उत्तराखंड विधानसभा में बैकडोर भर्तियों की जांच कर रही कमेटी की रिपोर्ट आने से पहले ही खड़ा हुआ एक नया विवाद
विधानसभा में भर्तियों की जांच, कांग्रेस ने उठाए सवाल
देहरादून, 15 सितंबर। उत्तराखंड विधानसभा में बैकडोर भर्तियों की जांच कर रही कमेटी जल्द ही अपनी रिपोर्ट विधानसभा अध्यक्ष को सौंप सकती है। लेकिन रिपोर्ट सौंपने से पहले ही जांच कर रही कमेटी को लेकर विवाद खड़ा हो रहा है। विवाद खड़ा हुआ है विपक्ष के सवाल से। कांग्रेस जांच कर रही कमेटी से ही सहमत नहीं है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा का कहना है कि विधानसभा एक संवैधानिक संस्था है, ऐसे में आईएएस या रिटायर्ड आईएएस इतनी बड़ी संस्था का ऑडिट कैसे कर सकता है। खासकर जब जांच कमेटी के सदस्य सरकार के किसी संस्था में कार्यरत हैं। क्षेत्रीय दल यूकेडी भी इस प्रकरण की जांच हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज से कराने की मांग कर रही है।ऐसे में कमेटी की जांच रिपोर्ट सामने आने से पहले ही एक नया विवाद खड़ा हो गया है।

उत्तराखंड विधानसभा में हुई बैकडोर भर्तियों का मामला सामने आया
यूकेएसएसएससी पेपर लीक प्रकरण सामने आने के बाद उत्तराखंड विधानसभा में हुई बैकडोर भर्तियों का मामला सामने आया। कांग्रेस ने भाजपा सरकार के समय तदर्थ नियुक्तियों को सवाल खड़े किए। कांग्रेस ने उत्तराखंड विधानसभा की करीब 73 लोगों की तदर्थ भर्तियों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। जिसके बाद से नियुक्ति पाने वालों के नामों की सूची सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इसमें तत्कालीन स्पीकर प्रेमचंद अग्रवाल निशाने पर आ गए।

नेताओं के रिश्तेदारों की सूचियां सोशल मीडिया में वायरल
इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस के सरकार के समय स्पीकर रहे गोविंद सिंह कुंजवाल के करीबियों को नौकरी देने के आरोप लगाकर सूची सोशल मीडिया में वायरल कर दी। आरोप है कि कांग्रेस सरकार में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के कार्यकाल में 158 भर्तियां भी विवादों में रहीं। आरोप है कि भर्तियां भी नियमों कायदों को ताक पर रख कर की गईं। इसके बाद भाजपा, कांग्रेस 22 साल में अब तक नौकरी पाने वाले नेताओं के रिश्तेदारों की सूचियां सोशल मीडिया में वायरल करते हुए नजर आए।

स्पीकर ने सभी प्रकरणों की जांच 3 सदस्यीय एक्सपर्ट कमेटी को सौंप दी
इन सभी विवादों के बाद सीएम पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी भूषण को पत्र लिखकर विधानसभा भर्तियों की जांच करने का अनुरोध किया। उत्तराखंड विधानसभा में भर्ती प्रकरण को लेकर विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी भूषण ने बड़ा फैसला लिया ,स्पीकर ने इन सभी प्रकरणों की जांच 3 सदस्यीय एक्सपर्ट कमेटी को सौंप दी, इस प्रकरण की जांच रिपोर्ट एक माह के भीतर देने के निर्देश दिए गए हैं। स्पीकर ने कहा कि भर्ती प्रकरण की दो फेज 2000 से 2011 और 2012 से 2022 तक नियमावली के बाद की सभी भर्तियों जांच होगी। एक्सपर्ट कमेटी में अध्यक्ष दिलीप कोटिया और सुरेंद्र रावत, अवनेंद्र सिंह नयाल शामिल किए गए हैं। जो कि जल्द ही अपनी रिपोर्ट स्पीकर को सौंप सकती है।

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा का कहना है कि वे समिति से ही सहमत नहीं
लेकिन कमेटी को लेकर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा का कहना है कि वे समिति से ही सहमत नहीं हैं। विधानसभा एक संवैधानिक संस्था है। जब भी विधानसभा से संबंधित मामले सामने आते हैं तो उन्हें ठीक करने का अधिकार विधानसभा या न्यायपालिका को है। ऐसे में कोई आईएएस चाहे वह रिटायर्ड ही क्यों न हो, इतनी बड़ी संस्था का ऑडिट कर सकता है। या इस पर कोई राय दे सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच कर रही कमेटी के बीच ही कई बातें मीडिया के जरिए लीक हो रही हैं। इसके साथ ही करन माहरा का कहना है इस कमेटी के सदस्य सरकार के अंदर ही कार्यरत हैं। तो ऐसे में इस संस्था से उम्मीद कैसे की जाए कि ये कमेटी निष्पक्ष जांच करेगी। साथ ही उन्होंने मांग की है कि जब से राज्य बना है। तब से लेकर अब तक की जांच होनी जरूरी है।

जांच कमेटी को लेकर सवाल खड़े
कांग्रेस के इन आरोपों पर उत्तराखंड के जानकारों की अलग-अलग मत है। उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार डॉ अजय ढोंढियाल ने भी जांच कमेटी को लेकर सवाल खड़े किए हैं। डॉ अजय का कहना है कि कार्यपालिका को विधायिकी की जांच करने का अधिकार नहीं है। ऐसे में इस कमेटी में न्यायपालिका से जुड़े लोगों का होना जरूरी हैं। उधर उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत का कहना है कि विधानसभा अध्यक्ष ने कमेटी से राय मांगी है कि ऐसे में ये उनका अधिकार है कि वे कमेटी में किसको रखती हैं। रावत ने कहा कि अभी कमेटी की रिपोर्ट नहीं आई है। ऐसे में पहले ही सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं। हालांकि जय सिंह रावत कमेटी के जांच के दायरे को लेकर सवाल उठा रहे हैं। रावत ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को चाहिए था कि 22 साल में विधानसभा में हुई भर्तियों की पूरी जांच कराई जाए। ऐसे में सरकार की मंशा पर सवाल उठना तय है।

जनता से जुड़ा मामला, हमें आशावादी होना चाहिए
कानून के जानकार वकील आलोक घिल्डियाल का कहना है कि ये बात सही है कि विधानसभा एक संवैधनिक संस्था है। लेकिन जब विधानसभा में किसी की नियुक्ति की है गई है तो विधायकी ने ऐसे समय में कार्यपालिका की तरह काम किया है। ऐसे में यहां पर मामला अलग है। उन्होंने कहा कि क्योंकि ये जनता से जुड़ा मामला है, ऐसे में इस पूरे मामले में हमें आशावादी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये अब सरकार की मंशा पर तय करता है, कि कमेटी किस मंशा से बनाई गई है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि वे रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लेंगी।












Click it and Unblock the Notifications