इंदिरा हृदयेश: चली गई उत्तराखंड की 'दीदी', पढ़िए शिक्षक नेता से आयरन लेडी बनने का सफर

देहरादून, 13 जून। उत्तराखंड कांग्रेस के लिए रविवार को दिन बड़ा झटका दे गया जब उसकी दिग्गज नेता इंदिराय हृदयेश का हार्ट अटैक से निधन हो गया। राजनीति को अपना जीवन बना लेने वाली इंदिरा हृदयेश का जब निधन हुआ तो उस समय भी राजनैतिक काम में ही लगी थीं। अगले साल उत्तराखंड चुनावों में वह कांग्रेस के लिए रणनीति बनाने में जुटी थी और इसी सिलसिले में वह पार्टी की बैठक में शामिल होने दिल्ली गई थीं जहां वह काल का शिकार बन गईं।

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    उत्तराखंड में सभी कहते थे दीदी

    उत्तराखंड में सभी कहते थे दीदी

    उत्तराखंड की नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता इंदिरा हृदयेश ने राजनीति में अपना एक अलग मुकाम खड़ा किया था। 80 साल की उम्र में उन्होंने पांच दशक से ज्यादा समय सक्रिय राजनीति को दिया। उन्हें सिर्फ अपनी पार्टी ही नहीं बल्कि विरोधी दल के नेताओं से भी सम्मान मिला। उनके निधन पर पूर्व मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी बड़ी बहिन कहते हुए शोक व्यक्त किया तो कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने उनके साथ कैबिनेट और नेता के रूप में किए गए कामों को याद किया। उत्तराखंड में उन्हें सभी दीदी कहकर बुलाते थे।

    उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अविभाविज राज्य उत्तर प्रदेश से की थी जब वह पहली बार बतौर शिक्षक नेता 1974 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य चुनी गईं। वे चार बार उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य रहीं जिसमें 1986 से 2000 तक लगातार वह इसका हिस्सा रहीं। अविभाजित उत्तर प्रदेश में राजनीति के दौरान शिक्षक नेता के रूप में उन्होंने बड़ी लकीर खींची और शिक्षक जगत के लिए खूब काम किया।

    उत्तराखंड राज्य बनने के बाद नया सफर

    उत्तराखंड राज्य बनने के बाद नया सफर

    9 नवम्बर को 2000 को जब उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अलग राज्य के रूप में मान्यता मिली तो राजनीतिक पटल पर उन्होंने नई उड़ान भरी। अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड के लिए 30 सदस्यों वाली विधानसभा का गठन किया गया जिसमें वह भी शामिल थीं।

    राज्य गठन के दो साल बाद 2002 में पहली बार उत्तराखंड में चुनाव हुए और एनडी तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। इस सरकार में इंदिरा हृदयेश को नंबर दो को दर्जा मिला। साथ ही लोक निर्माण विभाग और सूचना जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व मिला। 2007 के चुनावों में कांग्रेस तो सत्ता से बाहर हुई ही इंदिरा हृदयेश खुद भी चुनाव हार गईं। जिसका उन्हें हमेशा मलाल रहा लेकिन वह पार्टी के लिए काम करती रहीं।

    हमेशा रहीं कांग्रेस की सिपाही

    हमेशा रहीं कांग्रेस की सिपाही

    इंदिरा हृदयेश ने कांग्रेस में अपना एक कद बनाया और यही वजह है कि जब 2012 में कांग्रेस की सरकार बनी तो विजय बहुगुणा की सरकार में कैबिनेट मंत्री बनीं और जब पार्टी ने बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद से हटाकर उनके विरोधी खेमे के हरीश रावत को कुर्सी सौंपी तो रावत की कैबिनेट में भी इंदिरा हृदयेश हिस्सा रहीं और वित्त जैसा महत्वपूर्ण विभाग संभाला।

    हरीश रावत के ही कार्यकाल में उत्तराखंड कांग्रेस में बगावत हो गई और पूर्व सीएम विजय बहुगुणा और उनके खेमें के 10 विधायक बीजेपी में चले गए। हरक सिंह रावत जैसे नेता भी पार्टी का साथ छोड़ चुके थे ऐसे समय में इंदिरा हृदयेश मजबूती से हरीश रावत के साथ खड़ी रहीं और पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। ऐसा भी नहीं था कि हरीश रावत और इंदिरा हृदयेश के बीच सब ठीक था लेकिन जब बात पार्टी की आई तो कांग्रेस की सिपाही ने निजी मतभेदों को भुलाकर हरीश रावत का साथ दिया। उन्हें उत्तराखंड की राजनीति में आयरन लेडी के नाम से भी जाना जाता था।

    तबियत खराब थी लेकिन काम था जारी

    तबियत खराब थी लेकिन काम था जारी

    2017 के चुनाव के बाद जब कांग्रेस विपक्ष में बैठी तो पार्टी ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। हल्द्वानी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली इंदिरा हृदयेश कुशल प्रशासक, राजनेता और संसदीय मामलों की जानकार के रूप में जाना जाता था। उन्हें बेबाकी से अपनी बात रखने के लिए भी जाना जाता था।

    पिछले कुछ समय से उनकी तबियत ठीक नहीं रह रही थी। कुछ समय पहले ही वह कोरोना को हराकर लौटी थीं। इसके पहले उनकी हार्ट संबंधी सर्जरी भी हुई थी लेकिन राजनीति में उनकी सक्रियता कम नहीं हुई। एक दिन पहले शनिवार को ही उन्होंने महंगाई के विरोध में हल्द्वानी में हुए विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा भी लिया था।

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