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मंगसीर बग्वाल: पहाड़ी वेशभूषा में रासो, तांदी के साथ जमकर खेला भेलो,बाल-बेटी और बग्वाल के जरिए दिया खास संदेश

Mangsheer bagwal: पहाड़ की संस्कृति और परंपरा को बचाने के लिए पहाड़ी वेश भूषा वाद्य यंत्रों के साथ रासो, तांदी नृत्य पर भेलो खेलते महिलाओं और पुरूषों ने एक जुट होकर तीन दिन तक बग्वाल मनाई। मौका था मंगसीर बग्वाल का। उत्तराखंड के सीमांत जिले उत्तरकाशी में तीन दिनों तक मंगसीर बग्वाल मनाया गया।

हर तरफ मंगसीर बग्वाल की रौनक नजर आई। तीन दिनों तक चले मंगसीर बग्वाल में पहले दिन बाल, दूसरे दिन बेटी और तीसरे दिन बग्वाल धूमधाम से मनाया गया। जिसमें प्रदेश की कई हस्तियों ने शिरकत की और रंगारंग कार्यक्रम भी हुए। इस दौरान कई तरह की प्रतियोगिताएं भी आयोजित हुई।

uttarkashi Mangseer Bagwal Raso Pahari costumes played Bhelo vigorously with Tandi special message through child-daughter and Bagwal

बग्वाल में सबसे खास आकर्षक होता है। भेलो एक खास तरह से तैयार किया जाता है, जिसमें ज्वलनशील लकड़ी से तैयार होता है और इसे उल्लास के साथ घूमाया जाता है।

साथ ही पहाड़ी कल्चर, पहनावे और भोज को बढ़ावा देने के लिए भी कई तरह के आयोजन हुए। कार्यक्रम के संयोजक अजय पुरी ने बताया कि उत्तरकाशी में अनघा फाउंडेशन की और से मंगसीर बग्वाल को खास तरीके से मनाया जाता है। जिसमें पहाड़ के रीति रिवाज, भोज और सांस्कृतिक पंरपरा के साथ ही नृत्य और पारंपरिक खेलों को भी बढ़ावा दिया जाता है। जिससे आने वाली पीढ़ी को भी अपने संस्कृति और पंरपरा को याद दिलाया जा सके।

इस खास आयोजन में हर क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वालों को सम्मानित करने के साथ ही खेलों और प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन करने वालों को अवार्ड भी दिए गए। उत्तरकाशी के अलावा टिहरी, मसूरी और देहरादून में भी मंगसीर बग्वाल धूमधाम से मनाई गई।

परशुराम मंदिर के पुजारी शैलेन्द्र नौटियाल ने बताया कि बग्वाल दीपावली के एक माह मनाया जाने वाला सीमांत जिले का त्यौहार है, जिसके मनाने के पीछे दो तरह की मान्यताएं हैं। पहला सीमांत जिले में भगवान राम के आने का संदेश एक माह बाद मिला जिस वजह से लोगों ने बग्वाल यानि दिवाली मनाई।

इसके अलावा दूसरी मान्यता है सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार गढ़वाल के वीर भड़ माधो सिंह भंडारी टिहरी के राजा महीपति शाह की सेना के सेनापति थे। करीब 400 साल पहले राजा ने माधो सिंह को सेना लेकर तिब्बत से युद्ध करने के लिए भेजा।कहा जाता है कि युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दिवाली मनाई थी।

राघवेंद्र उनियाल ने बताया कि मंगसीर की बग्वाल कार्तिक दीपावली से एक माह बाद उत्तरकाशी में तिब्बत विजय का उत्सव मंगसीर की बग्वाल कार्तिक दीपावली से एक माह बाद मनाया जाता है। दिवाली पर्व के ठीक एक माह बाद उत्तरकाशी जिले में मंगसीर बग्वाल मनाई जाती है।

पौराणिक कहानी स्थानीय लोग बताते हैं कि वर्ष 1632 में गढ़वाल नरेश राजा महिपत शाह के शासनकाल में तिब्बत के दावा घाट में गढ़वाल और तिब्बत की सेना के बीच युद्ध हुआ था। गढ़वाल की ओर से सेनापति लोदी रिखोला और माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना युद्ध लड़ने गई थी।

युद्ध लंबा चलने पर सेना दीपावली तक घर नहीं लौट पाई थी। तब सेनापति माधो सिंह भंडारी ने संदेश भिजवाया था कि तिब्बत पर विजय हासिल कर लौटने के बाद ही बग्वाल मनाई जाएगी। गढ़वाल की सेना दीपावली के ठीक एक माह बाद तिब्बत पर विजय हासिल कर लौटी थी। तभी से मंगसीर की बग्वाल मनाने की परंपरा चली आ रही है।

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