BJP Yatra: राजस्थान और मध्य प्रदेश में राजनीतिक यात्राओं के भरोसे भाजपा

BJP Yatra: राजस्थान में सरकार बनाने और मध्य प्रदेश में सरकार बचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक यात्राओं के द्वारा जनसमर्थन हासिल करने की रणनीति बनाई है। राजस्थान में भाजपा 2 सितंबर से चार बड़े धार्मिक स्थानों से परिवर्तन यात्रा शुरू करेगी, वहीं मध्य प्रदेश में 3 सितंबर से जन आशीर्वाद यात्रा विंध्य में चित्रकूट से शुरू करेगी।

राजस्थान की यात्राओं में खास बात यह है कि राजस्थान में हुई पिछली 2 यात्राओं की कमान और चेहरा वसुंधरा राजे थी, लेकिन इस बार न ही वसुंधरा के हाथ में कमान है और न ही उनका चेहरा पार्टी ने आगे किया है। मध्य प्रदेश में भी शिवराज सिंह को चेहरा नहीं बनाया गया है। इसका संदेश साफ है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में सरकार बनने पर भाजपा किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी देने का मन बना चुकी है।

BJP Yatra: BJP relying on political tours in Rajasthan and Madhya Pradesh

उल्लेखनीय है कि 2002 में राजस्थान में वसुंधरा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद वसुंधरा राजे ने पूरे राज्य में परिवर्तन यात्रा निकाली थी, जिसका असर यह हुआ कि 2003 में भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। 2008 में भाजपा को राजस्थान में नेताओं की आपसी खींचतान के कारण हार का सामना करना पड़ा। 2013 में कांग्रेस की गहलोत सरकार के खिलाफ फिर से वसुंधरा राजे ने सुराज संकल्प यात्रा निकाली और प्रदेश में प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा की सरकार बनी। कांग्रेस ने भी सत्ता में रहते हुए 2013 में मुख्यमंत्री गहलोत और प्रदेश अध्यक्ष डाॅ. चंद्रभान के नेतृत्व में यात्रा निकाली थी लेकिन जब दिसंबर-2013 में चुनाव परिणाम आए तो कांग्रेस बुरी तरह हारी थी।

अपनी पूर्व दो यात्राओं जैसी ही यात्रा निकालने की अनुमति वसुंधरा राजे केन्द्रीय नेतृत्व से मांग रही थीं लेकिन प्रदेश में वसुंधरा राजे को साइडलाइन करने का मन बना चुके केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें अकेले यात्रा निकालने की अनुमति न देकर चारों दिशाओं से चार यात्रा निकालने का निर्णय किया।

राजस्थान में पहली यात्रा 2 सितंबर को पूर्वी राजस्थान रणथम्भौर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर से शुरु होगी जिसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्‌डा हरी झंडी दिखाएंगे। 18 दिन और 1847 किलोमीटर चलने वाली यह यात्रा सवाई माधोपुर, जयपुर व भरतपुर क्षेत्र की कुल 47 विधानसभा सीटों से गुजरेगी। पिछले 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन पूर्वी राजस्थान में बेहद कमजोर रहा था। धौलपुर जिले में बीजेपी ने सिर्फ एक सीट जीती थी लेकिन राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी को वोट देने के कारण बीजेपी ने उस विधायक को भी पार्टी से निकाल दिया था।

दूसरी यात्रा 3 सितंबर को बेणेश्वर धाम (डूंगरपुर) से गृह मंत्री अमित शाह रवाना करेंगे। बेणेश्वर धाम दक्षिण राजस्थान में आदिवासी समाज का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल है। यह यात्रा 19 दिन में 2433 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए कुल 52 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करेगी। इस यात्रा में डूंगरपुर, उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, कोटा, भीलवाड़ा, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, बूंदी, बारां, झालावाड़ जिलों की विधानसभा सीटें शामिल हैं।

तीसरी यात्रा 4 सितंबर को रामदेवरा (जैसलमेर) से शुरू होकर 18 दिन में 3574 किलोमीटर की यात्रा में जैसलमेर, जोधपुर, पोकरण, मेड़ता, डेगाना, शेरगढ़, बिलाड़ा, अजमेर, पुष्कर, नागौर सहित करीब 51 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करेगी। पश्चिमी राजस्थान में रामदेवरा सबसे बड़ा धार्मिक स्थल है। भाजपा यहां मेघवाल, जाट, कुमावत, माली जैसे बड़े वोट बैंक को साधने का प्रयास करेगी। इस यात्रा को राजनाथ सिंह हरी झंडी दिखाएगे।

चौथी यात्रा गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) से शुरू होगी। 18 दिनों में 2128 किलोमीटर में 50 विधानसभा को कवर करने वाली इस यात्रा को केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी रवाना करेंगे। इस यात्रा में बीकानेर, चूरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर व अलवर जिलों की विधानसभा सीटें आएंगी। लोकदेवता गोगाजी को उत्तरी राजस्थान में भगवान स्वरूप में पूजा जाता है।

राजस्थान की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी भाजपा पांच यात्राएं निकालेगी। 3 से 24 सिंतबर तक पूरे प्रदेश से निकलने वाली पांचों यात्राएं 10 हजार 543 किलोमीटर का सफर कर 210 विधानसभाओं को कवर करेगी। यात्राओं के इस सफर के दौरान मध्यप्रदेश में 211 बड़ी सभाएं, 678 छोटी सभाएं होगी। 998 स्थानों पर यात्राओं का स्वागत और नुक्कड़ सभाएं होगी। 25 सितंबर को पं. दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर भोपाल में यात्राओं का समापन होगा जिसे प्रधानमंत्री मोदी संबांधित करेंगे।

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह 3 सितंबर को चित्रकूट में कामतानाथ मंदिर में पूजा करने के बाद भाजपा की जन आशीर्वाद यात्रा की शुरूआत करेंगे। यह यात्रा 12 जिलों के 48 विधानसभा सीटों से गुजरेगी। यह यात्रा 19 दिन में 2343 किलोमीटर का सफर तय करेगी। 5 सितबंर को महाकौशल के मंडला से शुरू होने वाली दूसरी यात्रा को भी अमित शाह रवाना करेंगे। यह यात्रा 18 दिन में 2303 किलोमीटर की यात्रा करते हुए 10 जिलों की 45 विधानसभा सीटों से गुजरेगी।

तीसरी यात्रा 4 सिंतबर को खंडवा से धूनीवाले बाबा का आशीर्वाद लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रवाना करेंगे। यह यात्रा 21 दिन में 2,000 किलोमीटर के सफर में 10 जिलों के 42 विधानसभाओं से गुजरेगी। चौथी यात्रा को भी हरी झंडी नीमच में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 4 सिंतबर को दिखाएंगे। 17 दिनों में 2,000 किलोमीटर तय करने वाली यह यात्रा 12 जिलो के 44 विधानसभाओं को कवर करेगी।

पांचवी और अंतिम यात्रा ग्वालियर चंबल संभाग के श्योपुर कस्बे से 6 सिंतबर को जेपी नड्डा शुरू करेंगे। 17 दिन में 1997 किलोमीटर का सफर करने वाली यह यात्रा 11 जिलो के 42 विधानसभाओं से गुजरेगी।

भाजपा की ये राजनीतिक यात्राएं कितनी फायदेमंद होती हैं यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे को अलग-थलग करके आगे बढ़ रही भाजपा कब तक वसुंधरा बिना प्रचार कर पाएगी, और जनता कितना रिस्पॉन्स देगी, यह यात्रा की सफलता से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। इसी तरह मध्य प्रदेश में शिवराज ने अपने मन को समझा लिया है कि चुनाव के बाद अगर सरकार आती है तो उन्हें किसी नए नेता के लिए कुर्सी खाली करनी पड़ सकती है। लेकिन राजस्थान में वसुंधरा राजे ने ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं कि वह किसी और नेता के लिए रास्ता बनाने के लिए तैयार हैं।

मध्यप्रदेश में शाह और राजस्थान में मोदी ने जिस तरह से कमान अपने हाथ में लेकर पार्टी की चुनावी गतिविधियों को कंट्रोल किया है, उसमें शिवराज सिंह चौहान हों या वसुंधरा राजे, उनके लिए सामूहिक नेतृत्व में काम करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। लेकिन प्रदेश के लोकप्रिय नेताओं को किनारे करने की मोदी और शाह की रणनीति से मतदाता कितने संतुष्ट हैं, यह अभी भविष्य के गर्भ में है।

नवबंर-दिसंबर में जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं वहां भाजपा चुनाव पूर्व किसी को भी मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट नहीं करेगी। प्रदेश में किसी एक नेता को प्रोजेक्ट करने की बजाय भाजपा सामूहिक संगठन के नाम पर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। चुनावों में पीएम मोदी के कामकाज और केंद्र की योजनाओं को लेकर जाना भाजपा को सुविधाजनक लग रहा है। लेकिन भाजपा नेताओं को यह भी डर है कि कहीं यह रणनीति दिल्ली, हिमाचल, कर्नाटक की तरह फिर से शर्मनाक हार की ओर न ले जाए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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