Changing Weather: इस साल ठीक नहीं रहेगा मौसम का हाल
इस साल असमय वर्षा, बौछारें, वज्रपात और ओलावृष्टि की घटनाएं अधिक होंगी। यह अनेक मौसम-प्रणालियों के आपसी तालमेल का परिणाम होगा।

मानसून के पहले की मौसमी हलचलें इस साल काफी पहले शुरू हो गई हैं। शनिवार को मार्च के महीने में दूसरी बार दिल्ली एनसीआर में बारिश हुई है। दिल्ली ही नहीं देश के अधिकांश हिस्सों में असमय गर्मी बढ़ी तो असमय बारिश भी हो रही है। मार्च के शुरुआती दौर में 6 से 8 मार्च के बीच हुई वर्षा और गरज के साथ बौछारों ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के काफी बड़े हिस्से में फसलों को नुकसान पहुंचाया है।
पूर्वी मध्य प्रदेश, तेलंगाना और उससे सटे उत्तरी आंध्र प्रदेश में दोहरे चक्रवाती तूफानों के क्षेत्र बनने की संभावना है। अरब सागर के साथ साथ बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी की वजह से दोनों प्रणालियों के बीच एक गर्त बनने का अनुमान है। उसी समय एक सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ पश्चिमी हिमालय से होकर गुजरेगा।
इन तमाम प्रणालियों के तालमेल से मार्च में देश के मध्य, पूर्वी और दक्षिणी इलाके में व्यापक मौसमी हलचलें हो रही हैं। हालांकि उत्तर के मैदानी इलाके खतरनाक हलचलों से बचे रहेंगे। लेकिन दक्षिण मध्य प्रदेश, विदर्भ, मराठवाड़ा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश तथा उत्तरी कर्नाटक में बिजली गिरने और आंधी के साथ बारिश का कहर दिख सकता है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में तेज हवाओं के साथ ओलावृष्टि की संभावना है।
इस साल जाड़े के मौसम में भी औसत तापमान सामान्य से अधिक रहा। 1901 के बाद इसी वर्ष दिसंबर और फरवरी में सबसे ज्यादा तापमान रहा। फरवरी में तो देश के कई हिस्सों में लू चलने जैसे हालात बन गए। कई शोध-अध्ययन इसे वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी से जोड़ रहे हैं। तापमान बढ़ने का सीधा संबंध अनेक मौसम प्रणालियों में परिवर्तन से है। इसमें मौसमी घटनाओं की आवृति और तीव्रता में बढ़ोतरी, समुद्रतटीय क्षेत्र में लू की लहर, अत्यधिक वर्षा और कुछ क्षेत्रों में सूखा जिसका असर कृषि और संपूर्ण पारिस्थितिकी पर हानिकारक होगा।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ते तापमान के चलते मौसमी हवाओं के बहाव में बढ़ोतरी होती है जिसके चलते मानसून के पहले वर्षा की परिस्थिति तैयार होती है। "भारतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का आंकलन" शीर्षक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मानसून के पहले लू की लहर की आवृत्ति, अवधि, तीव्रता और विस्तार इक्कीसवीं सदी के दौरान काफी बढ़ने का अनुमान है। मानसून के पहले के अधिकतम तापमान का रुझान मानसून बाद की स्थिति का संकेत देता है। आर्द्रता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी धरती की सतह के तापमान में बढ़ोतरी को प्रकट करता है। पिछले अध्ययनों में भी भारतीय क्षेत्र के ऊपर वातावरण में नमी में बढ़ोतरी होने की जानकारी दी गई थी। इस नमी का मतलब जलवाष्प की बड़ी मात्रा में मौजूदगी का पता चलता है। बढ़े हुए तापमान में जलवाष्प के संयोग से जलवायु में सकारात्मक प्रतिक्रिया हो सकती है। जलवाष्प का प्राकृतिक ग्रीनहाउस प्रभाव में सबसे महत्वपूर्ण योगदान होता है।
आमतौर पर मानसून के पहले की मौसमी गतिविधियां मार्च के दूसरे सप्ताह में शुरु होती हैं। इसके अलावा, उस मौसम में वर्षा सुबह जल्दी या दोपहर बाद तक ही सीमित होती है। वर्षा का लंबा दौर दुर्लभ होता है। असामान्य तापमान की वजह से देश के कई हिस्सों में इस साल अनेक मौसम प्रणालियों को सक्रिय देखा जा रहा है। पहले से ही एक ट्रफ लाइन है जो मध्य भाग से गुजर रही है। यह एक पश्चिमी विक्षोभ के आने पर इस क्षेत्र को प्रभावित करना शुरु कर देगा।
वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी से जलवायु पर किस तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं, इसके संकेत मिलने लगे हैं। मौसम विज्ञान और जलवायु परिवर्तन पर कार्यरत संस्था (स्काईमेट वेदर) के उपाध्यक्ष महेश पालावत का कहना है कि निरंतर अंतराल पर गर्मी के झोंके आ सकते हैं। इससे कई तरह की मौसमी हलचलें दिख सकती हैं। हाल ही के एक अन्य अध्ययन के अनुसार मानसून के पहले के दिनों में वर्षा वाहक प्रणालियां धीरे-धीरे सक्रिय होती हैं। इन प्रणालियों में मेसोस्केल कन्वेक्टिव सिस्टम व ट्रापिकल साइक्लोन प्रमुख है। बारिश की घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति में वृध्दि मुख्य रूप से समूचे एशिया में होने वाली है।
वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों में मानवजनित बढ़ोतरी, खासकर कार्बन डायअक्साइड का दोगुना हो जाना वैश्विक तापमान में औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाने से जुड़ा हुआ है। ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी से मानसून के पहले दिन और रात में बेतहाशा गर्मी तथा उमस की वजह से असहनीय स्थिति बन जाती है। इस मौसम में (मानसून के पहले) बादल ऊपर की तरफ फैलते हैं और ज्यादातर दोपहर बाद तथा शाम के शुरुआती घंटों में नीचे आते हैं। इसकी वजह से तापमान में बढ़ोतरी, निचले स्तर में नमी जैसी हालत उत्पन्न होती है जिससे बेहद ऊंचाई तक बादलों को निर्माण होता है। वर्षा के साथ कभी-कभी तेज रफ्तार से हवा चलती है जिसके साथ धूल भरी आंधी भी आती है।
जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी की वजह से भारी वर्षा, तूफान और लू की लहरों के साथ चरम मौसमी घटनाओं जैसे वज्रपात की आवृत्ति, अवधि और तीव्रता पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है। वैश्विक गर्मी की वजह से वाष्पीकरण में बढ़ोतरी हो सकती है जिससे हवा में उमस और भारी वर्षा हो सकती है। इसके अलावा नमी और बढ़ी हुई ऊर्जा की वजह से तूफान और ओला गिरने की घटनाएं हो सकती हैं। इससे फसलों को नुकसान हो सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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