Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Bankruptcy: दिवालिया हुए तो क्या हुआ मालामाल हो गये

बड़े कारोबारियों द्वारा खुद को दिवालिया घोषित करना कहीं उनके लाभ कमाने का रणनीतिक हिस्सा तो नहीं है?

big businessmen declaring themselves bankrupt is a strategic part of profit making?

Bankruptcy: गो-एयर से गो-फर्स्ट बनी वाडिया ग्रुप की एयरलाइंस कंपनी ने एनसीएलटी के चौखट पर पहुंचकर खुद को दिवालिया घोषित करने की अर्जी दी है। किराए के सिर्फ दो विमानों से एयरलाइन्स का कारोबार शुरू करने वाली वाडिया ग्रुप की कंपनी 61 विमानों का जखीरा खड़ा करने के बाद अचानक कारोबार से मुंह मोड़ रही है। दिवालिया घोषित किए जाने के लिए सरकार के समक्ष गिड़गिड़ा रही है। आखिर क्यों?

हमारे देश के अधिकांश हिस्सों में आज भी दिवालिया होना सामाजिक शर्म का विषय माना जाता है। जिस किसी व्यापारी का दिवाला निकल जाता है वह लज्जा से मुंह छुपाते फिरता है। पर आजकल जिस तरह से नामी-गिरामी कंपनियां खुद को दिवालिया घोषित कर रही है, उससे यह लगने लगा है कि अब यह शर्म का नहीं बल्कि लाभ का धंधा हो गया है। इस तरह का ट्रेंड वर्ष 2016 में शुरू हुआ जब दिवाला और दिवालिया संहिता नामक नया कानून बना। इस नए कानून ने व्यापारियों को छूट दी कि अगर आप बैंक का कर्ज लौटा नहीं पा रहे हैं तो खुद को दिवालिया घोषित करिए। सरकारी व्यवस्था आपकी कंपनी बेचकर बैंकों और दूसरों के कर्ज लौटा देगी।

देश में इससे पहले तक दिवालियापन से जुड़े कम से कम 12 कानून थे जिनमें से कुछ तो 100 साल से भी अधिक पुराने थे। तब मामलों के निपटान में बहुत अधिक समय लगता था। मोदी सरकार ने व्यापार को गति देने के लिए नया कानून बनाया, लेकिन इस कानून के बनने के बाद से ही इसकी खामियां उजागर होने लगी। लगातार यह आरोप लगता रहा कि कानून का गलत इस्तेमाल कर फायदा उठाया जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा बनाये इस कानून में कई बार संशोधन भी किया है। कानून की धारा 7, धारा 12 एवं धारा 29 में मुकदमा दायर करने, नीलामी में भाग लेने तथा 180 दिनों के भीतर सारी प्रक्रिया पूरी कर लेने का आश्वासन है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि दो 2 साल से भी अधिक समय से मामले अधिकारियों के समक्ष लटके पड़े हैं।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक 31 जनवरी 2023 तक एनसीएलटी पीठ के पास 21,205 मामले लंबित हैं। इनमें दिवाला एवं शोधन क्षमता कोर्ट के तहत 12, 963 मामले तथा 8,242 अन्य मामले शामिल हैं। भारतीय दिवाला एवं शोधन क्षमता बोर्ड के द्वारा जारी किए गए आंकड़े के मुताबिक आईबीसी (इंसॉल्वेंसी व बैंकरप्सी कोड) 2016 की शुरुआत के बाद से 31 दिसंबर 2022 तक कुल 6,199 सीआइआरपी ही शुरू हो चुके हैं।

सीआईआरपी का अर्थ कारपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया होता है। आईडीबीआई द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 31 दिसंबर 2022 तक मात्र 611 सीआईआरपी का समाधान हुआ। इनमें वित्तीय लेनदारों के लिए लगभग 2.44 लाख करोड़ रुपए मूल्य की उगाही की गई। इस पूरी प्रक्रिया में कई सारी कंपनियों की नीलामी तो हुई लेकिन इन कंपनियों की नीलामी से बैंकों और दूसरे कर्जदाताओं को बहुत अधिक प्राप्तियां नहीं हुई।

सरकार ने खुद बताया है कि नीलाम हो चुकी कंपनियों में सरकारी बैंकों के लगभग 9 लाख करोड रुपए बतौर कर्ज फंसे थे। यह कंपनियां इतने सस्ते में बिकी हैं कि मुश्किल से ढाई लाख करोड़ ही वापस आए हैं। यानी कि लगभग 6:30 लाख करोड़ रुपए डूब गए। अगर इसे तकनीकी भाषा में कहा जाए तो बैंकों ने अपने खाते से 6:30 लाख करोड़ रुपए का राइट ऑफ कर दिया।

कानून का सहारा लेकर कंपनियां या तो खुद या उनके बैंक उन्हें राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में ले जाते हैं। ट्रिब्यूनल ऐसी कंपनियों का केस किसी सीए या ऑडिट कंपनी को हल ढूंढने के लिए सौंप देता है। इन्हें बैंक की भाषा में रेजोल्यूशन प्रोफेशनल यानी आरपी कहा जाता है। आरपी कंपनियों की परिसंपत्तियों की कीमत निर्धारित करता है और आपसी सहमति के बाद नीलामी की प्रक्रिया शुरू करता है। इस पूरे आयोजन के पीछे अधिक से अधिक रिकवरी करने की मंशा होती है। मामले को अधिकाधिक पारदर्शी बनाने के लिए ही नीलामी की प्रक्रिया रखी गई है। लेकिन इस प्रक्रिया के फलितार्थ चौकानेवाले हैं।

उदाहरण के लिए वीडियोकॉन पर 46 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था, पर यह कंपनी मात्र तीन हजार करोड़ में बिक गई। जेट एयरवेज पर 15000 करोड़ का कर्ज था, वह महज दो हजार करोड़ में बिकी। रुचि सोया पर 12,000 करोड रुपए का कर्ज था, वह महज 4,300 करोड में बिकी। 24,000 करोड रुपए की कर्जदार आलोक इंडस्ट्री मात्र 500 करोड़ रुपए में नीलाम हो गई। बरिस्ता कॉफी ग्रुप पर 25,000 करोड़ रुपए का कर्ज था वह मात्र 1500 करोड़ में बिक गया। इसी तरह रिलायंस नेवल पर 12,000 करोड़ का कर्ज था, यह कंपनी सिर्फ 800 करोड रुपए में नीलाम हो गई। ऐसे अनेक मामले हैं।

नया दिवालिया कानून लाने के पीछे यह धारणा थी कि पुराने दिवालिया कानूनों के कारण मामलों को निपटाने में देरी होती है, जिसका असर बैंकों पर पड़ता है। बैंकों को अपना पैसा वसूलने में काफी समय बर्बाद करना पड़ता है, वहीं नए कर्ज बांटने की क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसीलिए बैंक भी अक्सर रिकवरी के लिए मजबूत कानून की मांग करते रहे हैं। सरकार ने कानून में समय-समय पर संशोधन भी किया है लेकिन 'तू डाल डाल -मैं पात पात' की कहानी चरितार्थ करते हुए कंपनी मालिक बैंकों का कर्ज चुपके-चुपके अपनी शैल कंपनियों के जरिए या गुप्त और बेनामी खातों के जरिए विदेश भेजते रहे हैं। इसका प्रमाण भी समय-समय पर जांच एजेंसियों को मिलता रहा है।

मालूम हो कि आलोक इंडस्ट्री के मालिकों के गुप्त खाता होने की बात पंडोरा पेपर में भी आई थी पर आज तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। बरिस्ता कॉफी के मालिकों ने 127 फर्जी कंपनियों में अपनी 80% संपत्ति और बैंकों के पैसे चुपके से डाल दिए और खुद को दिवालिया घोषित कर दिया।

गौरतलब है कि देश का आम आदमी वाजिब जरूरत के लिए किसी बैंक से लोन लेता है और चुकाने में थोड़ी चूक हो जाती है तो यही बैंक उसका जीना मुहाल कर देते हैं। लेकिन बड़ी कंपनियों के लिए बड़े कर्ज लेना और दिवालिया हो जाना एक बिजनेस मॉडल की तरह होता है। जानकार बताते हैं कि बड़ा कर्ज लेने वाली कंपनियां थोड़ा और बड़ा बनने के चक्कर में खुद को दिवालिया घोषित करती हैं तथा अपनी ही परिसंपत्तियों को अपने किसी गुप्त व्यक्ति द्वारा नीलामी के दौरान खुद हासिल करने की कोशिश करती हैं।

लेकिन यहां लाख टके का सवाल यह है कि दिवालिया कानून की आड़ में बैंकों द्वारा उनके कर्ज का बड़ा हिस्सा राइट ऑफ किया जा रहा है। इसका खामियाजा देर सबेर आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है। इसे हम यस बैंक के मामले से आसानी से समझ सकते हैं। लगभग दिवालिया हो चुके यस बैंक को बचाने के लिए स्टेट बैंक ने 15,000 करोड रुपए की पूंजी डाली, लेकिन स्टेट बैंक ने अगले ही दिन आम जमाकर्ता के लिए ब्याज दर घटा दी। ऐसे में जरूरी है कि सरकार कड़े संशोधनों के साथ आगे आए तथा जानबूझकर खुद को दिवालिया घोषित करने वालों की गहन पड़ताल के बाद ही मामले को पारदर्शी तरीके से निपटाये।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+