केदारनाथ उपचुनाव परिणाम के मायने, आंसू से लेकर बाबा केदार की सौगंध तक, जानिए वो 5 बड़ी वजहें

Kedarnath by election result 2024: केदारनाथ उपचुनाव में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज कर एक बार फिर विपक्ष को करारी शिकस्त दी है। अब तक जितने भी उपचुनाव हुए उसमें केदारनाथ उपचुनाव की चर्चा सबसे ज्यादा रही। ऐसे में इसके परिणाम के सियासी मायने तलाशने के साथ ही इसके परिणाम की दूर तक चर्चा होना तय है।

बदरीनाथ सीट पर जब भाजपा की उपचुनाव में हार हुई तो कारण जो भी रहे हों लेकिन कांग्रेस ने इसे सनातन से जोड़ दिया। कांग्रेस का दावा था कि अयोध्या और बदरीनाथ में भाजपा की हार इस बात के संकेत है कि हिंदू और सनातन की बात करने वालों से लोगों का मोह भंग हो गया है। ये बात अलग है कि बदरीनाथ सीट पहले कांग्रेस की झोली में ही थी। लेकिन विधायक राजेंद्र भंडारी ने इस्तीफा देकर भाजपा ज्वाइन की और हार गए।

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धामी की लीडरशिप
अब बारी केदारनाथ उपचुनाव की थी। कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर यात्रा को प्रभावित करने का आरोप लगाने के साथ ही मंदिर में सोना चोरी, बेरोजगारी जैसे कई गंभीर आरोप लगाए। भ्जिसके बाद चुनाव में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने खुद मोर्चा संभाला। सीएम धामी ने विपक्ष पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाए यहां तक की सीएम को भरी सभा में बाबा केदार की सौगंध खानी पड़ी। इसके बाद भाजपा की प्रत्याशी आशा नौटियाल के भी मंच से आंसू निकल पड़े। जिस दौरान सीएम भी भावुक हो गए।

धा​कड़ ने विरोधियों को किया परास्त
सीएम धामी ने केदारनाथ उपचुनाव जीतकर एक बार फिर अपने विरोधियों को चुप करा दिया जो कि धामी के खिलाफ हारने पर माहौल बनाने की फिराक में थे, धामी के लिए केदारनाथ उपचुनाव के परिणाम संजीवनी के साथ ही बड़ा हथियार भी है। जो कि फिर से धाकड़ धामी को सही साबित करने के लिए काफी है। विपक्ष इस बात की भी हवा दे रहा था कि केदारनाथ में भाजपा का एक ऐसा धड़ा काम कर रहा है जो कि सीएम को हराने के लिए केदारनाथ में जुटे हुए हैं। हालांकि भाजपा ने इसे सिरे से नकार दिया है।

2027 से पहले कांग्रेस के लिए संकेत
इस चुनाव में विपक्ष को सिर्फ इस बात की तसल्ली रहेगी कि पूरा विपक्ष एक जुट होकर लड़ा। कांग्रेस की बात करें तो हरीश रावत, गणेश गोदियाल, प्रीतम सिंह और हरक सिंह जैसे सारे बड़े चेहरे केदारघाटी में गांव गांव प्रचार करते दिखे। लेकिन कांग्रेस के लिए सोचने वाली बात ये है कि वह कई राउंड तक ​तीसरे नंबर पर फाइट करती​ दिखी। यानि की कांग्रेस जीत से ज्यादा दूसरे नंबर के लिए निर्दलीय प्रत्याशी से मुकाबला करती दिखी। जो ​कि कांग्रेस के लिए 2027 के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।

हरीश रावत की फिर प्रेशर पॉलिटिक्स फेल
कांग्रेस को एक बार फिर मंथन की जरुरत है कि आखिर कमी कहां रह गई। प्रत्याशी चयन को लेकर भी एक बार फिर सवाल खड़े होंगे। पार्टी ने जिस तरह से बीच में गणेश गोदियाल को केदारनाथ उपचुनाव का जिम्मा सौंपा। वह भी हरीश रावत खेमे की एक प्रेशर पॉलिटिक्स का नतीजा माना गया। हालांकि गणेश गोदियाल जिस तरह से चुनाव लड़ते और लड़ाते हैं, उसकी कांग्रेस हाईकमान भी मुरीद है। लेकिन केदारनाथ में मनोज रावत को टिकट दिलाने से लेकर चुनाव में हरीश रावत खेमा काफी सक्रिय नजर आया। हरक सिंह ने भी केदारनाथ से दावेदारी की थी, लेकिन हरीश रावत खेमे के प्रेशर के चलते इस पर किसी ने विचार तक नहीं किया। जिसका असर परिणाम में नजर आ सकता था।

निर्दलीय को हल्के में लेना,बदल रही तस्वीर
उत्तराखंड में खासकर पहाड़ी इलाकों में निर्दलीयों की भूमिका काफी गहरी होती जा रही है। जिस तरह से निर्दलीय त्रिभुवन ने 9 हजार से ज्यादा वोट खींचे उससे साफ है कि त्रिभुवन इस चुनाव में काफी बड़े फेक्टर के रुप में उभर कर आए हैं। त्रिभुवन और लोकसभा चुनाव में टिहरी सीट से कांग्रेस को ​पछाड़ने वाले बॉबी पंवार की जोड़ी इस चुनाव में हिट हो गई। जो कि आने वाले चुनावों में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती हैं। ऐसे में त्रिभुवन चौहान को हल्के में लेना भाजपा खासकर कांग्रेस के लिए नुकसानदायक साबित हुआ है।

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