Pakistan: पाकिस्तान में चुनाव से पहले केयरटेकर सरकार का संकट

पाकिस्तान के सामने आईएमएफ से कर्ज की अनिश्चितता खत्म हुई नहीं कि कयास लगाया जा रहा है कि पाकिस्तान में समय पर आम चुनाव होगा कि नहीं? मौजूदा नेशनल एसेम्बली का कार्यकाल 16 अगस्त को खत्म हो रहा है। पाकिस्तान में रिवाज है कि चुनाव में जाने से पहले चुनी हुई सरकार घर चली जाती है और उसकी जगह एक केयर टेकर गवर्नमेन्ट आकर चुनाव कराती है। इसे निगरा हुकूमत कहा जाता है। अब इसी निगरा हुकूमत को लेकर नया संशय पैदा हुआ है कि क्या यह निगरा हुकूमत 60 से 90 दिन में चुनाव करा पायेगी?

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हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने कह दिया है कि वो अगस्त में कार्यभार निगरा हुकूमत को सौंप देंगे। फिर भी निगरा हुकूमत को लेकर अविश्वास इसलिए है कि यह एक आम सहमति से चुनी जानी है, और इस आम सहमति में पाकिस्तानी फौज भी शामिल है। समय पर चुनाव न होने को लेकर आशंका के पीछे सबसे बड़ा कारण है इमरान खान।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग 'नवाज', पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और फजल उर रहमान की जमात उलेमा ए इस्लाम के साथ पाकिस्तान की फौज भी इस बात पर एकमत हैं कि इमरान खान को अदालत से चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराकर या उन्हें जेल भेजकर ही चुनाव की घोषणा की जाए। अब इसमें कितना समय लगता है यह अदालत के कामकाज पर निर्भर करता है। यह लगातार देखा जा रहा है कि कई अदालतें और उसमें भी सुप्रीम कोर्ट इमरान खान पर मेहरबान हैं। चीफ जस्टिस उमर अता बांडियाल का तो इमरान को खास संरक्षण प्राप्त है। इसलिए यदि इमरान के खिलाफ कोर्ट से फैसला आने में देरी होती है तो चुनाव भी देरी से हो सकते हैं।

पाकिस्तान में केयर टेकर गवर्मेंट को लेकर गहमागहमी पहले से ही शुरू है। जून के आखिरी सप्ताह में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल-एन) के प्रमुख नवाज शरीफ और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के शीर्ष नेता और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने दुबई में एक गुप्त बैठक की थी। इस बैठक में निगरा हुकूमत के स्वरूप और अगले चुनाव की चुनौतियों पर व्यापक मंथन हुआ था। पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार उस बैठक में कम से कम अगले साल मार्च तक चुनाव टालने के विकल्प पर भी विचार किया गया और तय किया गया कि एक ऐसे कार्यवाहक प्रधानमंत्री को सत्ता सौंप दी जाए, जो दोनों दलों के हितों का ध्यान भी रखे और किसी न किसी बहाने चुनाव को टालता रहे।

कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में कोई वित्तीय मामलों का विशेषज्ञ या सेवानिवृत्त न्यायाधीश हो सकता है जिस पर राजनीतिक लाभ हानि का कोई असर ना हो। पाकिस्तान में इस तरह का प्रयोग चल रहा है और अभी तक सफल भी रहा है। पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा (केपी) की एसेम्बली पिछले जून में ही भंग कर दी गई थीं और दोनों जगह कार्यवाहक व्यवस्थाएं लागू कर दी गई थी। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार एसेम्बली भंग होने के 90 दिनों के अंदर चुनाव हो जाने चाहिए। लेकिन राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी वहां अभी तक चुनाव नहीं हुए। दोनों जगह के गर्वनर मनमाने ढंग से सरकार चला रहे हैं।

पाकिस्तान में आम चुनाव को लेकर अनिश्चितता का एक और कारण हैं तीन बार के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ। उन पर आजीवन चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा हुआ है और यह प्रतिबंध तभी हट सकता है, जब तीन चौथाई बहुमत से संविधान में संशोधन किया जाए या फिर सुप्रीम कोर्ट की कोई बड़ी बेंच सुनवाई कर अपने पहले के फैसले को बदल दे। दो तिहाई बहुमत की संभावना फिलहाल नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस मामले की सुनवाई का कोई संकेत नहीं दिया है। पीएमएल एन का मानना है कि मौजूदा चीफ जस्टिस बांदियाल के रहते हुए नवाज शरीफ को राहत नहीं मिल सकती। इसलिए जस्टिस उमर अता बांदियाल के जाने तक इंतजार करना पड़ सकता है।

जस्टिस बांदियाल 17 सितंबर 2023 को रिटायर हो रहे हैं और उनकी जगह जस्टिस फैज ईसा चीफ जस्टिस बनने वाले हैं। जस्टिस ईसा पर पीएमएल एन को पूरा विश्वास है, क्योंकि वे इमरान खान के सताए हुए हैं और जस्टिस ईसा ने ही खान पर भ्रष्टाचार का केस दायर किया है। पीएमएल एन अगला आम चुनाव नवाज शरीफ के नाम पर लड़ना चाहती है इसलिए बहुत हद तक संभव है कि अदालत से उन्हें राहत दिलाए बिना नवाज की पार्टी चुनाव के लिए ना जाए। हालांकि पीपीपी और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ के सामने कोई ऐसी मजबूरी नहीं है। लेकिन नवाज शरीफ चुनाव के लिए तैयार हैं, बशर्ते सभी कानूनी अड़चनें दूर हो जाएं और शरीफ को वापस लौटने और चुनाव लड़ने की अनुमति मिल जाए। नवाज शरीफ यह साबित करने के लिए सत्ता में लौटना चाहते हैं कि 2017 में उनका निष्कासन गलत और अवैध था।

पीएमएल एन ने सरकार छोड़ने से पहले यह माहौल बनाने की कोशिश की है कि पाकिस्तान को आर्थिक और सियासी तौर पर वही स्थिरता दे सकती है। खासकर आई एम एफ से लोन लेने के मामले में सारा श्रेय प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ को दिया जा रहा है। महीनों से अटके पड़े आईएमएफ समझौते को पूरा करने में उनके योगदान का खूब प्रचार किया जा रहा है। शाहबाज शरीफ ने ही आईएमएफ प्रबंध निदेशक जार्जीविया से पेरिस में मिलकर व्यक्तिगत तौर पर यह आश्वस्त किया कि उनका देश आईएमएफ की सभी शर्तोंं को मानेगा। उसके बाद ही आईएमएफ ने 3 अरब डॉलर की स्टैंड बाई व्यवस्था को मंजूरी दी।

14 जुलाई को आईएमएफ प्रमुख ने प्रधान मंत्री शहबाज शरीफ को फोन कर यह दुहराया कि उन्हें उम्मीद है कि आने वाली केयरटेकर गवर्मेंट भी आईएमएफ प्रोग्राम को लागू करेगी। आईएमएफ ने जिस दिन 1.2 अरब डॉलर की किश्त दी उसी दिन पाकिस्तान में पौने पांच रुपये प्रति यूनिट बिजली बिल में बढ़ोतरी की दी गई। फिल्हाल शरीफ गवर्नमेंट को यह श्रेय मिल रहा है कि इसने मुल्क को डिफाल्ट होने से बचा लिया।

इधर इमरान खान अभी भी हार मानने के लिए तैयार नहीं है। 9 मई के हादसे के बाद पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं के छोड़ जाने के बावजूद वह दावा कर रहे हैं कि जब भी चुनाव होंगे वही जीतेंगे। इमरान खान तो यहां तक दावा कर रहे हैं कि उनके जेल जाने या तहरीक ए इंसाफ पर पाबंदी लगाने की सूरत में वह नई पार्टी बनाकर चुनाव में जाएंगे और जीत भी जाएंगे।

वहीं पाकिस्तान के अधिकतर मीडिया हाउस और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि पीटीआई चेयरमैन का भविष्य अंधेरे में है। उन पर इतने मुकदमें लाद दिए गए हैं कि उनका सभी से बचना मुश्किल है। देर सबेर अदालत द्वारा दोषी ठहरा ही दिए जाएंगे। फिर इमरान खान और पीटीआई को लेकर शरीफ और जरदारी दोनों एक ही निर्णय पर हैं और वे सुनिश्चित करना चाहंगे कि खान को अयोग्य करार दिया जाए और इसके लिए वे खुद के उदाहरणों का हवाला भी दे रहे हैं।

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