Harish rawat भू कानून और भू रजिस्ट्रियों को लेकर पूर्व सीएम ने कही बड़ी बात,उत्तरांचल नाम रखने पर भी उठाए सवाल
Harish Rawat पूर्व सीएम हरीश रावत ने भू कानून को लेकर चल रहे जन आंदोलन का समर्थन कर लगातार हो रही भू रजिस्ट्रियों के आंकड़ों के साथ सवाल खड़े किए हैं। इसके साथ ही हरदा ने उत्तराखंड का नाम उत्तराचंल करने के समय का जिक्र कर फिर से इस मुद्दे का छेड़ने की कोशिश की है।

पूर्व सीएम हरीश रावत ने फेसबुक पोस्ट के जरिए कहा कि 24 दिसंबर को देहरादून में एक बड़ा सा हुजूम उमड़ा। हरदा ने कहा कि मैं उन सब लोगों को जिन्होंने इस जुड़ाव के लिए आवाह्न किया बहुत-बहुत बधाई देता हूं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने तो उनसे भी बेहतर कल्पना के भू-कानून के बारे में सोचा था।
उन्होंने कहा कि राज्य में औद्योगिक निवेश आ रहा था, टैक्स हॉलीडे स्कीम जिसको यूपीए सरकार लेकर के आई थी उसके सद्परिणाम स्वरूप में जब विशेष दर्जा प्राप्त हिमालयी राज्यों के मैदानी भू-भागों में तेजी से औद्योगीकरण होने लगा तो उस समय भी लोग सचेष्ट और चिंतित थे और लोगों ने कहा कि औद्योगिकरण चाहिए। मगर उसमें पहला हक उत्तराखंड के बेटे और बेटियों का होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इसी भावना को लेकर लोगों ने मांग की कि यहां लग रहे उद्योगों में 70 प्रतिशत स्थान स्थानीय लड़के-लड़कियों के लिए आरक्षित होने चाहिए। प्राइवेट नौकरियों में 70 प्रतिशत पद आरक्षित करने वाला पहला राज्य उत्तराखंड था, अब तो यह प्रायः सभी राज्यों की मांग हो गई है।
कहा कि हम कुछ मामलों में हिमाचल से भी आगे खड़े हो गए थे और हमारे ही विधायक गणों आदि सबने हमारी सरकार को इस बात के लिए बाध्य किया है कि हम 500 गज से ज्यादा का भूखंड खरीदना, किसी गैर उत्तराखंडी के लिए जो 1985 से पहले उत्तराखंड में नहीं आ गया है उसके लिए उसको वर्जित बना दें और ऐसा नहीं था कि किसी भावना में यह निर्णय लिया गया था, उस निर्णय की पुष्टि जो दूसरी निर्वाचित सरकार आई थी उसने भी किये, उन्होंने उसको घटा करके ढाई सौ गज कर दिया।
उन्होंने कहा कि एक के बाद एक निर्वाचित सरकारों ने भूमि को उत्तराखंड के लिए दुर्लभ वरदान माना और उसके संरक्षण को अतना कर्तव्य मानकर इस तरीके की अधिसूचनाओं जारी की। हरदा ने दावा किया कि पिछले 5 सालों के अंदर सर्वाधिक जमीनों की रजिस्ट्रियां देहरादून और हल्द्वानी के बाद यदि कहीं हुई हैं तो वो अल्मोड़ा व पौड़ी जनपद हैं।
तकलीफ की बात यह है कि जितने ऐसे दुर्लभतम प्रकृति प्रदत्त स्थल हैं जहां जमीन बेची नहीं जा सकती है, सोचा भी नहीं जाना चाहिए वहां की जमीनें भी बिक रही हैं और एक आंकड़े के अनुसार पिछले 5 वर्षों के अंदर 1 लाख से ज्यादा ऐसी भू रजिस्ट्रियां विभिन्न जिलों में अस्तित्व में आई हैं।
कहा कि यह लोग कौन हैं जो भाग 2 के रजिस्टर से भी ऊपर हैं? कहां से आए हैं, क्या मकसद है? किसी को कुछ मालूम नहीं है। हरदा ने उत्तरांचल नाम बदलने की सियासत का भी जिक्र किया, उन्होंने कहा कि मुझे याद है जब केंद्र सरकार ने राज्य का नाम उत्तरांचल कर दिया था। कितना झट-पटाते थे, हममें एक बेचैनी थी, एक व्याकुलता थी, अरे हमारी उत्तराखंडी पहचान मिटा दी।












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