दिवाली पर उत्तराखंड में कितना हुआ प्रदूषण, कहां सबसे ज्यादा AQI, किस जगह सबसे कम, जानिए वजह
Dehradun AQI: दिवाली के बाद पूरे देशभर में वायु प्रदूषण को लेकर लोग चिंतित हैं। इससे एक तरफ जहां लोगों के लिए खुले में सांस लेने की समस्या आ रही है, वहीं आने वाले दिनों में इसके असर को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। इस बीच उत्तराखंड से एक राहत की खबर भी है। इस वर्ष दिवाली पर वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है।
अधिकांश शहरों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) इस बार मध्यम या संतोषजनक श्रेणी में दर्ज किया गया, जो पिछले वर्षों की तुलना में बड़ा सुधार है। उत्तराखंड में सबसे ज्यादा AQI स्तर हल्द्वानी का 198 दर्ज किया गया है। इसके बाद रुड़की का 190 और देहरादून का 128 दर्ज हुआ है। जो कि मध्यम श्रेणी का है। जो कि पिछले सालों से काफी कम है।

देहरादून में ड्रोन आधारित वॉटर स्प्रिंकलिंग से PM₁₀ स्तर को नियंत्रित किया गया, जबकि देहरादून और ऋषिकेश में यांत्रिक स्वीपिंग मशीनों की तैनाती, जो राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा भारत सरकार के सहयोग से क्रय की गईं, ने सड़कों की धूल में उल्लेखनीय कमी की।
जहाँ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस दिवाली AQI स्तर 351 (अत्यंत खराब), लखनऊ में 250, पटना में 226 और भोपाल में 235 (खराब श्रेणी) दर्ज किया गया, वहीं उत्तराखंड के शहरों का प्रदर्शन बेहतर रहा। यह राज्य की स्वच्छ वायु और सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
दिवाली 2025 (20 अक्टूबर) को दर्ज प्रमुख शहरों के AQI स्तर:
- देहरादून: 128 (मध्यम)
- ऋषिकेश: 54 (संतोषजनक)
- टिहरी: 66 (संतोषजनक)
- काशीपुर: 168 (मध्यम)
- रुड़की: 190 (मध्यम)
- हल्द्वानी: 198 (मध्यम)
- नैनीताल: 111 (मध्यम)
जबकि दिवाली 2024 में यह स्तर कई शहरों में खराब श्रेणी में था -
- देहरादून: 269 (खराब)
- काशीपुर: 269 (खराब)
- ऋषिकेश: 175 (मध्यम)
- उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) के अध्यक्ष आर. के. सुधांशु ने कहा, इस वर्ष की स्वच्छ दिवाली सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। ड्रोन से जल छिड़काव, नई यांत्रिक स्वीपिंग मशीनें और विद्यालयों-कॉलेजों में चलाए गए जन-जागरूकता अभियानों ने ठोस असर दिखाया है।
- विद्यालयों और महाविद्यालयों में आयोजित ग्रीन दिवाली-क्लीन दिवाली अभियानों ने नागरिकों को पर्यावरण अनुकूल तरीके से पर्व मनाने और पटाखों के सीमित उपयोग के लिए प्रेरित किया। इससे प्रदूषण में प्रत्यक्ष कमी दर्ज हुई।












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