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Assembly Elections: इंडी एलायंस का नेता बनने के लिए कांग्रेस का दो राज्य जीतना जरूरी

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि इन तीन राज्यों में से दो राज्य इस समय कांग्रेस के पास हैं। महत्वपूर्ण तो भाजपा के लिए भी है। लेकिन भाजपा के लिए कम महत्वपूर्ण है, क्योंकि भाजपा के पास अभी एक राज्य है मध्यप्रदेश। वह भी असल में वह पिछली बार हार गई थी। लेकिन 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा की झोली में डाल दिया था।

कांग्रेस तीनों में से दो राज्य हार गई तो कांग्रेस के लिए मुश्किल होगी। उसकी उम्मीदों पर पानी फिरेगा। भाजपा तीन में से दो राज्य जीत जाए, तो उसके लिए उपलब्धि होगी। एक भी जीते, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि जहां तक मोदी का सवाल है तो हमने पिछले चुनाव में भी देखा कि तीनों राज्य हार कर भी लोकसभा चुनाव में मोदी ने इन तीनों ही राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर दिया था।

Assembly Elections

उससे पहले भी देख चुके हैं कि लोकसभा चुनावों पर राज्य विधानसभा के चुनाव नतीजों का असर नहीं होता। लेकिन कांग्रेस अगर दो राज्य हार गई तो उसकी लोकसभा चुनावों की सारी रणनीति धरी रह जाएगी। खुद को दूसरों से बड़ा बताने के लिए कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में इंडी एलायंस के किसी दल से गठबंधन नही किया। अलबत्ता तीन महीनों के लिए इंडी एलायंस को बर्फ में डाल दिया।

नीतीश, अखिलेश और केजरीवाल मध्यप्रदेश में सीटें मांग रहे थे, लेकिन कांग्रेस ने तीनों को ठेंगा दिखा दिया। कांग्रेस की रणनीति यह है कि वह पांच में से तीन राज्य जीत जाए। तेलंगाना और मिजोरम में तो वह सोच भी नहीं रही। हालांकि तेलंगाना में कांग्रेस बीआरएस को कड़ी टक्कर दे रही है। इसके बावजूद कांग्रेस तीनों हिन्दी भाषी राज्यों पर ही दांव लगा कर बैठी है।कांग्रेस की रणनीति यह है कि अगर उसके मन मुताबिक़ नतीजे आए, तो वह क्षेत्रीय दलों को कहेगी कि वह अकेले भाजपा को हराने में सक्षम है।

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इसलिए सीटों के बंटवारे में उसका हक ज्यादा बनता है। लेकिन अगर कांग्रेस तीनों राज्यों या दो राज्यों में हार गई तो उत्तर भारत के सारे दल लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को ठेंगा दिखाएंगे। न केजरीवाल दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में भाव देंगे, न अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में भाव देंगे। न लालू और नीतीश बिहार में उतना भाव देंगे, जितनी उम्मीद कांग्रेस लगा कर बैठी है। इसलिए तीनों राज्य जीतना कांग्रेस के लिए ज्यादा मह्त्वपूर्ण हैं।

तीन महीने पहले तक कांग्रेस तीनों राज्यों में जीत रही थी। यह ओपिनियन पोल बता रहे थे। कांग्रेस ने इन्हीं ओपिनियन पोल को देख कर अखिलेश, केजरीवाल और नीतीश को भाव नहीं दिया। जबकि अब ओपिनियन पोल बदल चुके हैं। नए ओपिनियन पोल में भाजपा मध्यप्रदेश और राजस्थान जीत रही है। जबकि छत्तीसगढ़ में महादेव एप ने मुकाबला कड़ा कर दिया।
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मतदान हो चुका है। प्रधानमंत्री ने मतदान से एक दिन पहले ही राजस्थान में अपने चुनावी भाषण में इन दोनों राज्यों में जीत का दावा कर दिया। उन्होंने तो मुख्यमंत्री बघेल के हारने की भविष्यवाणी भी कर दी है। बघेल अपने चचेरे भाई विजय बघेल और अमित जोगी के साथ तिकोने मुकाबले में गए थे। अमित जोगी कांग्रेस के वोट काट कर विजय बघेल का रास्ता खोल रहे थे।

छत्तीसगढ़ में पिछली बार कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार में सरगुजा की बहुत भूमिका थी। यह टीएस सिंहदेव का इलाका है। उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने की उम्मीद थी। इसलिए 2018 में सरगुजा की सभी 17 सीटें कांग्रेस जीत गई थी। अब सरगुजा कांग्रेस के हाथ से खिसकता दिख रहा है, क्योंकि सोनिया गांधी ने वायदा करके भी उन्हें ढाई साल बाद सीएम नहीं बनाया।

मोदी ने चुनाव से दो दिन पहले यह कह कर आग में घी डाल दिया कि बघेल ने दस जनपथ में पैसे पहुंचा दिए थे। इसलिए टीएस सिंहदेव सीएम नहीं बन पाए। अब टीएस सिंहदेव खुद कह रहे हैं कि 17 में से सात-आठ सीटें जीत लेंगे। कुल मिलाकर इन सब बातों से जिस छत्तीसगढ़ को कांग्रेस का सुरक्षित किला बताया जा रहा था। उस छत्तीसगढ़ में भाजपा ने कांग्रेस को कड़ा मुकाबला दिया है।

प्रधानमंत्री मोदी की एक एक राजनीतिक चाल महत्वपूर्ण होती है। वह आगे की सोच कर कदम रखते हैं। उन्हें पता था कि इन दोनों राज्यों में 14 नवंबर को प्रचार खत्म हो जाएगा। लेकिन उन्होंने 15 को भी प्रचार का मौक़ा ढूंढ लिया। चुनाव से 24 घंटे पहले उन्होंने झारखंड में बिरसा मुंडा की जयंती पर जाने का प्रोग्राम बना रखा था। वहां जाकर उन्होंने 24 हजार करोड़ की परियोजनाओं का राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक मार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे कांग्रेस ने द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने का विरोध किया था। भाजपा मानती है कि इससे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के आदिवासी वोटरों पर गहरा प्रभाव पड़ा होगा।

अब वोटिंग से अंदाज लगाना मुश्किल हो गया है। पहले माना जाता था कि अगर पिछले चुनाव के मुकाबले वोट प्रतिशत बढ़ा है, तो सत्ता परिवर्तन होगा। लेकिन मध्यप्रदेश में 2003 से ले कर इस बार तक वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी देखी गई। इसके बावजूद 2008 और 2013 में भाजपा जीती। 2018 में जब किसी को बहुमत नहीं मिला था, तब उसकी सीटें जरुर घटीं, लेकिन उसका वोट प्रतिशत कांग्रेस से आधा प्रतिशत ज्यादा था। इस बार भी 2018 के मुकाबले करीब आधा प्रतिशत वोट बढ़ा है। 2018 में 75.6 प्रतिशत वोटिंग हुई थी, जबकि इस बार 76.2 प्रतिशत वोटिंग हुई है। छत्तीसगढ़ में 2018 में 76.45 प्रतिशत वोटिंग हुई थी, जबकि इस बार 75.72 प्रतिशत हुई है, यानि 0.73 प्रतिशत कम वोटिंग हुई।

मध्यप्रदेश जहां पिछली बार आधा प्रतिशत कम वोट के बावजूद भी भाजपा की सीटें कांग्रेस से पांच कम रह गई थी, वहां आधा प्रतिशत वोटिंग ज्यादा हुई है। छत्तीसगढ़ जहां पिछली बार भारी बहुमत से कांग्रेस ने भाजपा से सत्ता छिनी थी, जहां वोटिंग पौन प्रतिशत कम हुई है। ये आंकड़े और कुछ दिखाए या न दिखाएं, इतना संकेत जरुर देते हैं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का पलड़ा भारी है और मध्यप्रदेश में कांटे की टक्कर है।

राजस्थान में वोटिंग 25 नवंबर को है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने राजस्थान में डेरा डाल लिया है। उधर मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा, योगी आदित्यनाथ, हेमंत बिस्व सरमा, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और स्मृति ईरानी की लंबी चौड़ी फ़ौज उतार दी है। मायावती भी बसपा उम्मीदवारों के प्रचार के लिए पहुंच चुकी है। मायावती अपने भाषणों में कांग्रेस पर हमलावर हो रही है, भाजपा पर नही। संकेत साफ़ है कि वह भाजपा के प्रति सॉफ्ट है।

राजस्थान में भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है। तय है कि कांग्रेस ने दो राज्य नहीं जीते तो वह इंडी एलायंस में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी। प्रधानमंत्री मोदी का कान्फिडेंस लेवल ऊंचा है। वोटिंग शुरू होने से 24 घंटे पहले ही उन्होंने ट्विट करके मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में जीत की गारंटी दे दी। जबकि राजस्थान में वहां के लोगों से जीत की गारंटी मांग रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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