Nitish Kumar: न बोलिए ऐसी बानी, जो प्रतिष्ठा पर फेर दे पानी
Nitish Kumar: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा में महिलाओं को लेकर दिये गये अपने आपत्तिजनक बयान पर चाहे माफ़ी मांग ली हो और स्वयं की निंदा कर ली हो पर सच यही है कि स्त्री अस्मिता और विधानसभा व विधान परिषद की गरिमा को जो क्षति उन्होंने पहुँचा दी है वह अपूरणीय है। मंगलवार को विधानसभा में जनसंख्या नियंत्रण पर बोलते-बोलते नीतीश बाबू अपनी भाषा, सोच और मर्यादा से नियंत्रण खो बैठे। वायरल होते उनके वीडियो को देखकर प्रथम दृष्टया तो लगा शायद वीडियो "मोर्फड" किया गया है क्योंकि किसी भी प्रदेश के मुखिया से सभा के पटल पर ऐसी निंदित भाषा और भाव भंगिमा की अपेक्षा तो अकल्पनीय ही है। परंतु जब पुष्ट माध्यमों से खबरें और विचार- विमर्श आने लगे तो सच्चाई स्वीकार करनी पड़ी।
सियासी गलियारे में हाय-तौबा मचता देख नीतीश कुमार ने माफ़ी तो मांग ली है पर माफ़ी मांगते समय भी जो तेवर और भंगिमा थी वह किसी भी तरीके से स्वीकृत नहीं है। उनका माफीनामा इस तरह का है जैसे उन्होंने माफी मांग कर आपत्ति करनेवालों को चिढाया है। उनको इस बात का इल्म अभी तक नहीं है कि विधानसभा में खड़े होकर उन्होंने कितनी घटिया और फूहड़ भाषा का प्रयोग किया है। भाजपा ने तो मुख्यमंत्री के मानसिक स्वास्थ्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया है और जाँच के बाद रिपोर्ट सार्वजनिक करने की बात पर अड़ गई है। भाजपा ने यह आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री को डिम्नेशिया हो सकता है जिसमें वो बातें भूलने लगे हैं। साथ में उन पर अश्लीलता को एंजॉय करने का भी आरोप भाजपा ने लगाया है। सोशल मीडिया पर उनके "डोप टेस्ट" की भी मांग उठने लगी है।

प्रदेश के मुख्यमंत्री ने स्त्री शिक्षा की महत्ता और जनसंख्या नियंत्रण में उनकी भागीदारी को ऐसे समझाने की कोशिश की जिसे सुनकर उनके पीछे बैठी उनकी ही पार्टी महिला विधायक ने शर्म से अपना मुंह छिपा लिया। उन्होंने विधानसभा और विधान परिषद में खड़े होकर जिस प्रकार की निहायत सड़कछाप भाषा में पति पत्नी के बीच बननेवाले शारीरिक संबंध में "डालने" और "बाहर पानी निकालने" जैसे असभ्य और सांकेतिक पोर्न शब्दावली का इस्तेमाल किया है वैसी भाषा बिहार के बदनाम भोजपुरी गायक भी अपने गीतों में इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे।
नीतीश कुमार यह बताना चाह रहे थे कि विवाह के बाद शारीरिक सम्बन्ध बनाते समय पढ़ी-लिखी लड़कियां इस बात का ख्याल रखती हैं ताकि वह अनचाहे गर्भ की चिंता से मुक्त रहे। मगर इसी बात तो बिहारी अंदाज में नीतीश कुमार ने सदन में कुछ ऐसे रखा कि आज कोई भी उसको दोहरा तक नहीं सकता। इस तरीके का संवाद आने पर सेंसर बोर्ड "A" सर्टिफिकेट दे देता है। मगर एक प्रदेश के सीएम ने बिना किसी एडिटिंग के निर्लज्जता से हँसते हुए इस बात को कह डाला जिसे दोहराते हुए किसी भी संतुलित इंसान की जिह्वा थरथरा जाए।
नीतीश कुमार के बयान की जितनी निंदा की जाए उतनी कम है। इस फूहड़ बयान को एक बार को "स्लिप ऑफ टांग " मान भी लिया जाता परंतु विधान परिषद में अपने बयान के ठीक बाद इसकी पुनरावृत्ति भी कर दी। तब इसे सोचा समझा बयान ही माना जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनके इस बयान की निंदा की परंतु ऐसे बयान के कुप्रभाव को क्या दोषी की निंदा कर लेने भर से या उसके माफी मांग लेने से कम किया जा सकता है?
जिस देश में अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने के गलत तरीके अपनाने से हर रोज 8 महिलाओं की मृत्यु हो रही हो वहाँ ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर मसखरी करना जनता का दुर्भाग्य ही है। 25.5/1000 शिशु जन्म दर के साथ बिहार भारत का अग्रणी राज्य है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जन्म दर ज्यादा है। मुख्यमंत्री ने बताया कि बिहार में जनसंख्या दर 4.3 से 2.9 हुई है। इस दर को 2 तक करने के तरीके और महत्ता को बताने के उद्देश्य से ही मुख्यमंत्री ने अश्लील भाषा और असंसदीय शब्द का प्रयोग किया। इस मुद्दे की गंभीरता को सिरे से नकारते मुख्यमंत्री जी ने बायोलॉजिकल प्रक्रिया का सड़क छाप बखान कर दिया। महिला की सुरक्षा और अस्मिता पर आँसू बहाने वाला इंडी एलायंस चुप्पी साधे है। नीतीश सरकार में शामिल घटक दल राजद नेता कवर फायर करते दिख रहे हैं।
स्त्री के सम्मान को तार तार करने वाले नीतीश कुमार के बयान को जस्टिफ़ायड करने वालों का अपराध भी कम नहीं है। सदन के गरिमा की बात की जाए तो यह पहली बार नहीं है जब किसी भी सदन में महिलाओं पर अमर्यादित टिप्पणी की गई हो। नेता सदन के भीतर और बाहर महिलाओं का अपमान करते आए हैं. "परकटी", " टंच माल ", " टनाटन", "जर्सी गाय", "करोड़ की गर्ल फ्रेंड " जैसे शब्द और भाषा पहले भी महिला की गरिमा के परखच्चे उड़ाये हैं पर ऐसे बयान अधिकांश व्यक्तिगत टिप्पणी होती थी। शरीरिक सम्बन्ध बनाने की प्रक्रिया को वर्णित करके संपूर्ण महिला जगत को अपमानित करने का जैसा निकृष्ट कार्य बिहार के मुख्यमंत्री ने किया है, वैसा किसी ने नहीं किया।
भाषायी मर्यादा और सदन की गरिमा को चोटिल करने वाले नीतीश कुमार ने स्त्री शिक्षा जैसे आवश्यक मुद्दे को भी हल्का कर दिया है। जातीय जनगणना सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि बिहार में सिर्फ 7% लोग ग्रेजुएट है। यह डिग्री भी यहाँ 3 साल की बजाय 5 साढ़े 5 साल में मिलती है। स्त्री की साक्षरता देश के स्तर पर 71.5% है तो बिहार में यह मात्र 55% है। ऐसे में सदन में खड़े होकर सड़कछाप भाषा में बिहार की किन पढ़ी लिखी महिलाओं का हवाला दे रहे थे?
दरअसल नीतीश कुमार की भाषा पिछले साढ़े तीन दशकों में बिहार के चरमराये शिक्षा व्यवस्था का स्तर और सामाजिक व्यवस्था की दरकती सोच का परिणाम है। जब शिक्षा ही नहीं होगी तो शुचिता, सभ्यता, संवेदनशीलता की अपेक्षा रखना व्यर्थ है। जनता का गुस्सा देख लगता है नीतीश कुमार ने अपने राजनैतिक पतन की इबारत लिख दी है। बिहार की जिन महिलाओं ने उन्हें सर माथे बैठाया था वो जानती हैं कि एक बयान की वजह से वो अब गली मोहल्ले में भी ऐसे अभद्र टिप्पणियों की शिकार होंगी।
इस मामले में अमेरिकी महिला गायक मैरी मिलबेन के बयान पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। मिलबेन ने कहा है कि अगर वो भारत की नागरिक होती तो नीतीश कुमार के इस बयान के विरोध में मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दावेदारी पेश करतीं। उनके इस बयान पर भाजपा को ध्यान देना चाहिए कि क्या वो बिहार में कोई महिला मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर सकते हैं?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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