NDA: अटल स्मृति के बहाने राजग की याद
राजग के कई बड़े नेता दिल्ली में थे, तो इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उनके साथ एक अनौपचारिक बैठक भी की, जिसमें चुनावी रणनीति पर इनपुट लिए गए । 2024 का चुनाव भाजपा के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है, क्योंकि दस साल बाद यह पहली बार होगा कि दो-चार राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में उसी तरह भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़े होने की संभावना बन रही है, जैसे 1977 में कांग्रेस के सामने विपक्ष का एक उम्मीदवार था, जिसने पहली बार कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था।

खुद एनडीए में रहते हुए पिछले लोकसभा चुनावों में 18 सीटें जीतने वाली शिवसेना का सिर्फ एक गुट राजग में बचा है, 16 सीटें जीतने वाला जेडीयू राजग छोड़ चुका है। ये दोनों दल अब भाजपा विरोधी "इंडिया" गठबंधन का हिस्सा हैं| दो सीटें जीतने वाला अकाली दल और एक सीट जीतने वाली आरएलपी भी राजग से बाहर हैं| राजग के घटक सिर्फ 53 सीटें जीते थे, उनमें से 37 सीटें जीतने वाले दल राजग छोड़ चुके हैं।
आश्चर्यजनक बात यह रही कि राजग छोड़कर "इंडिया" गठबंधन के रणनीतिकार बने नीतीश कुमार ने भी राजग नेताओं के जाने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी| ऐसा करके उन्होंने अपनी पहले कही गई बात को दोहराया है कि अटल आडवानी के समय राजग के घटक दलों की जो इज्जत होती थी, वह मोदी युग में खत्म हो गई, मोदी युग में एकछत्र राज शुरू हो गया है।
अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार में शामिल तृणमूल कांग्रेस, जेडीयू और उद्धव ठाकरे की शिवसेना इस समय इंडिया गठबंधन के मुख्य घटक हैं। वाजपेयी की लोकप्रियता दलों के बन्धनों को तोड़कर थी| उनके घोर विरोधी भी उनकी शालीनता और बड़प्पन की तारीफ़ करते हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां वाजपेयी के घोर विरोधियों में से रहे थे, लेकिन राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के समय जब महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की समाधियों पर गए, तो वह अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर भी गए थे।
अगर रणनीति बनाकर राहुल गांधी, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे एक साथ वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने जाते तो निश्चित ही वाजपेयी के जमाने की समन्वय की राजनीति की मौजूदा भाजपा नेतृत्व की राजनीतिक शैली से तुलना की जाती, लेकिन राजग के पहले घटक समता पार्टी के नेता नीतीश कुमार ने अपनी तरफ से एक संदेश देने की कोशिश की है। वह न सिर्फ वाजपेयी सरकार में रेलमंत्री थे, बल्कि वाजपेयी ने ही उन्हें बिहार का मुख्यमंत्री बनवाया था।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का गठन मई 1998 में लाल कृष्ण आडवानी ने किया था। अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले चेयरमैन और समता पार्टी के अध्यक्ष जार्ज फर्नांडिस संयोजक बनाए गए थे। जब राजग बना था, तो उस समय जार्ज फर्नांडिस की समता पार्टी, जयललिता की अन्ना द्रमुक, प्रकाश सिंह बादल के अकाली दल, बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना ने सबसे पहले ज्वाइन किया था| बाद में सरकार बनते बनते राजग के घटक दलों की संख्या 14 हो गई थी। चन्द्रबाबू नायडू की टीडीपी ने राजग को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया था।

2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार का एक बड़ा कारण राजग में बिखराव को माना जाता है| हालांकि जैसा भी था राजग बना हुआ था| 2005 में अटल बिहारी वाजपेयी की जगह लाल कृष्ण आडवानी राजग के अध्यक्ष बनाए गए| जार्ज फर्नांडिस के अस्वस्थ हो जाने के बाद 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले राजग की गतिविधियों का संचालन मुश्किल हो गया, तो दिसंबर 2008 में शरद यादव को राजग का कार्यकारी संयोजक बनाया गया था, जिनके जनता दल का समता पार्टी में विलय होने के बाद जेडीयू बना था| लेकिन 2013 में नीतीश कुमार ने राजग से संबंध तोड़ लिया, तो शरद यादव भी राजग से अलग हो गए।
2014 के चुनाव से पहले फिर कोशिश शुरू हुई, तो चुनाव से पहले राजग में 29 पार्टियां शामिल हो चुकी थीं| भाजपा ने 282 लोकसभा सीटें जीतीं थीं, राजग के बाकी घटक दलों में से 11 दलों ने 54 सीटें जीती थीं| इसके बाद राजग को पूरी तरह भुला दिया गया था, राजग की कोई बैठक नहीं हुई| मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 16 पार्टियां एनडीए छोड़ गईं| इसके बावजूद छोटे मोटे दलों को मिलाकर 2019 के लोकसभा चुनाव में राजग में 42 दल शामिल हो चुके थे।
2019 में राजग के 21 दलों ने मिल कर चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा समेत 13 पार्टियां ही लोकसभा में सीटें जीतने में कामयाब रहीं| भाजपा को 303 और अन्य 12 दलों को 51 सीटें मिलीं थीं| पिछले दस साल में कई दल राजग छोड़कर गए और वापस भी लौटे हैं| लेकिन 2019 के बाद शिवसेना, जेडीयू, अकाली दल आदि कई दल राजग छोड़ चुके हैं।
यह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का रजत जयंती वर्ष है। इस बीच अब नरेंद्र मोदी खुद राजग के अध्यक्ष हैं, और अमित शाह संयोजक, लेकिन पिछले महीने यूपीए के विस्तार की भनक मिलते ही मोदी और अमित शाह को राजग मजबूत करने की सुध आई| उन्होंने आनन फानन में रूठ कर चले गए छोटे छोटे दलों से फिर संपर्क किया और उसी दिन 18 जुलाई को दिल्ली में राजग की बैठक की, जिस दिन यूपीए के नए अवतार आई.एन.डी.आई.ए ( इंडिया) की बैठक हो रही थी। इंडिया गठबंधन ने राजग के सामने बड़ी चुनौती पैदा कर दी है, क्योंकि जिन तीन दलों बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना, बादल के अकाली दल और जार्ज फर्नाडिस-नीतीश कुमार की जेडीयू (उस समय समता पार्टी) और टीडीपी के बाहरी समर्थन से 1998 में राजग की पहली सरकार बनी थी, वे सभी अब राजग से बाहर हैं।
18 जुलाई की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने 31 जुलाई से राजग के घटक दलों के सांसदों के साथ मेल मुलाकातों का सिलसिला शुरू किया, जो संसद सत्र के आख़िरी दिन 10 अगस्त तक जारी रहा, जिसमें राज्यवार सांसदों को बुलाकर बैठकें हुई। इन बैठकों में भाजपा के साथ राजग के सांसद भी शामिल हुए। जबकि इससे पहले हर संसद सत्र में मोदी भाजपा संसदीय दल की साप्ताहिक बैठक लेते थे, राज्यवार भाजपा सांसदों से मुलाकातें भी करते थे, लेकिन कभी राजग के घटक दलों के सांसदों के साथ कोई बैठक नहीं की थी। राजग के घटक दलों के सांसदों से मुलाकातों के दौरान मोदी और अमित शाह के अलावा राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और अन्य वरिष्ठ मंत्री भी क्षेत्र के हिसाब से मौजूद रहे।












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