बंगाल के मुसलमानों ने ISF-AIMIM जैसी इस्लामी पार्टियों पर क्यों नहीं किया भरोसा ? जानिए
कोलकाता, 4 मई: पश्चिम बंगाल चुनाव में इसबार मुसलमानों की दो-दो पार्टियों ने खूब जोर लगाया था। फुरफुरा शरीफ के मौलाना अब्बास सिद्दीकी के इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) की राष्ट्रीय सेक्युलर मजलिस पार्टी और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम)। इनमें सिर्फ आईएसएफ की राष्ट्रीय सेक्युलर मजलिस पार्टी को ही एक सीट मिल पाई, जबकि उसने लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस के साथ गठबंधन करके संयुक्त मोर्चा के तहत चुनाव लड़ा। सवाल है कि तकरीबन 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले बंगाल में इस्लामिक पार्टियों पर मुसलमानों ने भरोसा क्यों नहीं किया ? वह ममता बनर्जी के नेतृत्व पर आंख मूंद कर विश्वास करके टीएमसी के साथ क्यों गए ?

बंगाल के मुसलमानों ने खुलकर दिया ममता का साथ
पश्चिम बंगाल में आईएसएफ ने इस चुनाव में पहली बार राष्ट्रीय सेक्युलर मजलिस पार्टी के बैनर तले 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सिर्फ भांगर विधानसभा सीट पर इसके चीफ यानी भाईजान (अब्बास सिद्दीकी) के भाई नौशाद सिद्दीकी ही जीत दर्ज करा पाए। मुसलमानों के प्रभाव वाली बाकी 29 सीटों पर जहां इसके प्रत्याशी मैदान में थे, उनमें से 26 तृणमूल कांग्रेस जीत गई है। बाकी 3 सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में चली गई। लेकिन, दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी ने जो तीनों सीटें जीती हैं, वहां टीएमसी से उसकी जीत का अंतर आईएसएफ के उम्मीदवारों को मिले वोट से कहीं ज्यादा है। उदाहरण के लिए रानाघाट उत्तर पूर्ब सीट को ही लीजिए। यहां आईएसएफ की पार्टी के उम्मीदवार को सिर्फ 2.42 फीसदी वोट मिले और टीएमसी 39.59 वोट जुटा सकी। जबकि, भाजपा उम्मीदवार ने 54.39 वोट हासिल किए। यह इस बात का संकेत है कि भाजपा के खिलाफ मुस्लिम वोट मुस्लिमों की पार्टी को न जाकर टीएमसी की ओर मुड़ गया।

बंगाल में सिद्दीकी और ओवैसी की सियासत हवा हो गई
बिहार में 5 विधानसभा सीटें जीतने के बाद ओवैसी ने भी बंगाल में अपनी पार्टी से 7 उम्मीदवारों को टिकट दे दिया था। इन सातों सीटों पर तृणमूल का कब्जा हो गया और हैदराबाद के सांसद का पूरे भारत का मुसलमान नेता बनने का सपना मटियामेट हो गया। पार्टी को राज्य में कुल 0.02% वोट मिले। उसके उम्मीदवार चौथे-पांचवें और छठे नंबर पर रहे। जाहिर है कि मौलाना सिद्दीकी हों या असदुद्दीन ओवैसी, मुसलमान मतदाताओं ने बंगाल में मुस्लिम नेताओं पर यकीन करने के बजाय अपनी भरोसेमंद नेता ममता के नेतृत्व पर ही विश्वास करने में भलाई समझी है।

मुर्शिदाबाद और मालदा में बदल गया वोटिंग पैटर्न
मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे मुस्लिम-बहुल जिलों में इसबार मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न देखकर यह स्थिति और भी ज्यादा स्पष्ट हो जाती है। इन जिलों में 2016 के चुनाव के मुकाबले टीएमसी को बहुत ही ज्यादा सफलता मिली है। मुर्शिदाबाद जिले की 20 में से 16 सीटें टीएमसी के खाते में गई हैं और मालदा की 9 में से 5 पर उसका कब्जा हो गया है। पिछले चुनाव में मुर्शिदाबाद में तृणमूल महज चार सीटें जीती थी और मालदा में उसका खाता भी नहीं खुला था। ये जिले परंपरागत तौर पर कांग्रेस के गढ़ थे, जहां उसके दिग्गज गनी खान चौधरी का हर चुनावों में वर्चस्व नजर आता था। लेकिन, अब यहां ममता मुस्लिम वोटरों की नई मसीहा बनकर उभरी हैं।

मुसलमानों के लिए काम करके ममता ने जीता भरोसा- एक्सपर्ट
मोटे तौर पर माना जा रहा है कि भाजपा के आक्रामक प्रचार की वजह से तृणमूल को मुसलमानों को एकजुट करने का मौका मिला है। यह बात भी सही है कि ममता बनर्जी ने मुस्लिमों से चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी विवादास्पद अपील भी की थी, जिसके चलते चुनाव आयोग ने उन्हें कुछ घंटों के लिए प्रचार करने से रोक भी दिया था। लेकिन, कुछ जानकारों का मानना है कि बंगाल के मुसलमानों का टीएमसी को वोट करने के पीछे यह एक कारण हो सकता है, लेकिन सिर्फ यही एकमात्र कारण नहीं है। कोलकाता के आलिया यूनिवर्सिटी में जर्नलिज्म के असिस्टेंट प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद रियाज ने दि प्रिंट से कहा है, '2018 के पंचायत चुनाव के समय से ही टीएमसी ने मालदा और मुर्शिदाबाद में कई तरह की योजनाएं शुरू कर दी थीं। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में उसके चलते समुदाय का उसे समर्थन मिला है। इसके अलावा कांग्रेस में नेतृत्व संकट से भी यहां तृणमूल को फायदा मिला है.....'
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