Amit Shah in MP: मध्य प्रदेश में नेता पर नहीं, कार्यकर्ताओं पर जोर

Amit Shah in MP: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का एक माह में तीसरा मध्य प्रदेश दौरा अहम हो गया क्योंकि रविवार को उन्होंने इंदौर में विजय संकल्प कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत के बहाने प्रदेश में चुनाव प्रचार का विधिवत आगाज कर दिया। साथ ही दिग्गज भाजपाइयों की उपस्थिति में अपने भाषण में कार्यकर्ता को सबसे महत्त्वपूर्ण बताते हुए "चेहरे" की बजाय कार्यकर्ताओं के भरोसे चुनाव मैदान में उतरने पर पूरा जोर दिया है।

उनके इंदौर दौरे से यह भी तय हो गया है कि भाजपा लोकसभा चुनाव तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और चेहरे पर लड़ेगी किंतु राज्यों में वह चेहरे के स्थान पर कार्यकर्ताकृत चुनाव लड़ेगी। मुख्यमंत्री का निर्णय चुनावी जीत के बाद किया जाएगा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय सहित अन्य वरिष्ठ भाजपा पदाधिकारियों के सामने शाह ने साफ कहा कि, "भाजपा को चुनाव बूथ पर बैठा कार्यकर्ता जिता सकता है।" प्रदेश में चुनाव जीतने का आधार कार्यकर्ताओं को बताते हुए उन्होंने कहा कि "आज यहां से संकल्प लेकर जाना है कि प्रचंड बहुमत के साथ 2023 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाना है तथा 2024 में लोकसभा की सभी 29 सीटें जीतकर मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाना है"।

Amit Shah in Madhya Pradesh bjp focus on workers instead leaders

चूंकि बीते कई माह से मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बदलने की अफवाह उड़ती रही है अतः कार्यकर्ताओं में भी संशय की स्थिति थी। इस अफवाह से भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी गरमा रही थी और वरिष्ठ नेताओं के बीच के मतभेद भी सार्वजनिक हो रहे थे। इंदौर में शाह की "कार्यकर्ता प्रमुख" की हुंकार ने न सिर्फ मध्य प्रदेश में बल्कि निश्चित रूप से पड़ोसी राज्य राजस्थान भाजपा में भी संभावित मुख्यमंत्री चेहरों को निराश कर दिया है।

इसके अलावा शाह ने विजय संकल्प कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करने के बाद जब पार्टी पदाधिकारियों की बैठक ली तो उससे विधायकों और सांसदों को दूर रखा गया। बैठक में चुनिंदा प्रदेश पदाधिकारी, जिला अध्यक्ष, प्रभारी और महामंत्रियों से चर्चा कर शाह ने चुनावी रणनीति बताई। शाह के इस प्रकार पार्टी पदाधिकारियों के साथ बंद कमरे में बैठक करने से उन विधायकों व सांसदों का फीडबैक मिला है जिनके बारे में पार्टी को लगातार नकारात्मक अथवा क्षेत्र में कमजोर पकड़ की जानकारी मिल रही थी। विधानसभा चुनाव में अपनी दावेदारी सुनिश्चित मान कर चल रहे वर्तमान विधायक शाह की इस कार्यपद्धति से अब संशय की स्थिति में हैं।

यह भी संयोग था कि अमित शाह के इंदौर दौरे के दिन ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ भी शहर में थे जहां उन्होंने वनवासी समाज, महिला समूहों और पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठकें लीं। एक ओर जहां अमित शाह ने दिग्विजय सिंह को मिस्टर बंटाधार और कमलनाथ को करप्शन नाथ कहा, वहीं दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश के नेताओं की अकर्मण्यता पर निशाना साधते हुए कह डाला कि भाजपा के लिए अब प्रदेश अमित शाह के भरोसे पर है। दिग्विजय सिंह ने अमित शाह की इंदौर यात्रा के बहाने मणिपुर का मुद्दा उछालते हुए उन पर तंज भी कसे। इस दौरान कमलनाथ के साथ कन्हैया कुमार ने भी मंच साझा किया। जाहिर है, ऐसे में इंदौर से ही कांग्रेस के चुनाव प्रचार की भी विधिवत शुरुआत हो गई है।

उज्जैन-इंदौर संभाग अर्थात मालवा-निमाड़ क्षेत्र भाजपा के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण बन गया है। इस क्षेत्र में मालवा-निमाड़ की 66 विधानसभा सीटें आती हैं जिसमें इंदौर संभाग के 8 जिलों की 37 सीटों सहित उज्जैन संभाग के 7 जिलों की 29 सीटें सम्मिलित हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 20 साल के इतिहास का सबसे अधिक नुकसान यहीं हुआ था। तब भाजपा ने 27 सीटें और कांग्रेस ने 36 सीटें जीती थीं। 03 सीटें अन्य के खाते में गई थीं। हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ जिन 22 विधायकों ने भाजपा में एंट्री ली थी उससे वर्तमान में भाजपा की विधानसभा सीटों की संख्या में 03 अंक का इजाफा किया है। 2003 में दिग्विजय सिंह की सरकार को हटाकर भाजपा ने प्रदेश में जो परचम बुलंद किया है उसके पीछे मालवा-निमाड़ क्षेत्र ही है जिसने 15 वर्षों तक भाजपा को मजबूती प्रदान की जिससे लगातार 3 बार भाजपा की सरकार बनी।

दरअसल, वर्तमान में वनवासी बहुल इस क्षेत्र में कांग्रेस के साथ भाजपा को जयस की चुनौती से भी दो-चार होना पड़ रहा है। वनवासी समुदाय के लिए आरक्षित 22 सीटें अब भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई हैं क्योंकि पिछले 2 साल से पार्टी का फ़ोकस इन्हीं सीटों पर सर्वाधिक रहा है। झाबुआ, अलीराजपुर, धार सहित अन्य जिलों में पेसा एक्ट, सिकल सेल, लाड़ली बहना, लाड़ली लक्ष्मी, मुख्यमंत्री भू-अधिकार, सीखो कमाओ योजना जैसी योजनाओं से ग्रामीण सीटों को साधने का प्रयास हो रहा है क्योंकि शहरी क्षेत्र में पार्टी को अपनी संभावनाएं बेहतर नजर आ रही हैं।

राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने हाल ही में इन जिलों में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। चूंकि इंदौर उनका गृह और राजनीतिक कर्म क्षेत्र है अतः उनकी सक्रियता से पार्टी को लाभ होने की संभावना अधिक है। अमित शाह का इंदौर के विजय संकल्प कार्यकर्ता सम्मेलन में आना भी मालवा-निमाड़ के कार्यकर्ताओं में जोश भरना है ताकि पार्टी की खोई राजनीतिक जमीन वापस पाई जा सके।

इसके अलावा अमित शाह का इंदौर आकर भगवान परशुराम की जन्मस्थली जानापाव जाना और वहां नवनिर्मित मंदिर में पूजा-अर्चना करना क्षेत्र के ब्राह्मण मतदाताओं को साधने का काम कर गया। चूंकि पिछली बार प्रदेश के ब्राह्मण मतदाता शिवराज सिंह चौहान के "माई का लाल" बयान से नाराज थे जिसकी क़ीमत सत्ता गँवाने से चुकाई गई थी अतः इन्हें साधना भी आवश्यक था। यानि शाह ने अपने एक दिन के इंदौर दौरे से कई सियासी तीर एक बार में साध लिए हैं। अब इसका कितना असर चुनाव में दिखेगा, यह परिणाम बता ही देंगे। फ़िलहाल तो अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा फ्रंटफुट पर आकर चुनाव के लिए कमर कस चुकी है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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