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Uttarakhand: अनोखी परंपरा, पौड़ी में खिर्सू का बद्दी मेला, गांव की खुशहाली के लिए जिदंगी लगाई जाती दांव पर

उत्तराखंड के पौड़ी जिले के खिर्सू में अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां पर बद्दी मेले का आयोजन होता है। माना जाता है कि इस परंपरा को निभाने से क्षेत्र में उन्नति रहेगी और किसी भी तरह की आपदा से गांव वासी दूर रहेंगे।

Unique tradition, Baddi fair Khirsu in Pauri district, life is at stake for prosperity of village

उत्तराखंड के पौड़ी जिले के खिर्सू में एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां पर बद्दी मेले का आयोजन होता है। माना जाता है कि इस परंपरा को निभाने से क्षेत्र में उन्नति रहेगी और किसी भी तरह की आपदा से गांव वासी दूर रहेंगे।

काठ के घोड़े पर एक छेद कर उसके आर पार एक रस्सा पर टांगा

इस अनोखी परंपरा को निभाने के लिए जिसमें काठ के एक घोड़े पर बीचों बीच एक छेद कर उसके आर पार एक रस्सा पर टांगा जाता था। फिर ऊंची जगह से उस पर बेडा या बद्दी जाति के पुरुष को बिठा कर छोड़ा जाता था। काठ का घोड़ा अपने सवार समेत सरपट नीचे को आता था, जिसमे कभी कभी व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती थी। हालांकि अब इसमें मनुष्य की जगह लकड़ी का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इस तरह की परंपरा को गांववासी अभी भी आगे बढ़ा रहे हैं।

उत्तराखंड के कई दूसरे इलाकों में भी इस तरह की परंपरा

इसे देखने के लिए दूर दराज से लोग पहुंचते हैं और बड़े कौतुहल के साथ इसका आनंद लेते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार ये परंपरा क्षेत्र में खुशहाली के लिए निभाई जा रही है। जिससे गांव में किसी तरह की आपदा, भूकंप या अनहोनी न हो। उत्तराखंड के कई दूसरे इलाकों में भी इस तरह की परंपरा निभाने का दावा किया जा रहा है।

ऐसी कहानी हनोल के बारे में

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    अनोखी परंपरा, पौड़ी में खिर्सू का बद्दी मेला, गांव की खुशहाली के लिए जिदंगी लगाई जाती दांव पर

    वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट ने बताया कि उन्होंने ऐसी कहानी हनोल के बारे में एक किताब में पढ़ा था। वहां बेड़ा को रस्सी से ऊपर की पहाड़ी से हनोल मंदिर तक लाया जाता था। माना जाता था कि बेड़ा मर गया तो गांव के कष्ट दूर हो जाएंगे। नीचे मंदिर में जहां बेड़ा को रस्सी से पहुंचना होता था, वहां बेड़ा के परिवार और रिश्तेदार उसे बचाने के प्रयास में लगते थे, जबकि पूरा गांव कोशिश करता था कि वह मर जाए। कई बार और अक्सर नीचे सकुशल उतरने के बावजूद उसे मार दिया जाता था। किताब चकराता के टीका राम शाह ने लिखी है। जिसमें बताया गया कि वहां यह प्रथा किसी अंग्रेज अफसर ने बंद करवाई थी। इस तरह लोग अभी कई जगह इस तरह की परंपरा निभा रहे हैं, हालांकि अब व्यक्ति की जगह काठ यानि लकड़ी का ही इस्तेमाल किया जाता है।

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