बंगाल में 30 साल से ज्यादा राज करने वाले लेफ्ट फ्रंट का नहीं जीता एक भी विधायक
कोलकाता, 3 मई: आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में लेफ्ट फ्रंट का एक भी नुमाइंदा नहीं पहुंच पाया है। यह वही फ्रंट है, जिसने तकरीबन साढ़े तीन दशक तक प्रदेश पर राज किया था। अपने तबाह हो चुके कुनबे को समेटने के लिए लिए लेफ्ट ने इसबार कांग्रेस के साथ-साथ फुरफुरा शरीफ के एक मौलाना के इंडियन सेक्युलर फ्रंट के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ा था, लेकिन कभी लाल सलाम करने वाली धरती के लोगों ने उसे पूरी तरह से टाटा-बाय-बाय कर दिया। 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जिन 292 सीटों पर वोटिंग हुई, उसमें सिर्फ भांगर सीट ही ऐसी रही, जहां आईएसएफ समर्थित उम्मीदवार एक सीट जीत पाया है, वरना पूरे बंगाल में संयुक्त मोर्चा का कोई नाम लेने वाला भी नहीं बच पाता।

भाजपा की हार पर खुशी मना रहा है लेफ्ट फ्रंट
बंगाल में लेफ्ट की दुर्गति का ठीकरा सीपीएम 'वोटों के ध्रुवीकरण' पर फोड़ रही है। सीपीएम पोलित ब्यूरो अपनी जमीन खिसकने की चिंता करने से ज्यादा इस बात पर खुश हो रहा है कि भाजपा की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। पार्टी के मुताबिक, 'पश्चिम बंगाल में अपने मनी पावर और जोड़-तोड़ के बावजूद भाजपा को तगड़ा झटका लगा है। बंगाल के लोगों ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की विचारधारा को पूरी तरह से खारिज कर दिया है.....बीजेपी को हराने की अपील की वजह से बहुत ज्यादा ध्रुवीकरण हो गया, जिसका खामियाजा संयुक्त मोर्चा को उठाना पड़ा।' एक वरिष्ठ सीपीएम नेता ने ये बी कहा कि 'यहां तक कि हमारे समर्थकों को भी लगा कि बीजेपी को रोकने के लिए उन्हें टीएमसी को वोट देना चाहिए। इसलिए हम अपनी जीतने वाली सीट भी टीएमसी से हार गए। हालांकि, हम लोगों के लिए काम कर रहे हैं। हमारे कार्यकर्ता कोविड-प्रभावित लोगों की सहायता कर रहे हैं। युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए हमारा अभियान जारी रहेगा।'
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युवा हों या दिग्गज सीपीएम के सारे मोहरे फेल
अपनी गंवाई हुई जमीन वापस हथियाने के लिए लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल में इसबार सब कुछ किया। युवाओं और छात्र नेताओं को टिकट दिया। लेकिन, सबके सब भाषणबाजी में ही अव्वल साबित हुए। वोटरों के बीच उनका कोई असर नहीं दिखा। जेएनयू स्टूटेंड यूनियन की अध्यक्ष आइशी घोष को भी पार्टी ने जमुरिया से बहुत ही हवाबाजी करके उतारा था। लेकिन, वो भी सिर्फ 14.89 फीसदी वोट ही जुटा सकीं। दिप्सिता धर, मीनाक्षी मुखर्जी और श्रीजन भट्टाचार्य का भी यही हाल हुआ, वामपंथ की नई जमात को भी जनता वोटों का घास डालने के लिए तैयार नहीं हुई। इसी तरह से पार्टी के सुजान चक्रवर्ती, अशोक भट्टाचार्य, सुशांता घोष और कांति गांगुली जैसे दिग्गजों की भी खूब भद पिटी, ममता की लहर में कोई कुछ नहीं कर पाया।

अपने ही गढ़ में इतिहास बन रहा है लेफ्ट
गौरतलब है कि सीपीएम भाजपा की विचारधारा को बंगाल में पूरी सफलता नहीं मिल पाने से गदगद हो रही है। लेकिन, वह यह भूल जा रही है कि बीजेपी की जिस कथित सांप्रदायिकता के नाम पर वह अपनी हार का बचाव कर रही है। उसने फुरफरा शरीफ के मौलाना की पार्टी के साथ गठबंधन करते वक्त उसी सांप्रदायिक विचारधारा को गले लगाने में जरा भी देर नहीं की। अपनी नाकामी के लिए ध्रुवीकरण का बहाना कांग्रेस भी ढूंढ़ती नजर आ रही है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी का कहना है, 'ममता बनर्जी मुसलमानों में डर की भावना पैदा करने में सफल हो गईं। हम लोगों को यह समझाने में नाकाम रहे कि कांग्रेस अकेली ऐसी ताकत है जो बीजेपी और उसकी सांप्रदायिक विचारधारा के खिलाफ लगातार लड़ रही है। सीतलकुची की घटना ने ममता को वोटरों के ध्रुवीकरण में मदद की।' तथ्य तो ये है कि भाजपा हो, टीएमसी हो या फिर लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस, सबने अपने-अपने हिसाब से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश की है। लेकिन, कामयाबी ममता के हाथ लगी है, इसलिए वही इस जीत का सिकंदर हैं और लेफ्ट राज्य में आज ऐसी ताकत बन गया है, जो फिलहाल अपने गढ़ में इतिहास बनता दिख रहा है।












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