जानिए रम्माण उत्सव, जो यूनेस्को द्वारा किया गया है विश्व धरोहर में घोषित उत्सव
रम्माण उत्सव उत्तराखंड के चमोली में प्रतिवर्ष आयोजित होता है
देहरादून,29 अप्रैल। रम्माण उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूड़ गांव में प्रतिवर्ष अप्रैल में आयोजित होने वाला उत्सव है। इस गांव के अलावा डुंग्री, बरोशी, सेलंग गांवों में भी रम्माण का आयोजन किया जाता है। इसमें सलूड़ गांव का रम्माण ज्यादा लोकप्रिय है। इसका आयोजन सलूड़-डुंग्रा की संयुक्त पंचायत करती है। रम्माण मेला कभी 11 दिन तो कभी 13 दिन तक भी मनाया जाता है।

परम्परागत पूजा-अनुष्ठान,मनोरंजक कार्यक्रम भी
यह विविध कार्यक्रमों, पूजा और अनुष्ठानों की एक शृंखला है। इसमें सामूहिक पूजा, देवयात्रा, लोकनाट्य, नृत्य, गायन, मेला आदि विविध रंगी आयोजन होते हैं। इसमें परम्परागत पूजा-अनुष्ठान तथा मनोरंजक कार्यक्रम भी आयोजित होते है। यह भूम्याल देवता के वार्षिक पूजा का अवसर भी होता है एवं परिवारों और ग्राम-क्षेत्र के देवताओं से भेंट करने का मौका भी होता है।

सलूड-डुंग्रा गांव में मेले का आयोजन
रम्माण मेले का समापन पारंपरिक ढंग से सम्पन्न हो गया है। इस बार हजारों की संख्या में लोग इसे देखने पहुंचे। रम्माण मेले का आयोजन बुधवार को विश्व प्रसिद्ध सलूड-डुंग्रा गांव में हुआ। जिसमें भूमि क्षेत्रपाल की पूजा अर्चना और 18 पत्तर का नृत्य और 18 तालों पर राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान का नृत्य होता है।

विश्व की सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा
संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठन यूनेस्को द्वारा साल 2009 में इस रम्माण को विश्व की सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिया गया था। 7 जोड़े पारंपरिक ढोल-दमाऊ की थाप पर मोर-मोरनी नृत्य, बण्या-बाणियांण, ख्यालरी, माल नृत्य सबको रोमांचित करने वाला होता है और कुरजोगी सबका मनोरंजन करता है। अंत मे भूमि क्षेत्रपाल देवता अवतरित होकर 1 साल तक के लिए अपने मूल स्थान पर विराजित हो गए।

अप्रैल (बैशाख ) के महीने में होता है हर बार आयोजित
रम्माण उत्सव उत्तराखंड के चमोली जनपद के विकासखंड जोशीमठ में पैनखंडा पट्टी के सलूड़ ,डुंग्रा तथा सेलंग आदि गावों में प्रतिवर्ष अप्रैल (बैशाख ) के महीने में आयोजित किया जाता है। रम्माण सलूड़ की 500 वर्ष पुरानी परम्परा है।

शंकराचार्य ने जगाने का प्रयास किया गया
मान्यता है कि जब मध्यकाल में सनातन धर्म का प्रभाव काम हो रहा था। तब आदिगुरु शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म में नई जान फुकने के लिए पुरे देश में चार मठो की स्थापना की। मंदिरों की स्थापना की ,तीर्थों की स्थापना की। जोशीमठ के आस पास ,शंकराचार्य के आदेश पर उनके कुछ शिष्यों ने , हिन्दू जागरण के लिए गांव गांव में जाकर ,पौराणिक मुखौटो से नृत्य करके लोगो में जान चेतना जगाने का प्रयास किया।

रामायण से जुड़े प्रसंगो के कारण इसे रम्माण कहते
जो धीरे -धीरे इन क्षेत्रों में इस समाज का अभिन्न अंग बन गया। रामायण से जुड़े प्रसंगो के कारण इसे रम्माण उत्सव कहते हैं।

लोक शैली में प्रस्तुतिकरण
राम से जुड़े प्रसंगो के कारण इसे लोक शैली में प्रस्तुतिकरण ,लोकनाट्य ,स्वाँग ,देवयात्रा ,परमपरागत पूजा अनुष्ठान ,भुम्याल देवता की वार्षिक पूजा ,गावं के देवताओं की वार्षिक भेट आदि आयोजन इस उत्सव में होते हैं।

लकड़ी के मुखोटों को पत्तर कहते
इसमें विभिन्न चरित्र और उनके लकड़ी के मुखोटों को पत्तर कहते हैं। पत्तर शहतूत (केमू ) की लकड़ी पर कलात्मक तरीके से उत्कीर्ण किये होते हैं।












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