Adipurush Film: इतिहास में दर्ज होने का अवसर चूक गयी आदिपुरुष फिल्म

Adipurush Film: दर्शकों की नाराजगी के बाद आदिपुरुष के निर्माता निर्देशक फिल्म के कुछ डॉयलाग बदलने को तैयार हो गये। तेल तेरे बाप वाला डॉयलॉग बदल भी दिया। लेकिन इसके डॉयलॉग और प्रस्तुति से इतर इस फिल्म के पास इतिहास में दर्ज होने का एक अवसर था, जिसे "आदिपुरुष" की टीम ने अपने हाथों से मिट्टी में मिला दिया है। इस फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद जो गालियाँ पड़ रही हैं, ये तो उसी घमंड का नतीजा है, जिसके कारण बताये जाने पर भी बदलाव नहीं किये गए थे। बॉलीवुड उर्फ़ उर्दूवुड जो पहले से ही हिन्दुओं के प्रति दुर्भावना रखने के अभियोग झेल रहा है, उसने इस फिल्म से अपना और नुकसान कर लिया है। आने वाले समय में इसका दंड पूरी इंडस्ट्री को भोगना होगा।

अंग्रेजी भाषा की एक कहावत में कहा जाता है कि अगर आप डोरमैट जैसा बर्ताव करेंगे, तो लोग भी आपका इस्तेमाल जूते पोंछने के लिए ही करेंगे। कहावत को समझने के लिए एक पुरानी फिल्म "मुगले आजम" का उदाहरण लिया जा सकता है। इस फिल्म में एक मामूली से किरदार में एक मूर्तिकार होता है। एक दृश्य में जब मूर्ति समय से बनी नहीं होती है तो सुनाई देता है, "वो तीर ही क्या संगतराश, जो दिल के पार न हो। वो बुत ही क्या जिसके आगे मग़रूर सर खुद न झुक जाएं।" जवाब में संगतराश कहता है - "तो फिर मैं एक ऐसा बुत बनाऊंगा, जिसके क़दमों में सिपाही अपनी तलवार, शहंशाह अपना ताज और इंसान अपना दिल निकालकर रख दे।" एक आध दृश्यों में मुश्किल से दिखे संगतराश के हिस्से में ऐसे संवाद आये थे। ऐसा भी नहीं था कि "मुगले आजम" जब आई थी तो भारत की भाषा कोई बड़ी नफ़ीस उर्दू थी। हिंदी का दौर आ चुका था, फिल्मों में भी वही चलती थी।

Adipurush film missed the opportunity to be recorded in history

ये हमें इस बात पर ले आता है कि फ़िल्में आखिर बेचती क्या हैं? क्या केवल मनोरंजन परोसा जाता है? नहीं, फ़िल्में सपने बेचती हैं। वो दबी हुई आकांक्षाएं जो कभी आर्थिक तो कभी दूसरी मजबूरियों से पूरी नहीं हो पाती, या नहीं हो सकती, दर्शक उन्हीं को फिल्म के तीन घंटे में जीता है। अगर ये न होता तो फिर क्यों "आशिकी" जैसी फिल्मों के साथ ही "पैरेलल पेंट" का फैशन आता? क्यों लोग संजय दत्त या शाहरुख़ खान के स्टाइल के बाल कटवाने लगते? साधना कट और बॉब कट हो या अनारकली सूट का फैशन, सब फिल्मों से ही तो आया था।

विपरीत सी आर्थिक स्थितियों वाले युवक-युवती का प्रेम, दस-बीस गुंडों को अकेले धूल चटा देता नायक, सब ऐसी ही बातें हैं जो आम जीवन में संभव नहीं। दर्शक फिल्मों के नायक में स्वयं को देखकर इन्हें जीता है। जिस फिल्म के नायक-नायिका में दर्शक स्वयं को नहीं देखते, वो फिल्में भी नहीं चलती, ये भी स्वाभाविक है। "मुगले आजम" जैसी फिल्मों की अपार सफलता का कारण यही था कि उसे देखकर निकला कोई गरीब मजदूर भी फिल्म की बादशाह अकबर वाली भाषा में बात करता नजर आ जाता। "आदिपुरुष" बनाने निकली टीम यही बात भूल गयी।

"मुगले आजम" के दशकों बाद बनी "जोधा-अकबर" की भाषा उसके संवाद तो देखे होंगे? आज का युवा अकबर से "आइडेंटिफाई" कर सके, इसके लिए उसमें अकबर या उसके दरबारी टपोरियों सी भाषा में बोलने लगते हैं क्या? चूँकि नहीं बोलते इसलिए शादी-ब्याह में दूल्हे के मंडप में जाते समय अक्सर आज भी "अजीमो शान शहंशा..." का संगीत बजता सुनाई दे जाता है। अकबर जैसे छोटे-मोटे बादशाहों से जब छेड़खानी नहीं होती तो "आदिपुरुष" में जिसे दिखाने का प्रयास हो रहा था, वो तो सीधे मर्यादापुरुषोत्तम राम थे, हनुमान जी थे, माता सीता थीं। पता नहीं किस अहंकार में अपने लिखे संवादों को ही अंतिम सत्य और अपने दिखाए दृश्यों को ही स्वीकार्य मान बैठी थी "आदिपुरुष" की टीम!

इन्हें छोड़ दिया जाए तो फिल्मों से और भी काफी कुछ होता है। "मुगले आजम" का ही उदाहरण लेने का एक बड़ा कारण "मुगले आजम" द्वारा गढ़ा गया कथानक भी है। एक ऐसी फिल्म के सफल होने के दूरगामी प्रभाव होते हैं। उदाहरण के तौर पर संतान न होने पर अजमेर के चिश्ती के पास हाजिरी लगाना जो इस फिल्म से गढ़ा गया, उसका असर आप आज ये देखते हैं कि हर वर्ष स्वयं प्रधानमंत्री कार्यालय से दरगाह के लिए चादर भेजी जाती है। एक सेक्युलर सरकार, जो इन संस्थाओं से न तो कोई टैक्स ले रही है, न कोई ज़कात आदि का हिसाब-किताब मांगती है, उसे भला इस संस्था को चादर क्यों भेजनी है? क्योंकि फिल्मों ने इसकी स्वीकार्यता बना दी। इसकी तुलना में जिन मंदिरों पर सरकारी कब्ज़ा है, जिनकी भूमि और अन्य संपत्ति सरकारें समय समय पर बेचती या अन्य "सेक्युलर" कार्यों में प्रयोग करती हैं, उन्हें क्या भेजा जाता है? कुछ भी नहीं।

इतिहास पर इस फिल्म से गढ़े कथानक (नैरेटिव) का जो असर हुआ, उसकी तो बात की ही जानी चाहिए। इतिहास के हिसाब से न तो अनारकली का कोई प्रमाण मिलता है, न किसी जोधाबाई का। सलीम की माँ का नाम मरियम उल जमानी था। आज किसी ऐसे व्यक्ति को, जो स्नातक स्तर पर इतिहास का छात्र रहा हो, उसे संभवतः ये पता होगा लेकिन भारत के आम नागरिक, जिनमें करीब पचास प्रतिशत ही शिक्षित होंगे, उनके लिए फिल्म ने जोधाबाई नाम का इतिहास गढ़ दिया है। इस एक बात को सुधारने में अब दशकों का प्रयास लगेगा।

मुग़ल कोई बड़े रहमदिल शासक नहीं, बल्कि विदेशी आक्रान्ता थे, ये समझाना हो तो प्रेम के लिए बाप के खिलाफ विद्रोह करने वाले सलीम की छवि आड़े आएगी। जबकि सत्य यह है कि अकबर ने करीब 50 वर्ष शासन किया, और जब सलीम को लगने लगा कि ऐसे तो उसे बुढ़ापे में राज-पाट मिलेगा, जिसका शराबी सलीम भोग नहीं पाता। ऊपर से अब्दुल रहीम खानेखाना जैसे लोग खुसरौ के अगला बादशाह बनने के समर्थन में थे। इसलिए उसने विद्रोह किया और अकबर से हारा। बाद में जब सलीम ने सत्ता हथियाई और अपना नाम जहाँगीर रख लिया तो उसने रहीम के बेटों को कत्ल भी करवा डाला था। वो कहीं से भी कोई रहमदिल शासक नहीं था, बाकी मुगलों जितना ही क्रूर था।

एक ढंग की फिल्म बनाकर अकबर-सलीम को रहमदिल, आशिक, सेक्युलर इत्यादि सिद्ध कर दिया गया। बिलकुल ऐसा ही श्री राम का भव्य चित्रण करने का अवसर "आदिपुरुष" के ज़रिये भी मिला था। लेकिन जहाँ एजेंडा पर फ़िल्में बनाने वालों के पास रीढ़ की हड्डी थी, वहीँ "आदिपुरुष" का कथानक, उसके संवाद लिखने वालों के पास उतना साहस ही नहीं था कि श्री राम, हनुमान जी, या माता सीता को उसी रूप में दिखा पाते, जिस रूप में आम हिन्दू उन्हें देखता है। सोने की लंका वाले, अत्यंत बलशाली राक्षसराज रावण से अपनी पत्नी को छुड़ाने कोई वनवासी निकल पड़े, जिसके पास न राज्य है, न धन-कोश, न कोई सेना, ये अतुलनीय साहस का कृत्य था।

दूसरी ओर रावण जैसे दुराचारी की कैद में पड़ी कोई स्त्री उसे इस विश्वास पर दुत्कार दे कि उसका पति पीछे आ ही रहा होगा और रावण का वध करके भी उसे मुक्त करा लेगा ये अतुलनीय विश्वास, अद्वितीय प्रेम का उदाहरण है। इस पर जो फिल्म बने उसके "लार्जर दैन लाइफ" होने की अपेक्षा अगर दर्शक करता है, तो कोई बहुत बड़ी आकांक्षा पाल ली थी क्या?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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