमत से चुनाव जीत चुकी है। इसलिए कांग्रेस को अब लगता है कि जाति आधारित राजनीति बहुत जरूरी है। कांग्रेस के इतिहास में शायद यह पहला मौक़ा है, जब कांग्रेस ने खुलेआम दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों को अगड़ों के खिलाफ भड़का कर चुनावी राजनीति करने का फैसला किया है। वरना कांग्रेस का इतिहास ऊंची जातियों खासकर ब्राह्मण नेतृत्व का ही रहा है। 1925 में तमिलनाडू के रामास्वामी पेरियार ने कांग्रेस को ब्राह्मणवादी पार्टी कहते हुए ही कांग्रेस छोड़ी थी। पेरियार सनातन धर्म का भी इसलिए विरोध करते थे, क्योंकि सनातन धर्म में जाति आधारित भेदभाव और छूआछूत थी।
वैसे सनातन कोई संप्रदाय नहीं है, सनातन का अर्थ है, जो सत्य है, जिसका न आदि है, न अंत है, जो सत्य है, वही सनातन है। सनातन एक जीवन पद्धति है, जो हजारों सालों से इस धरती पर रहने वाले लोगों का धर्म था। समय के साथ सनातन को संप्रदाय के रूप में लिया जाने लगा। तुर्क और ईरानी सिन्धु घाटी पार करके भारत आए, तो उन्होंने भारत के लोगों को हिंदू कहना शुरू किया। धीरे धीरे सनातन से ज्यादा हिन्दू प्रचलित हो गया। फिर हिन्दुओं में जातिवाद शुरू हुआ, फिर छुआछूत शुरू हो गया।
हिन्दुओं में आई इन बुराईयों के खिलाफ कई सुधारवादी आन्दोलन भी चले। अनेक समाज सुधारक हुए, जिन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह और छूआछूत के खिलाफ आन्दोलन चलाए। हिन्दुओं ने अपनी बुराईयों को दूर करने के लिए बनाए गए कानूनों को स्वीकार किया। लेकिन पेरियार का जातिवाद के खिलाफ शुरू हुआ आन्दोलन धीरे धीरे हिन्दू विरोधी और हिन्दी विरोधी बन गया। उनका कहना था कि उत्तर भारत के ब्राह्मणों ने दक्षिण में आकर जातिवाद फैलाया, वरना द्रविड़ संस्कृति में जातिवाद नहीं था।
कांग्रेस छोड़ने के बाद पेरियार ने स्वाभिमान आन्दोलन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य ब्राह्मणवादी सत्ता को समाप्त करके जाति, धर्म और भगवान से रहित एक तर्क आधारित समाज का निर्माण करना था। उनका कहना था कि द्रविड़ सनातनी नहीं हैं, द्रविड़ों की अपनी संस्कृति और भाषा है। बाद में उन्होंने जस्टिस पार्टी के साथ मिलकर आन्दोलन को आगे बढ़ाया।
जस्टिस पार्टी का जन्म भी 1915-16 में ऊंची जातियों के खिलाफ हुआ था। जस्टिस पार्टी में मद्रास, आंध्र और केरल की मझौली जातियां थीं, जो अंग्रेजों की ओर से ब्राह्मणों को ज्यादा अहमियत दिए जाने के खिलाफ थीं। सनातन विरोध के मूल में अंगरेजी शासनकाल में ब्राह्मणों को मिली तव्वजो और कांग्रेस में ब्राह्मणों का बोलबाला था।
आज़ादी के बाद पेरियार के करीबी सी. एन. अन्नादुरैई ने डीएमके पार्टी का गठन किया। कांग्रेस के ब्राह्मणवादी नेतृत्व के खिलाफ ही डीएमके का गठन हुआ था और वह शुरू से ही हिन्दुओं और हिन्दी के खिलाफ थी। इसलिए करुणानिधि के पोते और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म के खिलाफ बोल कर कुछ नई बात नहीं कही, लेकिन इस समय यह बात कहने का कोई मतलब नहीं था|
बात गंभीर तब हो गई जब डीएमके सरकार के ही एक अन्य मंत्री ने कहा कि इंडी एलायंस का गठन ही सनातन विरोध के आधार पर हुआ है। अगर यह सही नहीं था तो गठबंधन की तरफ से खंडन किया जाना चाहिए था। लेकिन सिर्फ ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे ने ही सनातन पर आए बयान का विरोध किया। कांग्रेस ने अपनी हैदराबाद कार्यसमिति में सनातन के मुद्दे पर स्पष्ट स्टैंड लेने की बजाए, इस मुद्दे से बचने की बात कही।
दूसरी बात यह हुई कि कांग्रेस ने जाति आधारित जनगणना की मांग उठा दी है। लोकसभा में महिला आरक्षण के मुद्दे पर आए बिल के समर्थन में बोलते हुए राहुल गांधी ने बहुत ही उत्तेजित होकर जातीय जनगणना की मांग रख दी। यह मांग इसलिए रखी गई है, ताकि दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में ही आरक्षण दिया जाए।
यह वही कांग्रेस है, जिसने पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सिफारिश करने वाली मंडल आयोग की सिफारिशें दस साल तक दबाए रखी थीं। अन्य पिछड़ी जातियों के शैक्षणिक और आर्थित्क स्थिति का आकलन करने के लिए मंडल आयोग का गठन 1979 में जनता सरकार ने किया था। मंडल आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों ने दस साल तक दबाए रखी थीं। जब दूसरी बार 1989 में गैर कांग्रेसी सरकार बनी तब जाकर 1990 में आरक्षण की सिफारिशे लागू हुईं|
अब जाति आधारित जनगणना की मांग करके कांग्रेस ओबीसी का मसीहा बनने की कोशिश कर रही है। यह जाति आधारित जनगणना की मांग उनके खिलाफ है, जिन्हें योग्यता के आधार पर नौकरियां मिलती हैं। कांग्रेस के इस नए आन्दोलन का मतलब योग्यता के आधार पर मिलने वाली नौकरियों को कम करना है। पेरियार के संगठन और जस्टिस पार्टी का आन्दोलन भी ब्राह्मणों और ठाकुरों के खिलाफ था, जिन्हें शिक्षित होने के कारण ब्रिटिश राज में ज्यादा नौकरियां मिल रहीं थीं।
पेरियार सामाजिक न्याय की बात करते थे, लेकिन उनकी विचारधारा नफरत और वैमनस्य की विचारधारा थी। सामाजिक न्याय के लिए संविधान में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति को साढ़े सात प्रतिशत आरक्षण है, जबकि ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण है। अगर जाति आधारित जनगणना करके ओबीसी और अन्य जातियों का आरक्षण कोटा बढ़ाया जाता है, और सुप्रीमकोर्ट उसे इजाजत दे देता है, तो योग्यता के आधार पर मिल रही 40 प्रतिशत नौकरियां घट जाएंगी।
फिलहाल सुप्रीमकोर्ट ने 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण पर रोक लगाई हुई है, इसलिए इन जातियों को इससे ज्यादा आरक्षण नहीं मिल सकता। मोदी सरकार ने आर्थिक स्थिति के आधार पर सवर्ण जातियों के कम आय वर्ग को दस प्रतिशत आरक्षण का क़ानून पास किया है, जिसे सुप्रीमकोर्ट की सहमति मिल चुकी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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