Caste Census Bihar: जाति जनगणना करवाएंगे, मगर गिनती नहीं बताएंगे
बिहार में जाति जनगणना चर्चा में है। पहले चरण की जनगणना का काम पूरा हो चुका है और हर जाति को एक कोडनेम जारी कर दिया गया है। पर सवाल यह है कि क्या जनगणना के बाद आंकड़ों को सरकार सार्वजनिक करेगी?

Caste Census Bihar: बिहार के लिए जाति एक विकट प्रश्न है। इसे सीधे समाजशास्त्रियों वाले अध्ययन के तौर पर परिभाषित करने के बदले लोकोक्तियों से उधार लें, तो जाति के बारे में कहा जाता है कि जो कभी नहीं जाती, उसे जाति कहते हैं। बिहार में जाति जनगणना की मांग अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों ने की, हालांकि उससे लाभ क्या होगा, इस विषय पर सत्ताधारी और विपक्षी दोनों ही मौन साध लेते हैं। सड़कों-चौराहों पर होने वाली चर्चाओं की मानें तो कहा जा रहा है कि इस बार भी जब जातीय जनगणना पूरी होगी, तो आम लोगों को जातियों की गिनती नहीं बताई जाएगी। जनता के टैक्स के पैसे से हुई इस जनगणना का अज्ञात लाभ लेने का विशेषाधिकार केवल नेताजी को ही मिलेगा।
वैसे इन दावों में कितनी सच्चाई है, ये तो वर्ष के अंत तक पता चल पायेगा, फ़िलहाल जमीन पर यह दिख रहा है कि पहले चरण में केवल परिवार के मुखिया का नाम और सदस्यों की गिनती पूछी गयी और अब कुछ रोज़ पहले सरकार बहादुर ने हर जाति के लिए एक कोड जारी किया है।
इससे पहले कि जनगणनाओं की बात की जाए उससे पहले हम लोगों को सीधे सौ वर्ष से भी पीछे जाना होगा। जब 1911 में बिहार की जनगणना हुई तो जातियों की संख्या थी 205। इस बार जातियों की संख्या 216 हो गई है। ये जातियां बढ़ कैसे गयीं, ये समाजशास्त्रियों के लिए एक अलग अध्ययन का विषय हो सकता है। अगर वापस 1911 वाली जनगणना की बात करें तो "पीपल ऑफ इंडिया प्रोजेक्ट" के अनुसार जातियों की संख्या 261 होनी चाहिए, जिसमें से 194 हिन्दू जातियां हैं। ये हिन्दू जातियां और बाकि की जातियां जैसे ही बतायी जाती हैं, तो समाज अपने आप ही एक नए सवाल पर पहुंच जाता है।
कथित तौर पर तो अब्राहमिक मजहबों में जाति-भेद है ही नहीं। कथित तौर पर तो समाजशास्त्रियों ने इसी जाति भेद को हिन्दुओं में धर्मपरिवर्तन करने और ईसाई-मुहम्मडेन आदि बनने का कारण बता रखा है। लेकिन यहां हमें पता चलता है कि बिहार में मुहम्मडेन आबादी का करीब 56 फीसदी ओबीसी यानि अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है। जो सरकारी आरक्षण के लाभ और जाति प्रमाणपत्र आदि हैं, वो भी उन्हें मिलते हैं। जब बिहार सरकार ने एक अति पिछड़ा वर्ग का सृजन किया था, ताकि विकास में पीछे छूट गयी जातियों को साथ लिया जा सके, तो उसमें मुसलमानों की हलालखोर और लालबेगी जातियां भी शामिल की गयी थीं।
बिहार का विभाजन काफी बाद की घटना है इसलिए जब हम लोग 1911 की जनगणना को देखते हैं, तो पाते हैं कि उस समय उत्तर बिहार में आबादी का 83 प्रतिशत और दक्षिण बिहार में 91 प्रतिशत हिन्दुओं का था। ईसाई और अन्य मतावलंबियों की गिनती मात्र 0.25 फीसदी थी इसलिए बाकी की आबादी मुहम्मडेन थी ऐसा कहा जा सकता है। अब बिहार का कई बार विभाजन हो चुका है और झारखण्ड भी अलग राज्य है, इसलिए ये जनसंख्या बदल चुकी है। जातीय जनगणना में जो जातियां नहीं दिख रही, उसका एक कारण ये भी था कि जिन जातियों की आबादी जिले में 50,000 से कम थी, और जिन जनजातियों की आबादी जिले में 25000 से कम थी, उन्हें छोड़ दिया गया था।
इस सारे जोड़ घटाव के बाद बिहार में केवल सत्रह महत्वपूर्ण जातियां और जनजातियाँ बचती थीं। जनजातियाँ मुख्यतः छोटानागपुर इलाके में केन्द्रित थीं, इसलिए अब के बिहार की तुलना उस दौर के बिहार से करेंगे तो सिर्फ तेरह की ही तुलना होगी।
इसके बाद जब 1931 में जनगणना हुई तब हमें थोड़ी और स्पष्ट तस्वीर दिखती है। इस समय बिहार में ग्वाला (करीब 34.5 लाख), ब्राह्मण (करीब 21 लाख), संथाल (करीब 17 लाख), कुर्मी (करीब 14.5 लाख), राजपूत (करीब 14 लाख), कोइरी (करीब 13 लाख), चमार (करीब 13 लाख), दुसाध (करीब 13 लाख), तेली (करीब 12 लाख), जुलाहा (करीब 10 लाख), बाभन (करीब 10 लाख), मुसहर (करीब 7 लाख), उरांव (करीब 6.4 लाख), भुइंया (करीब 6.2 लाख), मुण्डा (करीब 5.5 लाख), और हो (करीब 5.2 लाख) थे।
इस विवरण में ब्राह्मणों और बाभनों की जो दो अलग-अलग संख्याएं दिखती हैं, उसका कारण ये है कि ब्राह्मणों और भूमिहारों (बाभनों) को अलग-अलग जाति माना गया। बाभन बिहार की एकमात्र ऐसी जाति थी जिनकी जनसंख्या 1921-31 के बीच 8.5 प्रतिशत घट गयी। श्रीकांत की पुस्तक के अनुसार दरभंगा जिले में एक लाख से भी अधिक (यानि हर तीन में से एक) बाभनों ने अपना नाम ब्राह्मणों के रूप में दर्ज करवा लिया। 1901 में पटना, गया, शाहाबाद, सारण, चंपारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मुंगेर और भागलपुर जिलों में बाभनों की आबादी जो 10,99,010 थी वो 1931 में घटकर 8,51,343 रह गयी। ये सबसे अधिक दरभंगा में ही दिखा था। दरभंगा में 1931 में ब्राह्मणों की संख्या में, 62.34 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि हुई। इस दौर में जिले की कुल आबादी केवल 8.7 प्रतिशत बढ़ी थी।
ग्वाला मुख्यतः दरभंगा (करीब 4 लाख) और भागलपुर प्रमंडल के सहरसा-मधेपुरा में केन्द्रित थे। कुल 31 दलित जातियों की आबादी 65 लाख के लगभग होती और उसमें से चार जातियों (दुसाध, चमार, मुसहर और भुइंया) की आबादी ही करीब 39-40 लाख थी। दलित जातियां गया, पलामू और मानभूम जिलों में आबादी का 20 फीसदी से अधिक थीं। पटना, शाहाबाद, चंपारण, मुजफ्फरपुर और मुंगेर जिलों में भी उनकी आबादी 15-20 फीसदी की थी। मुहम्मडेन आबादी में जुलाहे करीब 25 फीसदी थे।
प्रादेशिक स्तर पर आज की स्थिति देखें तो कमोबेश यही जातियां महत्वपूर्ण हैं। राजनीति और सत्ता भी इनके ही बीच घूमती दिखाई देगी। शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में कायस्थों की महत्वपूर्ण भूमिका रही क्योंकि शहरों में उनकी आबादी थी और वो करीब पूरे बिहार में फैले थे। सरकारी नौकरियों, वकालत और राजनीति में भी उनकी प्रभावशाली उपस्थिति रही।
ब्राह्मण, राजपूत, बाभन और कायस्थ जातियों का उस समय वर्चस्व था, ऐसा माना जाता है। यादव, कुर्मी और कोइरी सत्ता में पैठ के लिए संघर्षरत थे और दलित जातियों में दुसाध और चमार प्रमुख थी। मुहम्मडेन जातियों में जुलाहों ने उसी दौर में सैय्यद, पठान, शेख इत्यादि के वर्चस्व को चुनौती देनी शुरू की थी। बिहार में आज उसकी परिणीति पसमांदा आन्दोलन के रूप में देखने को मिलती है।
अब जब कोड बांटकर नयी जनगणना शुरू हो गयी है तो सवाल ये है कि इसके परिणाम किस रूप में सामने आयेंगे? इसके लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट वाले दौर को याद किया जा सकता है। बिहार के ही सहरसा जिले के सबसे बड़े जमींदार परिवारों में से एक से आने वाले मंडल ने जो रिपोर्ट 1980 के दौर में दी, उसके आधार पर पिछड़े वर्गों को आरक्षण मिला। इन अरक्षित वर्गों में मंडल, यादव भी शामिल थे। ये रिपोर्ट पचास वर्ष पुराने आंकड़ों के आधार पर बनाकर देश पर थोपी गयी। इसका जो व्यापक राजनैतिक परिणाम हुआ, उसने वी.पी.सिंह सहित कई समाजवादियों का राजनैतिक भविष्य लील लिया।
फ़िलहाल जो अरक्षित सीटों के नियम लागू हैं, उनमें बदलावों की आवश्यकता हो सकती है। अगर बिहार सरकार ने जातीय जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक किये, तो निःसंदेह ये मांग भी उठेगी। बहरहाल बिहार जातिवाद की राजनीति को करवट लेते देख रहा है, और प्रतीक्षा में है। लोकसभा और विधानसभा दोनों के चुनाव नजदीक हैं और ये जनगणना कोई नया राजनीतिक समीकरण बनाये या न बनाये लेकिन कई समीकरण बिगाड़ जरूर देगी। इसीलिए इस बात की पूरी संभावना है कि आंकड़े जो भी होंगे, उन्हें नेता सार्वजनिक करने की बजाय अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करेंगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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