क्या दुनिया में खाना अब कभी सस्ता नहीं होगा?

यूक्रेन और रूस दुनिया में गेंहू की आपूर्ति का करीब एक तिहाई जुटाते हैं

नई दिल्ली, 10 मई। इस साल मार्च में गेहूं की कीमत बीते 14 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई. वहीं मक्के ने तो ऊंची कीमत के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. 'इंटरनेशनल पैनल ऑफ एक्सपर्ट्स ऑन सस्टेनेबल फूड सिस्टम' यानी आईपीईएस ने एक रिपोर्ट में ये जानकारी दी है. इसकी वजह से जो मुख्य उपज है, वह या तो बहुत महंगी हो गई है या फिर कई देशों में आसानी से मिल नहीं रही. खासतौर से गरीब देशों के परिवारों को.

जलवायु परिवर्तन, व्यापक रूप से मौजूद गरीबी और युद्ध अब साथ मिलकर दुनियाभर में खाने-पीने की चीजों के लिए "खास इलाकों में और व्यापक पैमाने" पर खतरा पैदा कर रहे हैं. आईपीईएस का कहना है कि इसका एक मतलब यह भी है कि अगर खतरों को रोकने के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो यही ऊंची कीमतें हमेशा के लिए रह जाएंगी.

इसके लिए न सिर्फ उत्सर्जन को तेजी से घटाना होगा, ताकि जलवायु परिवर्तन को सीमित किया जा सके. बल्कि, मुनाफाखोरी और जमाखोरी से निबटने के साथ ही कर्ज में राहत, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता, कारोबार में बदलाव और राष्ट्रीय अनाज भंडारों को बढ़ाना होगा.

आईपीईएस के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन चीजों की अनदेखी हुई, तो दुनिया खुद को "विनाशकारी और सुनियोजित भोजन संकट के भविष्य की तरफ जाते देखेगी."

मार्च में गेंहू की कीमत 14 साल के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गई

खाने पीने की चीजें इतनी महंगी क्यों हैं?

दुनिया के कुल उत्पादन का 30 फीसदी गेहूं रूस और यूक्रेन में पैदा होता है, लेकिन युद्ध के कारण यह हिस्सेदारी घट गई है. जिन देशों में गेहूं पैदा होता है और वहीं खाया जाता है, उनके यहां गेहूं का भंडार भरा हुआ है. लेकिन, यूक्रेन और रूस से निर्यात में कमी के कारण वैश्विक बाजार में बाकी बचे गेहूं के लिए होड़ मची हुई है. इसकी वजह से कीमतें बढ़ रही हैं. अब ये बढ़ी हुई कीमतें गरीब और कर्ज में डूबे ऐसे देशों के लिए संकट बढ़ा रही हैं, जो आयात पर निर्भर हैं.

यह भी पढ़ेंः इंडोनेशिया ने पाम ऑयल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया

अफ्रीका करीब 40 फीसदी गेहूं का आयात यूक्रेन और रूस से करता है. दुनिया में गेहूं की बढ़ती कीमतों ने लेबनान में इसके भाव 70 फीसदी बढ़ा दिए हैं. हालांकि, कीमतें बढ़ने की वजह सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध ही नहीं है. गेहूं के साथ-साथ मक्का, चावल और सोयाबीन की कीमतें भी बढ़ गई हैं, क्योंकि खरीदार वैकल्पिक अनाजों की ओर मुड़ रहे हैं.

कहीं बाढ़ के कारण फसलें बर्बाद हो रही हैं तो कहीं सूखे की वजह से

युद्ध को देखते हुए आर्थिक मुनाफाखोरों ने अनाजों के व्यापार में हाथ डाल दिया है. कृत्रिम रूप से कीमतें बढ़ाई जा रही हैं, क्योंकि वे बाजार की अनिश्चितता का फायदा उठाना चाहते हैं. जी-7 देशों के कृषि मंत्रियों ने इसकी बाकायदा शिकायत की है.

कनाडा के वाटरलू यूनिवर्सिटी में खाद्य सुरक्षा की विशेषज्ञ प्रोफेसर जेनिफर क्लाप कहती हैं कि 2007-2008 और 2011-2012 में खाने-पीने की चीजों की कीमतों के संकट के बाद, "सरकारें अत्यधिक मुनाफाखोरी को रोकने और कमोडिटी मार्केट और भोजन के भंडारों में पारदर्शिता लाने में नाकाम रहीं." उन्होंने यह भी कहा कि अगर दुनिया आने वाले वर्षों में खाने-पीने के सामान की कीमतों में स्थिरता चाहती है, तो इस समस्या का तुरंत समाधान करना होगा, क्योंकि जलवायु परिवर्तन, युद्ध और दूसरी वजहें खतरा बढ़ा रही हैं.

क्या ज्यादा उपज से नहीं बढ़ा सकते आपूर्ति?

गेहूं की खेती करने वाले कुछ देश पहले ही पैदावार बढ़ा रहे हैं. भारत ने तो बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए निर्यात बढ़ाने का वादा भी किया है. हालांकि, भारत में इस साल जो लपट भरी लू चल रही है, उसकी वजह से गेहूं की पैदावार में कमी हो सकती है.

पैदावार बढ़ाने की कोशिशों में रासायनिक उर्वरकों की कमी से भी समस्या पेश आएगी. पिछले साल पूरी दुनिया में पोटाश के कुल निर्यात का 40 फीसदी केवल रूस और बेलारूस से आया था. इस पर भी युद्ध के कारण बुरा असर पड़ा है.

यह भी पढ़ेंः युद्ध और जलवायु संकट से गुजर रही दुनिया का पेट भर सकता है यह अनाज

सूखा, गर्म हवाएं, बाढ़ और नए हानिकारक कीटों के रूप में दुनिया के किसानों के सामने कई चुनौतियां हैं, जो भरोसेमंद उपज की राह में बाधा बन रही हैं. जाहिर कि यह समस्या धरती को गर्म करने वाले उत्सर्जनों को और बढ़ाएगी ही.

इतना ही नहीं, गेहूं, मक्का और चावल की उपज बढ़ाने के लिए जमीन भी सीमित ही है. खेती की जमीन बढ़ाने का नतीजा अक्सर ब्राजील जैसे देशों में जंगलों की कटाई के रूप में सामने आता है. जबकि जलवायु को स्थिर रखने के लिए यही जंगल सबसे ज्यादा जरूरी हैं.

थिंक टैंक चाथम हाउस में पर्यावरण और समाज कार्यक्रम के शोध निदेशक टिम बेनटन कहते हैं कि प्रकृति की रक्षा, अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल और कार्बन को जमा करने की कोशिशों के बीच सीमित जमीन के कारण इस शताब्दी में वे रणनीतिक वैश्विक संपदा बन गए हैं. बेनटन ने यह भी कहा कि यूक्रेन की खेती वाली और ज्यादा जमीन और भविष्य के वैश्विक खाद्य बाजार को नियंत्रित करने की इच्छा भी यूक्रेन युद्ध का एक कारण हो सकती है.

अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक दुनिया के कई देशों में भोजन का संकट है

भोजन को किफायती कैसे रखा जा सकता है?

दुनिया में अनाज का एक बड़ा हिस्सा मवेशियों की भूख मिटाने में भी खर्च होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों को मांस और डेयरी उत्पाद कम खाने के लिए तैयार करके अनाज की आपूर्ति नाटकीय रूप से बढ़ाई जा सकती है.

इस साल वैश्विक स्तर पर अनाज के निर्यात में 2.0-2.5 करोड़ टन की कमी आ सकती है. हालांकि, अगर केवल यूरोपवासी ही जानवरों से मिलने वाले अपने भोजन में 10 फीसदी की कमी कर लें, तो वो मांग में 1.8-1.9 करोड़ टन की कमी ला सकते हैं.

आयात पर निर्भर देशों में अनाज के भंडारण को बेहतर बनाना और अनाज उगाने वाले देशों को मुख्य उपज उगाने में मदद देकर भी स्थिति संभाली जा सकती है, क्योंकि अनाज उगाने वाले कई देशों में आज नकदी फसलों पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है.

यह भी पढ़ेंः यूक्रेन युद्ध की भेंट चढ़ सकता है सोबा नूडल

इसके साथ ही दुनिया में अलग-अलग फसलें उगाना भी खाद्य सुरक्षा को मजबूत कर सकता है. फिलहाल कुछ ही फसलों पर ज्यादा ध्यान है और इसकी वजह से मुट्ठीभर निर्यातक बाजार में वर्चस्व बनाकर बैठे हैं.

साथ ही, जलवायु के लिहाज से बेहतर कृषि के कुछ तरीके अपनाने होंगे, ताकि धरती को गर्म होने से रोकने के साथ ही भोजन की आपूर्ति भी बढ़ाई जा सके. गरीब देशों को ज्यादा कर्ज से राहत देना होगा, ताकि उनके पास भोजन की कीमतों में आ रही उठापटक से निबटने का साधन रहे.

सहायता एजेंसियों से मिला अनाज लेकर जाते अफगान लोग

खाने की कीमतें बढ़ती रहीं, तो क्या होगा?

खाने की कीमतें बढ़ने के कारण मानवीय एजेंसियों को अफगानिस्तान, यमन, दक्षिणी सूडान और सीरिया जैसे देशों के लिए अनाज खरीदने में बहुत संघर्ष करना पड़ रहा है.

अंतरराष्ट्रीय सहायता तंत्र यूक्रेन युद्ध के पहले से ही बढ़ती जरूरतों और अपर्याप्त धन से जूझ रहा है अब ऊंची कीमतों का मतलब है कि कम ही अनाज खरीदा जा सकेगा. संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम से जुड़े गर्नोट लागांडा का कहना है, "यह पहले कभी इतना बुरा नहीं रहा." उन्हें डर है कि मौजूदा खाद्य संकट में अगर जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरे जोड़ दिए जाएं, तो बढ़ती कीमतें, "भागती ट्रेन बन जाएंगी, जिन्हें रोका नहीं जा सकेगा."

चाथम हाउस के बेनेटन का कहना है कि यूक्रेन युद्ध भोजन की कीमतों में बहुत बड़ा परिवर्तन लाने वाला कारण बन सकता है. उन्होंने यह भी कहा, "सस्ते और भरपूर मिलने वाले भोजन का खत्म हो जाना कुछ लोगों के लिए अब सच्चाई बनने जा रहा है."

एनआर/वीएस (रॉयटर्स)

Source: DW

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+