Opposition Parties: इंडी एलायंस के घटक दल एक दूसरे की जड़ों में मठ्ठा डाल रहे

Opposition Parties: उत्तर मध्य भारत के तीन राज्यों में हार के बाद कांग्रेस के भीतर बहुत बड़ी उथल पुथल शुरू हो चुकी है| राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से बनी हवा के बूते वह लोकसभा चुनावों की नैया पार करने के मंसूबे बना रही थी| उन मंसूबों पर पानी फिर गया है| हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और लद्दाख हिल काउन्सिल में जीत ने कांग्रेस में ऊर्जा का संचार किया था| उसे लगा था कि इन तीन प्रदेशों में मिली सफलता के कारण विपक्षी दल उसके साथ आने को मजबूर हुए हैं|

नीतीश कुमार की कई महीनों से चल रही कोशिशों के बावजूद कांग्रेस ने कर्नाटक के चुनाव नतीजों तक विपक्षी एकता को हरी झंडी नहीं दी थी| कांग्रेस इस रणनीति पर काम कर रही थी कि कर्नाटक जीत लिया, तो भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दल उसके साथ आने पर मजबूर होंगे| कर्नाटक में जीतने के बाद कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के शपथग्रहण में यूपीए के घटक दलों को ही न्योता देकर बाकी क्षेत्रीय दलों को एक संदेश दिया था, संदेश यह था कि नया गठबंधन उसी की रहनुमाई में ही होगा, नीतीश, लालू या ममता की रहनुमाई में नहीं|

concern for Opposition Parties India Alliance after defeat in three states

कांग्रेस के दिमाग में इंडी एलायंस की अवधारणा यूपीए का विस्तृत रूप ही है| इसलिए उसने पटना, बेंगलुरु और मुम्बई की बैठकों में एलायंस के चेयरमेन या कन्वीनर के मुद्दे पर बात ही नहीं होने दी| यह क्षेत्रीय दलों को भी पता है कि कांग्रेस उन्हें अपने हित में इस्तेमाल करना चाहती है| हालांकि सच्चाई यह है कि इंडी एलायंस में शामिल हुए सभी दलों का मकसद एक दूसरे के वोट बैंक का फायदा उठाना ही है|

अखिलेश यादव को लगता है कि मुस्लिम वोट बैंक नहीं बंटेगा, तो सपा को 20-25 सीटों पर कांग्रेस के वोट बैंक का फायदा मिल जाएगा| अरविन्द केजरीवाल को लगता है कि कांग्रेस आप को पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में आधी सीटें दे देगी तो वह इन तीनों राज्यों से ही 8-10 जीत लेंगे|

Opposition Parties

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय आधार की पोल खोल दी है। पाँचों राज्यों में उसके सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई, इसलिए केजरीवाल को इन तीनों राज्यों से ही उम्मीद बची है, और वह कांग्रेस के समर्थन के बिना पूरी नहीं हो सकती| इसी तरह नीतीश कुमार और लालू यादव को लगता है कि बिहार की तीन चौथाई सीटों पर उन्हें ही कांग्रेस के वोट बैंक का लाभ मिलेगा| फारूख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को लगता है कि कांग्रेस साथ रहेगी तो जम्मू क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को हराया जा सकेगा|

कांग्रेस ऐसा मानकर चल रही थी कि लद्दाख, हिमाचल और कर्नाटक की हवा राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी बहेगी तो इंडी एलायंस के नेतृत्व पर सवाल ही खड़ा नहीं होगा| तीनों राज्यों के चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस सोनिया गांधी को चेयरपर्सन और मल्लिकार्जुन खड़गे को एलायंस का कन्वीनर बनाने की रणनीति पर चल रही थी|

कांग्रेस सौ प्रतिशत आश्वस्त थी कि कांग्रेस तीनों राज्यों में जीतेगी, उस जीत का श्रेय गठबंधन को न मिल जाए, इसलिए कांग्रेस ने इंडी एलायंस की न तो कोई साझा रैली की और न ही किसी दल के साथ चुनावी गठबंधन किया| कमलनाथ ने तो भाजपा के हिन्दू वोट बैंक में सेंध मारने के लिए भारत को हिन्दू राष्ट्र तक कह डाला| अपनी जीत को मजबूत बनाने के लिए राहुल गांधी ने तीनों राज्यों में जातीय जनगणना को बड़ा मुद्दा बनाया|

कांग्रेस ने जैसे क्षेत्रीय दलों को कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों तक इन्तजार करवाया था, वैसे सीटों के बंटवारे के लिए भी पांच राज्यों के नतीजों का इंतजार करवा रही थी| राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यू और समाजवादी पार्टी को भी इस बात का एहसास था कि अगर कांग्रेस तीनों या दो हिन्दी भाषी क्षेत्रों में जीत गई, तो वह यूपी बिहार में उन्हें खा जाएगी| विधानसभा चुनावों से पहले राहुल गांधी ने जाति आधारित जनगणना का कार्ड इसी रणनीति के साथ खेलना शुरू किया था|

जाति आधारित जनगणना के सहारे कांग्रेस की रणनीति हिन्दी भाषी क्षेत्रों में दलितों और पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ आकर्षित करना है, जो इस समय या तो भाजपा के साथ जुड़े हैं, या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के साथ और उतर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े हैं| इसका मतलब साफ़ है कि कांग्रेस सिर्फ भाजपा के वोट बैंक पर ही निशाना नहीं साध रही थी, बल्कि सपा, बसपा, राजद और जदयू के वोट बैंक पर भी निशाना साध रही थी|

इससे पहले कर्नाटक में भी कांग्रेस ने जेडीएस के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध मार कर उसे नुक्सान पहुंचाया था| इसलिए हिन्दी भाषी राज्यों के इन चारों दलों के लिए अपने अस्तित्व को बचाना उसी तरह जरूरी हो गया है, जैसे कर्नाटक में जेडीएस ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए भाजपा से गठबंधन करने का फैसला किया है|

तो क्या राजद, जदयू, सपा ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में कांग्रेस को हराने में भूमिका निभाई| सपा, आम आदमी पार्टी और जदयू ने अपने उम्मीदवार खड़े करके भले ही ज्यादा भूमिका नहीं निभाई, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल के चन्द्रशेखर यादव और सपा के स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने सनातन विरोधी बयानों से कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने का काम जरुर किया| कांग्रेस ने तीनों राज्यों के मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए सनातन विरोध पर चुप्पी साध कर हिन्दू वोट बैंक को भाजपा के पीछे खड़े होने को मजबूर कर दिया|

कांग्रेस शायद अभी भी समझ नहीं पा रही कि वह अपने मुस्लिम तुष्टिकरण के एजेंडे पर चल कर भाजपा के हिन्दू वोट बैंक को ही मजबूत करती है| इन तीन राज्यों के चुनावों में कांग्रेस के ही दो सहयोगी दलों समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने उसके साथ खेल कर दिया| कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आचार्य प्रमोद का यह बयान हवा में उड़ाने वाला नहीं है कि कांग्रेस की हार का कारण सनातन विरोध पर उसकी चुप्पी है|

सनातन विरोध से सपा, जदयू और राजद को भी कोई लाभ नहीं होने वाला, लेकिन राजद और सपा ने ठीक चुनाव के समय सनातन विरोध का मुद्दा उठाकर कांग्रेस को उसकी हैसियत दिखाने का काम कर दिया| इसलिए यह मानना कोरी कल्पना है कि इंडी एलायंस भाजपा को हराने के लिए एकजुट हो कर चुनाव लड़ेंगे, बल्कि इंडी एलायंस के दल एक दूसरे की जड़ें काटने का काम कर रहे हैं|

तीनों ही राज्यों में इंडी एलायंस के घटक दलों ने भले ही वोट बैंक की दृष्टि से कांग्रेस को ज्यादा नुक्सान नहीं पहुंचाया, लेकिन कांग्रेस की हवा खराब करने का काम जरुर किया, जिसका अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा को हुआ| वोट बैंक की दृष्टि से कांग्रेस को तीनों ही राज्यों में बसपा ने ज्यादा नुक्सान पहुंचाया|

मध्यप्रदेश में बसपा, सपा और आप का वोट 2.57 प्रतिशत घट गया, तीनों को एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन बसपा को 3.40 प्रतिशत वोट मिला है| सपा और आप को भी एक प्रतिशत वोट मिला है| छत्तीसगढ़ में भी बसपा को 2.05 प्रतिशत वोट मिला है, राजस्थान में बसपा को 1.80 प्रतिशत और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को 2.4 प्रतिशत वोट मिला है| राजस्थान में कांग्रेस अगर बसपा और रालोप से चुनावी गठबंधन कर लेती, तो वह सत्ता बचा सकती थी|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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