3 फोन कॉल और उजड़ गई एक परिवार की पूरी दुनिया, कोलकाता केस में पीड़िता के पिता ने बताई आपबीती
9 अगस्त की सुबह, एक के बाद एक, तीन फोन कॉल ने उत्तरी कोलकाता के एक मध्यम वर्गीय परिवार के जीवन की सुख-शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया। आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टर बेटी ने पिछली रात अपनी मां से बात की थी। उन्हें नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी बातचीत होगी।
पहला कॉल सुबह 10 बज कर 53 मिनट पर अस्पताल की सहायक अधीक्षक के रूप में पहचानी गई एक महिला की ओर से आया। पिता ने पूछा कि क्या हुआ है, लेकिन कॉल करने वाले ने उन्हें केवल जल्दी आने के लिए कहा, यह कहते हुए कि उनकी बेटी की हालत बहुत खराब है। बार-बार पूछे जाने के बावजूद, उसने फोन पर कोई भी डिटेल देने से इनकार कर दिया।

दूसरा कॉल
दूसरे कॉल के समय तक माता-पिता अस्पताल के लिए निकल चुके थे। एक पुरुष की आवाज ने उनके आने की पुष्टि की और उन्हें आरजी कर अस्पताल के चेस्ट डिपार्टमेंट के एचओडी से मिलने का निर्देश दिया। मां ने अपनी बेटी की हालत के बारे में पूछा लेकिन उन्हें कोई खास जानकारी नहीं मिली। कॉल करने वाले व्यक्ति ने पीड़िता की मां के सवाल पर कहा, "आप आइए, हम बात करेंगे, आरजी कर अस्पताल के चेस्ट विभाग के एचओडी के पास आइए।"
तीसरा कॉल
तीसरी कॉल में पीड़िता के मां-बाप को यह दुखद समाचार मिला कि उनकी बेटी ने आत्महत्या कर ली है। यह कॉल भी सहायक अधीक्षक की ओर से आया था, जिसने पहली कॉल की थी। पिता को बताया गया कि पुलिस मौजूद है और उन्हें तुरंत आना होगा।
संचार जांच के दायरे में
अस्पताल प्रशासन द्वारा पीड़िता के माता-पिता के साथ संवाद स्थापित करने के तरीके की कलकत्ता उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय दोनों में कड़ी आलोचना की गई है। माता-पिता का आरोप है कि उन्हें जानबूझकर तीन घंटे तक इंतजार करवाया गया। हालांकि, कोलकाता पुलिस का दावा है कि वे दोपहर 1 बजे पहुंचे और उन्हें दस मिनट के भीतर उनकी बेटी का शव देखने ले जाया गया।
अदालत ने सवाल उठाया है कि अस्पताल के तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. संदीप घोष ने शुरू में औपचारिक पुलिस शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई। पीड़िता के पिता द्वारा औपचारिक शिकायत दर्ज कराने के बाद ही देर रात एफआईआर दर्ज की गई।
एक पिता की हृदय विदारक कहानी
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता के पिता ने उनसे बात करते हुए बताया कि अपनी बेटी का शव देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा, "जब मैंने उसे देखा तो मैं क्या महसूस कर रहा था, यह मैं ही जानता हूं। उसके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था। वह सिर्फ एक चादर में लिपटी हुई थी। उसके पैर अलग-अलग थे और उसका एक हाथ उसके सिर पर था।"
जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन जारी है और इस मुद्दे के आसपास की राजनीति गहराती जा रही है, इन तीन कॉल पर माता-पिता की आवाजें इस बात की याद दिलाती हैं कि इस बड़े विवाद के केंद्र में एक व्यक्तिगत त्रासदी है, एक परिवार का सपना टूट गया है, एक सपना जिसे उनकी बेटी हकीकत में बदल रही थी।












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