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Bihar by-Election: गोपालगंज में भाजपा की जीत का संदेश क्या है?

Bihar by-election: चार राज्यों की सात सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे घोषित हो गये हैं। इस सात सीटों में सबसे ज्यादा चर्चा बिहार के गोपालगंज की है। यहां से बदले समीकरण के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने दोबारा जीत हासिल कर ली है। सिर्फ भारतीय जनता पार्टी की जीत की वजह से यह सीट महत्वपूर्ण नहीं बन गई है, बल्कि इसलिए भी कि गोपालगंज उन लालू प्रसाद यादव का गृह जिला है, जिन्हें सामाजिक न्याय की राजनीति को बदलने वाला माना जाता है।

bihar by election 2022 BJP victory in Gopalganj raises questions on minority politics

राष्ट्रीय जनता दल के अलावा हाल ही में उसके साथी बने जनता दल यू को भी उम्मीद थी कि लालू यादव की घरेलू पिच पर भारतीय जनता पार्टी को उनकी मिली-जुली टीम क्लीन बोल्ड कर देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

भारतीय राजनीति में एक परंपरा स्थापित हो गई है। एक नैरेटिव स्थापित किया जाता है और पूरी राजनीति की मीमांसा उसी नैरेटिव के इर्द-गिर्द अहर्निश रूप से जारी रहता है। चूंकि बिहार की राजनीति पर जाति का मुलम्मा कहीं ज्यादा चढ़ा हुआ है, इसलिए माना जा रहा था कि राज्य की मुस्लिम, यादव, अति पिछड़ी और कुर्मी आबादी मिलकर गोपालगंज में भारतीय जनता पार्टी को नेस्तनाबूद कर देगी।

अगर ऐसा नहीं होता तो राष्ट्रीय जनता दल के बौद्धिक प्रमुख माने जाने वाले खानदानी समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी सोशल मीडिया पर चुनाव के दिन यह कहने से हिचकते कि राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू का महागठबंधन दोनों ही सीटों पर आसान जीत दर्ज करने की दिशा में सहजता से आगे बढ़ रहा है। अब दूसरी सीट की चर्चा हुई है तो उसकी भी जानकारी यहां जरूरी है।

दरअसल दूसरी सीट रही मोकामा। जहां से भूमिहार जाति वाले बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को जीत मिली है। अनंत सिंह इन दिनों जनता दल यू में हैं। जो लगातार यहां से चुने जाते रहे हैं। सजायाफ्ता होने की वजह से उनकी सीट खाली हुई तो उनकी पत्नी को पार्टी ने टिकट दिया। वैसे यहां से वे लगातार जीतते रहे हैं और उनकी जीतों को उनकी व्यक्तिगत जीत माना जाता रहा है।

वैसे ही गोपालगंज की सीट से जिन कुसुम देवी की जीत हुई है, उनके पति यहां से चार बार विधायक रह चुके थे। हालांकि उनकी जीत का अंतर महज 1794 वोट ही रहा है। यहां से ओवैसी के उम्मीदवार को बारह हजार से ज्यादा वोट हासिल हुए हैं। इसलिए राजद-जदयू खेमा यह प्रचारित करने में जुटा हुआ है कि गोपालगंज की जीत भाजपा की जीत की बजाय मुस्लिम वोटों में एमआईएम की सेंध बड़ा वजह है।

लेकिन जीत तो जीत ही होती है। अपनी जो लोकतांत्रिक व्यवस्था है, उसमें एक वोट से जीत भी जीत ही मानी जाती है। पश्चिमी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की तरह नहीं है कि जीतने वाले प्रत्याशी को कम से कम पचास प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल करना ही होगा। पूरी की पूरी राजनीति एक वोट के अंतर से भी होने वाली जीत या हार पर टिकी हुई है।

2014 में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से भाजपा विरोधी ताकतें इसी जुगत में लगी हुई हैं कि किस तरह वे भाजपा को पटखनी दें। साल 2015 में बिहार की धरती पर तथा 2020 में पश्चिम बंगाल में भाजपा को पछाड़कर उन ताकतों को कुछ राहत जरूर मिली थी।

बिहार में नीतीश कुमार के भाजपा का साथ छोड़ने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर एक उम्मीद बनी थी कि भाजपा विरोधी गोलबंदी ना सिर्फ मजबूत होगी, बल्कि वोटरों को भी आकर्षित करेगी। गोपालगंज की जीत इसी नैरेटिव को चुनौती दे रही है। इससे एक बात और साफ हुई है कि मुस्लिम वोटरों पर एकमुश्त अपना हक समझने वाली समाजवादी खेमे की राजनीति से भी उनका मोहभंग होने लगा है।

अब मुस्लिम वोटर भी एकमुश्त मतदाता नहीं रहे। जहां मौका लग रहा है, अब वे भी अकलियत-अकलियत चिल्लाने वाली समाजवादी राजनीति के साथ ही कांग्रेस से इतर अपने लिए नए रहनुमा चुन रहे हैं। ओवैसी का बिहार की राजनीति में लगातार अपनी उपस्थिति बढ़ाते जाना इसी प्रक्रिया का उदाहरण है।

बिहार और उत्तर प्रदेश की धरती पर मुसलमानों की एकमुश्त रहनुमाई करने वाली समाजवादी ताकतों को गोपालगंज जैसे नतीजों से चिंतित होना चाहिए। वैसे उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की गोला गोकर्णनाथ सीट पर भी इन्हीं सीटों के साथ चुनाव हुआ था और वहां जिस तरह समाजवादी पार्टी को मतदाताओं ने नकारा है, उससे साफ है कि अब मुस्लिम वोटरों पर दावा करना उनके लिए राजनीतिक रूप से खतरनाक साबित होगा।

गोपालगंज ने यह भी साबित किया है कि जातीय आधार वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के मतदाताओं की राजनीतिक सोच में भी बदलाव होने लगा है। अब वे भी जातीय आधार से इतर अपना और अपने क्षेत्र का भला-बुरा सोचने लगे हैं। इसीलिए इन उपचुनावों में जातीय दीवारें भी गिरी हैं। अगर जातीय दीवार नहीं गिरी होती, अगर समाजवादी राजनीति के पुराने नैरेटिव में सेंध नहीं लगी होती, तो गोपालगंज में भाजपा का जीतना संभव नहीं होता, और गोला गोकर्णनाथ में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी की बुरी गत नहीं होती।

गोपालगंज का संदेश यह है कि अब अति पिछड़ी जातियों पर नीतीश कुमार की पकड़ कमजोर पड़ रही है। मुसलमान अपने लिए नए रहनुमा तलाश रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी का पसमांदा मुसलमान प्रेम किंचित कम संख्या में ही सही, मुसलमानों को भी आकर्षित करने लगा है। ऐसे में राजनीति का बदलना स्वाभाविक है। समाजवादी खेमे को जाति का बुनियादी आधार देने वाले नैरेटिव को चोट लगना ही है।

गोपालगंज का संदेश यह भी है कि मुसलमान वोटर अब एकमुश्त नहीं रहा, बल्कि वह अपना निजी फायदा-नुकसान देखते हुए अपने लिए नए मुकाम तलाशने लगा है। अगर आने वाले चुनावों में यही परिपाटी बनती है तो जाति एवं अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही उत्तर भारत की राजनीति बदल सकती है।

यह भी पढ़ें: बिहार उपचुनाव परिणाम: क्या नीतीश कुमार का कद घटा है ? 5 प्वाइंट में समझिए राजनीतिक प्रभाव

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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