Aligarh Muslim University: अल्पसंख्यकों का संस्थान नहीं है अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी
आमतौर पर अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी को अल्पसंख्यकों की युनिवर्सिटी समझा जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। संविधान सभा की बहस हो या सुप्रीम कोर्ट का फैसला। सबने एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान मानने से इंकार ही किया है।

Aligarh Muslim University: अलीगढ़ मुस्लिम विवि को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान के अन्तर्गत रखकर संबोधित किया जाता है। ऐसी खबर भी पिछले साल आई थी कि एएमयू के स्नातक और स्नातकोत्तर पाठयक्रमों में नामांकन के लिए संयुक्त विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) लागू करने की कोई योजना नहीं है। उसकी अपनी अलग प्रवेश परीक्षा कराने की योजना है।
अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय को अनिवार्य तौर पर कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट अपनाने के लिए पत्र लिखा है। हालांकि एएमयू ने सीयूईटी-2023 में भाग लेने का विकल्प चुन लिया है। लेकिन एएमयू को कथित तौर पर मिले अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर या फिर अल्पसंख्यक होने से जुड़े अधिकारों को लेकर अक्सर बहस छिड़ जाती है।
यदि हम इतिहास में जाकर देखे तो संविधान सभा के मुस्लिम सदस्यों ने भी एएमयू के संबंध में कभी 'अल्पसंख्यक' शब्द का जिक्र नहीं किया है। दरअसल, 20वीं सदी की शुरुआत में मुस्लिम समुदाय के कुछ नेता एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए प्रयासरत थे। वे चाहते थे कि इसके अंतर्गत स्कूल-कॉलेज खुलें, विश्वविद्यालय का प्रशासन और इसका संचालन मुसलमानों के हाथों में रहे, जबकि सरकार इसकी डिग्रियों को मान्यता दे।
इन मांगों को लेकर मुस्लिम प्रतिनिधियों की ब्रिटिश सरकार के साथ लंबी बातचीत चली। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने स्पष्ट कह दिया कि ऐसे किसी भी विश्वविद्यालय की स्थापना संसद की केंद्रीय विधायिका समिति में पारित कानून के आधार पर ही होगी। इसका प्रशासन सरकार के हाथों में रहेगा व पारित कानून के तहत इसका संचालन होगा। आजादी के बाद 1951 और 1965 में एएमयू कानून में कुछ अहम संशोधन किए गए, जिसे मुस्लिम प्रतिनिधियों ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। न्यायालय ने उनकी याचिकाओं को खारिज करते हुए विवाद के बिंदुओं की स्पष्ट व्याख्या कर दी। उसके बावजूद कांग्रेस की सरकार ने मुस्लिम तुष्टीकरण का दांव चल दिया।
कांग्रेस का तुष्टीकरण
1981 में देश में कांग्रेस सरकार थी। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। कांग्रेस की इस आपातकाल वाली सरकार ने पहली बार मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए असंवैधानिक तरीके से एएमयू कानून में संशोधन किया और बाद में मुस्लिम छात्रों को 50 प्रतिशत आरक्षण की मंजूरी भी दे दी। 2009-10 में संप्रग सरकार ने मालापुरम् (केरल), मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल), किशनगंज (बिहार) और औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में एएमयू के चार नए कैंपस खोलने का निर्णय लिया था। 30 जनवरी 2014 को संप्रग के कार्यकाल में किशनगंज में 250 एकड़ में फैली एएमयू की शाखा खोली गई। इसकी नींव सोनिया गांधी ने रखी थी।
ब्रिटिश सरकार के सामने मुसलमानों की एक ना चली
1915 के बीएचयू कानून के अंतर्गत 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना के बाद एक बार फिर मुस्लिम समुदाय व भारत सरकार के बीच बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई। हरकोर्ट बटलर (वायसराय की कार्यकारी समिति में शिक्षा विभाग के सदस्य) ने राजा महमूदाबाद (मुस्लिम फाउंडेशन समिति) को स्पष्ट किया कि बीएचयू की स्थापना व प्रशासन के संबंध में लागू होने वाली सभी शर्तें एएमयू पर भी लागू होंगी। आखिरकार 1916-17 में मुस्लिम समुदाय ने ब्रिटिश सरकार की यह शर्त मान ली कि विश्वविद्यालय का संचालन सरकार ही करेगी।
सारे अधिकार संसद के पास
एएमयू की स्थापना संसद के एक कानून के अंतर्गत हुई जिसके आधार पर उसके प्रशासन पर भारत सरकार का एकाधिकार रहेगा और मुस्लिम समुदाय इस कानून में बदलाव नहीं कर सकेगा। इस संबंध में सभी अधिकार संसद के पास हैं। एएमयू के लिए हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों ने पैसा और जमीन दी थी। सबसे अधिक चंदा महाराजा विजयनगरम, बेसवान के ठाकुर गुर प्रसाद सिंह, बिजनौर के कुंवर जगजीत सिंह, मुजफ्फरनगर के रायशंकर दास, पटियाला के महाराजा राजा हरिकिशन सिंह, दरभंगा के महाराजा और महाराजा महेंद्र प्रताप सिंह आदि ने दिया था।
एएमयू कानून में पहला संशोधन
आजादी के बाद तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू सरकार में शिक्षा मंत्री रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1951 में एएमयू कानून में दो संशोधन किए थे। इसमें 'मुस्लिम विद्यार्थियों के मामले में इस्लाम की ताकीद को अनिवार्य बनाने' और 'मुसलमान के अलावा अन्य किसी पंथ वाले को यूनिवर्सिटी कोर्ट का सदस्य नहीं बनाने' के प्रावधान को रद्द कर दिया गया था। (इससे मिलते-जुलते संशोधन बीएचयू कानून में भी किए गए)। साथ ही, अनुच्छेद-8 जोड़ा गया, जिसमें कहा गया कि एएमयू सभी लिंग, वर्ण, जाति एवं वर्ग के लोगों के लिए खुला है। डॉ. जाकिर हुसैन ने मौलाना आजाद के इस प्रस्ताव का समर्थन किया व संसद में बहस के दौरान इसे 'स्वागत योग्य कदम' कहा।
मुस्लिम लामबंद, नहीं झुकी सरकार
एएमयू कानून में दूसरी बार संशोधन का प्रस्ताव 2 सितंबर, 1965 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मो. करीम छागला ने संसद के समक्ष रखा, जो बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी रह चुके थे। पर प्रस्ताव पर संसद में बहस हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संसद में कहा था- ''एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। न ही एएमयू की स्थापना और उसका संचालन मुस्लिम समुदाय द्वारा किया जा रहा है। एएमयू की स्थापना कानून के अंतर्गत हुई थी। यह हमारे संविधान में संघीय सूची में 63वें स्थान पर है। केंद्रीय विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों को संसद द्वारा कानून के दायरे में लाया जा सकता है। इसलिए मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि किस आधार पर इसके प्रशासन को अल्पसंख्यकों के हाथों में माना जाता है।''
सरकार के रुख को अदालत में चुनौती
एएमयू कानून में 1951 और 1965 में भारत सरकार द्वारा किए गए संशोधनों से असंतुष्ट मुस्लिम नुमाइंदों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इस संबंध में मुस्लिम नुमाइंदों ने न्यायालय में पांच याचिकाएं दायर कीं। उनका कहना था कि अनुच्छेद-31 के तहत एएमयू एक अल्पसंख्यक संस्थान है और संसद को एएमयू कानून में बदलाव करने का कोई अधिकार नहीं है। अनुच्छेद-31 में कहा गया है कि पंथ या भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यकों को उनकी अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और उनका संचालन करने का अधिकार है।
एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं: सर्वोच्च न्यायालय
इस पर मुख्य न्यायाधीश के.एन. वांचू की अगुआई वाली पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मति से 20 सितंबर, 1967 को फैसला सुनाया। इस पीठ में न्यायमूर्ति आर.एस. बछावत, न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी, न्यायमूर्ति जी.के. मित्तर और न्यायमूर्ति के.एस. हेगड़े शामिल थे। सर्वोच्च अदालत ने मुस्लिम प्रतिनिधियों द्वारा दाखिल याचिकाओं को खारिज करते हुए फैसला दिया- एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है और इस केंद्रीय विश्वविद्यालय पर संविधान का अनुच्छेद 31 लागू नहीं होता। एएमयू की स्थापना संसद के एक कानून के अंतर्गत हुई थी और इसका संचालन एएमयू कानून के प्रावधानों के तहत किया जा रहा है। यह संभव नहीं कि मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा किसी वि.वि. की नींव रखी जाए, जिसकी डिग्रियों को सरकारी मान्यता दी जाए। इसलिए ऐसा ही माना जाएगा कि एएमयू को केंद्रीय विधानमंडल और भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया था। (एआईआर 1968 एससी 662, अनुच्छेद 26) अत: एएमयू कानून में संशोधन असंवैधानिक नहीं हैं और अनुच्छेद-30 एएमयू पर लागू नहीं होता। संसद को एएमयू कानून में संशोधन करने का अधिकार है।
एएमयू कानून में संशोधनों को तीन प्रधानमंत्रियों -जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी का पूरा समर्थन हासिल था। इसलिए जब मौलाना आजाद और मो. करीम छागला ने एएमयू कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा और सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्षा रखा था तो इंदिरा गांधी ने छागला को पूरा सहयोग दिया था। बाद में 1972 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री नुरुल हसन ने भी एएमयू कानून में संशोधन किए।
उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। नुरुल हसन ने संसद में कहा था - ''यह एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है। यह न तो कोई अल्पसंख्यक संस्थान है और न मजहबी संस्थान है। एएमयू को मजहबी शैक्षणिक संस्थान का दर्जा देने की न तो अतीत में कोई मंशा थी और न आज कोई विचार है।'' 1979 में जब जनता दल की सरकार आई तो एएमयू कानून में और बदलाव किए गए। मोरारजी देसाई उस समय प्रधानमंत्री थे और प्रताप चंदर शिक्षा मंत्री। श्री चंदर ने कहा था, ''हमें सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का आदर करना चाहिए।''
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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