UK NEWS: पहाड़ी वेशभूषा परिधान पहनकर पौड़ी की डीएम ने मेले में की शिरकत, मेयर, एसडीएम का भी दिखा अलग अंदाज
UK NEWS IAS DM PAURI GARHWAL: उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल में बैकुंठ चतुर्दशी मेले में आयोजित कार्यक्रम में पौड़ी की जिलाधिकारी ने पहाड़ी वेशभूषा परिधान में सबको आकर्षित किया। डीएम की इस पहल की हर कोई तारीफ करता हुआ नजर आया। साथ ही सोशल मीडिया में भी ये चर्चा का विषय बना हुआ है।
डीएम स्वाति एस भदौरिया ने पारंपरिक पहाड़ी परिधान पहनकर प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया। डीएम ने पारंपरिक उत्तराखंडी परिधान के साथ ही मांग टीका, गुलोबंद, कानों में झुमके और नथ पहना हुआ था। इस दौरान वे पहाड़ी कल्चर में रंगी नजर आईं।

श्रीनगर में बैकुंठ चतुर्दशी मेले में पहाड़ी परिधान प्रतियोगिता आयोजित हुई। स्थानीय संस्कृति, परंपरा को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से "मि उत्तराखंडी छौं" कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान डीएम स्वाति एस भदौरिया भी पहाडी वेशभूषा में दिखीं। जिलाधिकारी के साथ ही मेयर, उपजिलाधिकारी, तहसीलदार समेत सभी पार्षदों, स्थानीय महिलाओं, युवाओं और विद्यार्थियों ने भी पारंपरिक वेशभूषा में उत्साहपूर्ण भाग लिया। जिसने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
कार्यक्रम के तहत "स्वाणि नौनी, स्वाणु नौनु, द्वि झणां" प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमें प्रतिभागियों ने पारंपरिक परिधान और लोक-संस्कृति की सुंदर झलक प्रस्तुत की। जिलाधिकारी ने स्वयं भी पारंपरिक पहाड़ी परिधान पहनकर प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन किया। मेयर नगर निगम श्रीनगर आरती भंडारी ने कहा कि हमारी पारंपरिक वेशभूषा हमारी पहचान है और हमारी विरासत भी है। इसे पहनना सिर्फ एक परिधान धारण करना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अपनी जड़ों को सम्मान देना है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन हमारे लोकसंस्कृति और पारंपरिक पहनावे के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जिलाधिकारी ने गढ़वाली में कहा कि "सुण दीदी सुण भुली, मैं त अपण संस्कृति बचौंण चली" उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम केवल गढ़वाली परिधान का नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने की एक मुहिम है. उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि पर्वों, शादियों और विशेष अवसरों पर पारंपरिक गढ़वाली, कुमाऊंनी या पहाड़ी वेशभूषा अवश्य धारण करें, क्योंकि यही हमारी पहचान और एकता का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि मेलों का असली उद्देश्य उत्साह, सहभागिता और सांस्कृतिक जुड़ाव है। हमें केवल वेशभूषा ही नहीं, बल्कि अपनी पहाड़ी रसोई, लोकभाषा, लोकनृत्य और लोकगायन से भी जुड़ना चाहिए। जिलाधिकारी ने सभी प्रतिभागियों की सृजनशीलता और सांस्कृतिक समर्पण की सराहना की।












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