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श्रावण मास की शिवरात्रि आज, जानिए इसका पौराणिक महत्व और शिव को इस दिन क्या है अतिप्रिय

श्रावण की शिवरात्रि: शिवरात्रि और मंगला गौरी व्रत का संयोग

देहरादून 26 जुलाई। आज श्रावण मास की शिवरात्रि है। आज के ही दिन कांवड़ का जल शिवलिंग पर च़ढाया जाता है। सावन की शिवरात्रि हिंदी पंचांग के अनुसार आज शाम को 6 बजकर 45 मिनट पर लग रही है और 27 जुलाई को 9 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। इस दौरान कांवड़ गंगाजल चढ़ाऐंगे। उत्तराख्ंांड के शिवालयों और शिव मंदिरों मंें आज सुबह से ही शिवभक्तों की भीड़़ जुटनी शुरू हो गई है। आज की शिवरात्रि का खास संयोग माना जा रहा है। इस दिन शिव मंगल गौरी की बहुत ही शुभ और मंगलकारी योग बन रहा है।ज्योतिषाचार्यों के अनुसार सावन में वर्षों बाद शिवरात्रि और मंगला गौरी व्रत का संयोग बना है।

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सावन की शिवरात्रि का महत्व
पौराणिक मान्यतों के अनुसार हर महीने की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। लेकिन श्रावण मास की शिवरात्रि का पौराणिक महत्‍व बहुत खास माना गया है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव ने अमृत मंथन के दौरान निकले विष को अपने कंठ में रख लिया था। इसी विष की तपन को शांत करने के लिए इस दिन सभी देवताओं ने उनका जल और पंचामृत से अभिषेक किया था। इसलिए भगवान शिव नीलकंठ कहलाए। इसी के कारण सावन की शिवरात्रि मनाई जाती है।

शिव को क्या है प्रिय
शिवरात्रि पर शिवलिंग पर जल चढ़ाने का खास महत्व है। इतना ही नहीं जल चढ़ाने और पूजा का भी खास विधि विधान है। ऐसे में शिवभक्त अपनी मनोकामना लेकर कई किमी पैदल चलकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र भांग धतूरा दूर्वा 5 फल फूल और धूप दीप जरूर रखना चाहिए। भगवान शिव को जो पत्र पुष्प प्रिय है उसमें बेलपत्र प्रमुख है। पौराणिक मान्यता है कि श्रावण मास में बेलपत्र को शिव पर अर्पित करने से धन संपदा ऐश्वर्य प्राप्त होता है। पुराण के अनुसार बेलपत्र में साक्षात लक्ष्मी का वास माना जाता है। ऋग्वेद में श्री युक्त के अनुसार मां लक्ष्मी के तपोबल से बेलपत्र उत्पन्न हुआ जो दरिद्रता को दूर करने वाला है यह न केवल बाहरी बल्कि भीतरी दरिद्रता को दूर करने में समर्थ है। बेलपत्र चढ़ाने से शिव जी प्रसन्न हो जाते हैं। वि़द्धानों का मत है कि बेल पत्र हमेशा शिवलिंग पर उल्टा चढ़ाना चाहिए।

रुद्राक्ष है खास

पौराणिक मान्यता अनुसार भगवान शंकर के नेत्रों से आंसू की बूंदे टपकी जो पृथ्वी पर गिरकर रुद्राक्ष के रूप में परिवर्तन हो गई। शंकर यरुद्र के आंखों अक्षु से उत्पन्न होने के कारण ही इस वृक्ष के फल को रुद्राक्ष कहां गया। रुद्राक्ष भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय है इसलिए मान्यता है कि रुद्राक्ष में स्वयं भगवान शंकर का निवास है रुद्राक्ष को धारण करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और समस्त मनोकामना पूर्ण होती है।

शिवलिंग पर जल चढाते समय रखें ध्यान
इसके साथ ही शिवलिंग पर जल कैसे चढ़ाना चाहिए इसको लेकर भी पौराणिक मान्यता और विद्धानों का मत है कि शिवलिंग पर जल हमेशा उत्तर दिशा की ओर मुंह करके जल चढ़ाएं क्योंकि उत्तर दिशा को शिव जी का बायां अंग माना जाता है जो माता पार्वती को समर्पित है। इसके अलावा जल चढ़ाने के लिए सबसे अच्छे पात्र तांबे चांदी और कांसे के माने जाते हैं। जल अर्पण के लिए सर्वोत्तम पात्र तांबे से जल चढ़ाना उत्तम माना गया है। शास्त्रों में भी बताया गया है कि शिव जी को जल धारा अत्यंत प्रिय है। इसलिए जल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि जल के पात्र से धार बनाते हुए धीरे से जल अर्पित करें। हमेशा शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय ध्यान रखें कि बैठकर ही जल अर्पित करें।

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