Bihar Politics: नीतीश को साथ लाने से बीजेपी को होंगे सात बड़े फायदे
Bihar Politics: अमित शाह समेत बीजेपी के तमाम बड़े-छोटे नेताओं ने जब बेहद सख्ती से और बार-बार यही कहा था कि नीतीश के लिए अब एनडीए के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं, तो फिर यह दरवाज़ा खुला कैसे?
जवाब है कि नीतीश के लिए बंद दरवाज़ा खोलने के पीछे बीजेपी कम से कम सात बड़े फायदे देख रही है।

बिहार में क्लीन स्वीप की उम्मीद
नीतीश कुमार के आने से बिहार में एनडीए बेहद मज़बूत और इंडी अलायंस बेहद कमज़ोर हो गया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार के साथ रहते हुए एनडीए ने बिहार की 40 में से 39 लोकसभा सीटें जीत ली थीं। चूंकि आज भी नीतीश कुमार की पार्टी के पास बिहार में 15-16 प्रतिशत वोट तो हैं ही। ऐसे में नीतीश के पाला बदलने से बिहार के अंदर विपक्षी कैम्प में जहां हताशा और निराशा का वातावरण है, वहीं एनडीए के लिए एक बार फिर से 2019 जैसा प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद जाग गई है।
हिल गई इंडिया अलायंस की भी नींव
बीजेपी के लोग इंडिया अलायंस के गठन के दिन से ही इस पर फब्तियां कसते आ रहे हैं। वे इसके 56 छेद गिनाते हैं और बताते हैं कि इसका कोई भविष्य नहीं है, क्योंकि न तो इस अलायंस में कोई एकता है, न नेता है, न नीति है, न इनकी साफ नीयत है।
नीतीश कुमार के निकल जाने से इंडिया अलायंस के लिए बीजेपी के इस नैरेटिव का मुकाबला करना और भी मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि नीतीश ही वह नेता थे, जिन्होंने विपक्षी एकता की पहल की थी और पटना में अलायंस की पहली बैठक भी कराई थी। चूंकि उन्हें इंडिया अलायंस की नींव की तरह देखा जा रहा था, इसलिए उनके निकलने से यह अलायंस लोकसभा चुनाव से ठीक पहले ताश के महल की तरह बिखरता हुआ दिखाई दे रहा है।
दूसरे राज्यों में भी भाजपा का फायदा
बिहार के इस घटनाक्रम का फायदा लोकसभा चुनाव के दौरान एनडीए को दूसरे राज्यों में भी मिल सकता है, क्योंकि प्रत्य़क्ष दिख रहे इस बिखराव और एकता व सहमति की कमी की वजह से इंडी अलायंस एनडीए के मुकाबले परसेप्शन की लड़ाई पहले ही हार चुका है।
दूसरे राज्यों में भी वे मतदाता जो हवा का रुख देखकर वोट देते हैं, इतना तो ज़रूर सोचेंगे कि विपक्ष ने बीजेपी के खिलाफ कितना कमज़ोर, दिशाहीन और नीति-विहीन गठबंधन बनाया है। ज़ाहिर है कि ऐसे में वोटरों का एक बड़ा हिस्सा, जिसने अभी तक किसी खास गठबंधन के लिए मतदान करने का मन नहीं बनाया है, वह चुनाव के समय इंडी अलायंस के मुकाबले एनडीए को तरजीह दे सकता है।
बिहार में चुनाव के दौरान एनडीए की सरकार
नीतीश कुमार को मिलाकर बीजेपी जो एक और बड़ा फायदा देख रही है, वह यह है कि लोकसभा चुनाव के दौरान अब बिहार में उसकी सरकार होगी। हालांकि चुनाव के दौरान प्रशासनिक नियंत्रण चुनाव आयोग के पास चला जाता है, फिर भी यह सभी जानते हैं कि अनेक अफसरों पर सत्ता का प्रभाव कुछ न कुछ मात्रा में ज़रूर रहता है। इसके बावजूद कि भारत में चुनाव अब आम तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से संपन्न होते हैं, फिर भी विपक्ष में होने पर यह आशंका तो रहती ही है कि प्रशासन पर सत्तारूढ़ खेमे का अधिक ज़ोर रहता है। साथ ही, जिसकी सरकार होती है, उसके लिए चुनाव के दौरान फंड का इंतज़ाम करना भी अधिक सुविधाजनक और आसान हो जाता है।
आधी सरकार, अधिक नियंत्रण
नीतीश कुमार आए तो बीजेपी को बिहार में आधी सरकार तो मिल ही गई, इस बार सरकार पर उसका नियंत्रण भी पहले की तुलना में अधिक मज़बूत दिखाई दे रहा है। उसने नीतीश कुमार के दोनों कंधों पर दो उप-मुख्यमंत्री बिठा दिए हैं और ये दो उप-मुख्यमंत्री भी कौन हैं?
एक हैं सम्राट चौधरी जैसे फायर ब्रांड लीडर, जिन्होंने भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नीतीश कुमार को अपदस्थ करने की प्रतिज्ञा के साथ चाणक्य-चोटी की तर्ज पर सिर पर एक पगड़ी बांध ली थी। दूसरे उप-मुख्यमंत्री हैं विजय सिन्हा। वे भी नीतीश कुमार के खिलाफ काफी मुखर रहे हैं और जब वे विधानसभा अध्यक्ष थे, तो एक प्रसंग को लेकर नीतीश कुमार उनके ऊपर विधानसभा में ही आग बबूला हो गये थे। विधानसभा अध्यक्ष पद से हटने के बाद विजय सिन्हा ही बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बनाये गये थे।
इस प्रकार, सरकार तो इस बार भी बीजेपी को आधी ही मिली है, लेकिन यह आधी सरकार उस तरह की नहीं होने जा रही है, जिस तरह की सुशील मोदी के उप-मुख्यमंत्री रहते हुए चल रही थी। सुशील मोदी को नीतीश कुमार के काफी अनुकूल माना जाता था, जिस वजह से एनडीए-1 में नीतीश कुमार ने जैसे चाहा, वैसे सरकार को चलाया।
एनडीए-2 में भी नीतीश के दोनों कंधों पर तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी के रूप में दो उप-मुख्यमंत्री तो ज़रूर बिठाए गए थे, लेकिन इन दोनों नेताओं के बारे में कहा जाता है कि यदि ये नीतीश कुमार के बहुत अनुकूल नहीं थे, तो आक्रामक भी नहीं थे। लेकिन इस बार यानी एनडीए-3 में उप-मुख्यमंत्री बने सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा दोनों नीतीश कुमार के खिलाफ काफी आक्रामक तेवरों वाले नेता माने जाते हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि एनडीए-1 और एनडीए-2 की तुलना में इस बार नीतीश सरकार पर बीजेपी का नियंत्रण अधिक रहने वाला है।
नीतीश की विरासत पर अधिकार
कई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नीतीश कुमार का स्वास्थ्य इन दिनों अच्छा नहीं रहता। इधर कुछ बहके-बहके बयान भी उन्होंने दिये हैं, जिनसे इन रिपोर्टों को बल मिला है। उनकी उम्र भी हो चली है। 2020 के विधानसभा चुनाव में वे खुद ही यह एलान भी कर चुके हैं कि वह उनका अंतिम चुनाव था। ऐसे में स्पष्ट है कि नीतीश कुमार रिटायरमेंट की तरफ बढ़ चले नेता हैं।
इसलिए बीजेपी को कहीं यह भी लगता है कि अगर हम नीतीश कुमार को उनके अंतिम राजनीतिक दिनों में सहारा देंगे और उन्हें अपने पाले में रखेंगे, तो उनकी जो राजनीतिक विरासत है, उनका जो वोट बैंक है, वह प्राकृतिक रूप से स्वतः ही हमारी तरफ ट्रांसफर हो सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार से सहानुभूति रखने वाले उनके वोटर और सपोर्टर इस बात से कहीं न कहीं कृतज्ञ महसूस करेंगे कि भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश कुमार को बार-बार सहारा दिया।
जातीय जनगणना का मुद्दा पूरी तरह ध्वस्त
हाल के महीनों में विपक्षी गठबंधन ने बीजेपी के खिलाफ जिस सबसे धारदार हथियार का इस्तेमाल किया था, वह था जातीय जनगणना का मुद्दा, जिसके सूत्रधार थे नीतीश कुमार और जिसमें उनके सहयोगी बने तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, क्योंकि जब यह मुद्दा उठाया गया, तब बिहार में महागठबंधन की सरकार थी। बाद में राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को राहुल गांधी ने भी लपक लिया और पूरे देश में घूम-घूम कर कहा कि अगर उनके गठबंधन की सरकार आई तो पूरे देश में जातीय जनगणना कराई जाएगी। कहीं न कहीं विपक्ष के इस दांव से बीजेपी सचेत अवश्य थी।
इसीलिए मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में जहां उसने जातीय समीकरणों को भली-भांति साधते हुए टिकट बांटे, वहीं तीनों राज्यों में सरकार बनने पर एक मुख्यमंत्री और दो उप-मुख्यमंत्री का ऐसा फॉर्मूला अपनाया, जिसके तहत अगड़े, पिछड़े और दलित तीनों वर्गों के साथ बराबरी का व्यवहार करते हुए एक-एक पद दिया गया।
अब बिहार के इस घटनाक्रम के बाद जब जातीय जनगणना के सूत्रधार नीतीश कुमार को ही बीजेपी ने अपनी तरफ मिला लिया, तो विपक्ष द्वारा उछाला गया यह मुद्दा भी अपने आप ध्वस्त हो गया। अब इसे बीजेपी के खिलाफ किसी भी प्रकार से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
बीजेपी के सामने कुछ चुनौतियां भी
हालांकि नीतीश कुमार को अपने पाले में मिलाने के इतने सारे फायदों के साथ-साथ लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के सामने कुछ चुनौतियां भी पेश आने वाली हैं। खासकर विधानसभा चुनाव के समय। क्या बीजेपी एक बार फिर से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करेगी? जनता दल यूनाइटेड को उसे कितनी सीटें देनी पड़ेंगी? सवाल यह भी है कि बीजेपी अगर बार-बार आधी सत्ता से ही संतुष्ट हो जाया करेगी, तो बिहार में पूरी सत्ता तो उसे कभी मिल ही नहीं पाएगी।
नीतीश कुमार को अपने पाले में लाने के बाद बीजपी के लिए बिहार में अपने अन्य गठबंधन सहयोगियों चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी को भी साधे रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सवाल यह भी रहेगा कि बीजेपी के सहयोग से नीतीश कुमार लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीत तो लेंगे, लेकिन क्या अगले पांच वर्षों तक वे एनडीए में ही बने रहेंगे या फिर से कोई और ठिकाना तलाश लेंगे?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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